नई दिल्ली: 19 जुलाई को गुड़गांव की एक दुकान के बाहर सफाईकर्मी के तौर पर अपनी शिफ्ट पूरी करने के बाद 41 वर्षीय हाफ़िज़ुर शेख़ को पुलिस ने रोका और पूछताछ शुरू कर दी. उन्होंने सभी सवालों के जवाब दिए, लेकिन फिर उनसे ‘नागरिकता की पुष्टि’ के लिए पहचान पत्र दिखाने को कहा गया.
हालांकि उनके पास आधार कार्ड, वोटर आईडी और अन्य दस्तावेज़ फोन पर उपलब्ध थे, फिर भी पुलिस ने उन्हें नकार दिया. उनके भाई अमनुर ने द वायर को बताया, ‘पुलिस को दस्तावेज की फिजिकल कॉपी चाहिए थी. मेरे भाई ने कहा कि वो घर से दस्तावेज ला सकता है या पुलिस उसके साथ घर चलकर उन्हें देख सकती है, लेकिन उन्होंने एक न सुनी और उसे हिरासत में ले लिया.’
हाफ़िज़ुर पश्चिम बंगाल के नदिया ज़िले से हैं, और उन सैकड़ों लोगों में शामिल हैं जिन्हें हरियाणा के गुड़गांव में पुलिस ने हिरासत में लिया है. इनमें अधिकतर मुस्लिम पुरुष हैं, जो गुड़गांव की बड़ी कंपनियों में सफाईकर्मी, कचरा बीनने, पब्लिक सेनिटेशन कर्मचारी, घरेलू सहायक और डिलीवरी एजेंट का काम करते हैं.

केवल 19 जुलाई को पुलिस ने कम से कम 74 मज़दूरों को हिरासत में लिया, जिनमें 11 पश्चिम बंगाल और 63 असम राज्य से हैं.
पुलिस को शक है कि ये सभी बांग्लादेश के ‘ग़ैरकानूनी प्रवासी’ हैं, इसलिए इन्हें ‘होल्डिंग सेंटर्स’ में रखा गया है, जिसे मानवाधिकार कार्यकर्ता अस्थायी डिटेंशन कैंप बता रहे हैं.
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) (सीपीआई-एमएल) के सदस्य और अधिवक्ता सुपंता सिन्हा ने बताया, ‘गुड़गांव के सेक्टर 10 स्थित इस कैंप में 200 से ज़्यादा लोग बंद हैं.’
‘नागरिकता सत्यापन के नाम पर प्रवासी मज़दूरों को हिरासत’ में लिए जाने की खबर सामने आने के बाद 21 जुलाई को सीपीआई-एमएल की एक दो सदस्यीय टीम ने गुड़गांव के सेक्टर 10 में बनाए गए एक अस्थायी डिटेंशन सेंटर का दौरा किया. सिन्हा इस टीम का हिस्सा थे.
उन्होंने आरोप लगाया कि मज़दूरों को ‘अमानवीय हालात’ में रहने को मजबूर किया जा रहा है. सीपीआई-एमएल के एक बयान में कहा गया कि ‘गुड़गांव के अन्य हिस्सों में भी ऐसी ही कार्रवाई की जा रही है और कुछ क्षेत्रों में 200 से अधिक लोगों को हिरासत में रखा गया है.’
सिन्हा ने कहा कि यह कार्रवाई गृह मंत्रालय के निर्देशों के बाद की जा रही हैं. यह पूरे देश में अवैध प्रवासियों के खिलाफ चलाए जा रहे अभियान का हिस्सा हैं. लेकिन कई मीडिया रिपोर्ट् में ऐसा कहा जा रहा है कि इन कार्रवाईयों का सबसे बड़ा असर बांग्लाभाषी मुस्लिम प्रवासियों पर पड़ रहा है, विशेषकर वे जो पश्चिम बंगाल और असम से हैं.
हाल ही में कोलकाता में आयोजित एक विरोध प्रदर्शन में ममता बनर्जी के नेतृत्व में तृणमूल कांग्रेस ने दिल्ली (जय हिंद कॉलोनी), एनसीआर और ओडिशा में प्रवासियों पर हो रहे हमलों का विरोध किया. बनर्जी ने भाजपा को चुनौती दी थी कि ‘अगर हिम्मत है तो मुझे डिटेंशन सेंटर में डालो.’
उन्होंने इन कार्रवाइयों की निंदा करते हुए सोशल मीडिया पर लिखा, ‘देश की दूसरी सबसे ज़्यादा बोली जाने वाली भाषा बांग्ला, असम की भी दूसरी प्रमुख भाषा है. अगर कोई नागरिक शांतिपूर्वक रहना चाहता है और अपनी भाषा व धर्म का सम्मान करता है, तो उसे धमकाना असंवैधानिक है.’
राज्यसभा सांसद और बंगाली प्रवासी बोर्ड के प्रमुख समीरुल इस्लाम ने भाजपा पर बंगालियों के खिलाफ नफ़रत फैलाने का आरोप लगाया. टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा ने भी इन गिरफ्तारियों को ‘ग़ैरकानूनी अपहरण’ करार दिया.
‘हिरासत में नहीं लिया, सिर्फ़ अस्थायी रूप से रखा है’
गुड़गांव पुलिस के प्रवक्ता संदीप कुमार से द वायर ने पूछा कि इन प्रवासियों को किन धाराओं में पकड़ा गया है, तब उन्होंने कहा, ‘उन्हें हिरासत में नहीं लिया गया है. गृह मंत्रालय के निर्देशों के अनुसार कुछ ‘होल्डिंग सेंटर्स’ बनाए गए हैं, जहां संदिग्ध बांग्लादेशी नागरिकों को रखा गया है. इन सेंटर्स में सभी बुनियादी सुविधाएं, और चिकित्सा सेवाएं दी जा रही हैं.’
इस वर्ष मई में केंद्र सरकार ने सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को निर्देश दिया था कि वे देशभर में गैरकानूनी अप्रवासियों की पहचान करें, उन्हें हिरासत में लें और फिर वापस उनके देश भेजें.
विऑन की एक रिपोर्ट के मुताबिक, केंद्र ने राज्यों को 30 दिनों में दस्तावेज़ सत्यापन और डिपोर्टेशन प्रक्रिया शुरू करने का निर्देश दिया था. साथ ही जिला-स्तर पर डिटेंशन सेंटर बनाने को भी कहा गया था.
कुमार ने कहा कि ‘संदिग्ध प्रवासियों’ को सरकार के दिशानिर्देशों के तहत ‘होल्डिंग सेंटर’ में रखा गया है, हालांकि उन्होंने यह स्पष्ट नहीं किया कि ये दिशानिर्देश क्या हैं.
कुमार ने बताया कि गुड़गांव में फिलहाल चार ऐसे होल्डिंग सेंटर्स हैं, लेकिन उन्होंने इन सेंटर्स में बंद लोगों की संख्या बताने से इनकार कर दिया.
उन्होंने कहा, ‘अगर कोई व्यक्ति खुद को भारतीय नागरिक बताता है, तो हम संबंधित जिला मजिस्ट्रेट से उसकी नागरिकता की पुष्टि कराते हैं. और अगर पुष्टि हो जाती है, तो उसे छोड़ दिया जाता है, और जिनकी पुष्टि नहीं हो पाती उनको डिपोर्ट करने की प्रक्रिया शुरू कर दी जाती है.’
उन्होंने बताया कि अब तक सिर्फ़ 5-6 लोगों को ही छोड़ा गया है, जिनकी नागरिकता प्रमाणित हुई है.
गुड़गांव छोड़कर भागे सैकड़ों प्रवासी
द वायर ने गुड़गांव के खटोला गांव की एक बस्ती का दौरा किया, जहां बड़ी संख्या में असम के मुस्लिम प्रवासी रहते हैं. सड़क के एक तरफ बहुमंजिला इमारतें हैं जिनमें बड़ी कॉरपोरेट कंपनियों के ऑफिस हैं, और दूसरी तरफ झुग्गियों में रहने वाले प्रवासी असमिया मज़दूर, जो इन्हीं ऑफिसों में सफाईकर्मी के रूप में काम करते हैं.
स्थानीय लोगों के अनुसार, पहले इस बस्ती में करीब 2,000 लोग रहते थे. लेकिन जब द वायर की टीम वहां पहुंची तब बस्ती लगभग खाली थी. सिर्फ़ 10-12 महिलाएं बची थीं जो डिटेंशन सेंटर में बंद अपने पतियों और रिश्तेदारों से मिलने जा रही थीं.

महिलाओं ने बताया कि 19 जुलाई को पुलिस ने इलाके से 40 से ज़्यादा पुरुषों को हिरासत में ले लिया, इस कार्रवाई के बाद लगभग पूरी बस्ती असम लौट गई है.
रोहिमा, जिनके पति नज़रुल इस्लाम मोंडल को 19 जुलाई को पुलिस उनके घर से उठाकर ले गई थी, उनसे जब यह पूछा गया कि वह अभी तक असम क्यों नहीं गईं, तब उन्होंने कहा, ‘हम लोग कैसे जाएं जब हमारे पति डिटेंशन सेंटर में सड़ रहे हैं? कौन जानता है पुलिस उनके साथ क्या कर रही होगी?’
रोहिमा का दावा है कि मोंडल के पास सारे दस्तावेज़ थे, उनका नाम एनआरसी में भी दर्ज है, फिर भी उन्हें उठा लिया गया.
उस दिन को याद करते हुए उन्होंने बताया, ‘पुलिस ने मुझसे पूछा मैं कहां की हूं, मैंने कहा असम से. लेकिन उन्होंने कहा, ‘तुम सब बांग्लादेशी हो, सबको उठाएंगे.’ उसके बाद वे हमारे मर्दों को उठाकर ले गए. हमने जब पूछा कि उन्हें कब छोड़ेंगे? तब पुलिस बोली- तुझे क्या मतलब? भाग यहां से.’
महिलाओं का कहना है कि पुलिस ने दस्तावेज़ देखे बिना उन्हें उठाकर ले गई, जबकि उन्होंने कई सारे पहचान पत्र दिखाने की कोशिश की.
रोहिमा ने बताया कि उनके पति ने डिटेंशन सेंटर से उन्हें फोन करके अपने सभी दस्तावेज़ भेजने को कहा था. उन्होंने कहा, ‘मैंने सभी दस्तावेज भेजे, लेकिन उसके बाद से उनका फोन बंद आ रहा है.’
सायरा बानो, जिनके पति रोकिबुज़ हुसैन को भी पकड़ा गया है, उन्होंने कहा, ‘पति के जाने के बाद से मैं खाना नहीं खा सकी. हमारी 12 साल की बेटी स्कूल नहीं जा रही, क्योंकि स्कूल छोड़ने का काम पिता ही करते थे.’
सायरा और उनके पति दोनों पास के दफ्तरों में घरेलू सहायक का काम करते हैं.

जब महिलाओं से पूछा गया कि वे अब यहां रहेंगी या नहीं, तो ज़्यादातर ने कहा कि पति के छूटते ही वे गुड़गांव छोड़ देंगी.
‘ऐसे माहौल में कौन रह सकता है जहां हर समय डर बना रहे?’ सायरा बानो के साथ खड़ी एक महिला ने कहा.
जिन्हें हिरासत में रखा गया है उनमें से कई लोगों से द वायर ने फोन पर बात की. उनमें से एक ने बताया कि उसे पालम विहार से उस वक्त उठाया गया जब वह असम से आए दर्जनभर प्रवासियों के साथ अपने दस्तावेज़ दिखाने स्वेच्छा से वहां गया था.
एक अन्य ने कहा, ‘कुत्तों को भी हमसे अच्छा खाना मिलता है.’
‘हमें सिर्फ़ बांग्ला बोलने के लिए हिरासत में लिया गया है’
कचरा बीनने वालों की बस्ती में पश्चिम बंगाल से आकर रह रहे अमानूर शेख़ ने कहा, ‘पुलिस हमें सिर्फ़ इसलिए उठाती है क्योंकि हम बांग्ला बोलते हैं. क्या इस देश में बांग्ला बोलना अपराध है? और अगर यह अपराध है तब हमें इसके खिलाफ आवाज़ उठाना चाहिए.’
उन्होंने कहा कि मौजूदा हालात ने उन्हें डर के साए में जीने को मजबूर कर दिया है. ‘ऐसे हालात बना दिए गए हैं कि कोई भी हमें बांग्लादेशी कहकर धमका सकता है.’
उन्होंने आगे कहा, ‘अगर सरकार चाहती है कि बांग्लाभाषी लोग एनसीआर छोड़ दें, तो साफ कहना चाहिए, हम शांति से पश्चिम बंगाल लौट जाएंगे. लेकिन हमारे साथ इस तरह का अमानवीय व्यवहार नहीं किया जाना चाहिए.’
शेख़ ने इसे एक राजनीतिक साजिश बताया. ‘भाजपा की बार-बार कोशिशों के बावजूद बंगाल में उनकी सरकार नहीं बन सकी है. इसलिए वे अब बंगाली लोगों को टारगेट कर रहे हैं.’
हाफ़िज़ुर की बुआ रूपा पिछले 15 सालों से दिल्ली की एक फैक्ट्री में सफाईकर्मी हैं. वह कहती हैं, ‘कुछ महीने पहले पुलिस अचानक घर आई और पूछा कि क्या मैं बांग्लादेशी हूं? जब मैंने इनकार किया, तब उन्होंने कहा कि उन्हें शिकायत मिली है. मैंने उन्हें दस्तावेज़ दिखाए, तब जाकर वे माने.’
उन्होंने कहा, ‘भतीजे के हिरासत में लिए जाने के बाद से मैं सो नहीं पाई हूं. पति भी डर के मारे तीन दिन से काम पर नहीं जा रहे.’

उनके पड़ोसी मिज़ानुर मोल्ला ने आरोप लगाया कि पुलिस ने उनके ससुर सैयद मोल्ला (45) और पांच अन्य लोगों को पिछले महीने हिरासत में ले लिया था.
मिज़ानुर, जो पिछले चार साल से दिल्ली में सफाईकर्मी हैं, उन्होंने कहा, ‘पुलिस ने मेरे ससुर को कमरे से उठाया था, उन्होंने दस्तावेज़ भी दिखाए थे, लेकिन पुलिस ने उनके पेपर ले लिए और उन्हें दो-तीन दिन जेल में रखा, वहां उन्हें प्रताड़ित भी किया गया.’
उन्होंने कहा, ‘पुलिस मानती है कि बांग्ला बोलने वाला हर मुस्लिम बांग्लादेशी है.’
‘हमारे गांव में कोई हिंदी नहीं बोलता, सब बंगाली बोलते हैं. इसका मतलब यह नहीं कि हम बांग्लादेशी हैं,’ रूपा कहती हैं.
‘ये हिरासतें ग़ैरकानूनी हैं’
अधिवक्ता सुपंता सिन्हा ने कहा, ‘पुलिस अधिकारियों से बात करने के बाद हमें पता चला कि गृह मंत्रालय के दिशानिर्देशों के अनुसार किसी भी संदिग्ध व्यक्ति को 30 दिनों तक हिरासत में रखा जा सकता है ताकि उसकी पहचान की जांच की जा सके.’
इन हिरासतों को ग़ैरकानूनी बताते हुए उन्होंने कहा, ‘कानून के अनुसार, हिरासत में लिए गए किसी भी व्यक्ति को क़ानूनी सहायता का अधिकार है. बिना कोई कारण बताए किसी को हिरासत में नहीं रखा जा सकता. और अनिश्चितकालीन हिरासत तो बिल्कुल भी नहीं दी जा सकती.’
उन्होंने कहा, ‘मुझे ये डिटेंशन पहचान पर आधारित लगता है. ज़्यादातर लोग बांग्लाभाषी मुस्लिम हैं, जो पश्चिम बंगाल या असम के रहने वाले हैं.’
उन्होंने सवाल उठाए, ‘इनकी नागरिकता कौन तय कर रहा है? और कौन से दस्तावेज़ों के आधार पर? क्या इन पर कोई सर्वे हुआ है? किस पैरामीटर से इनके दस्तावेज़ संदिग्ध माने जा रहे हैं?’
इन सवालों पर सरकारी अधिकारी अब तक चुप हैं. सिन्हा ने कहा कि सीपीआई-एमएल अब इस मामले को अदालत में ले जाने की योजना बना रही है. ‘हम सभी कानूनी विकल्पों पर विचार कर रहे हैं.’
(इस रिपोर्ट को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)
