बिहार एसआईआर: चुनिंदा वॉट्सऐप मैसेज के ज़रिये चुनाव आयोग का आलोचना टालने का प्रयास

बिहार में भारत निर्वाचन आयोग द्वारा किए जा रहे एसआईआर पर उठ रहे सवालों के बीच चुनाव आयोग ने 24 जुलाई को चुनिंदा पत्रकारों को भेजे एक वॉट्सऐप मैसेज में इस आलोचना का जवाब दिया. इसमें कहा गया कि संविधान भारतीय लोकतंत्र की जननी है. क्या उसे आलोचना से डरना चाहिए.

मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार (बीच में) विवेक जोशी (दाएं) और सुखबीर सिंह संधु (बाएं) (फोटो साभार: फेसबुक)

नई दिल्ली: चुनावी राज्य बिहार में भारत निर्वाचन आयोग (ईसीआई) द्वारा किए जा रहे विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) पर उठ रहे सवालों के बीच चुनाव आयोग ने गुरुवार (24 जुलाई) को चुनिंदा पत्रकारों को भेजे एक वॉट्सऐप मैसेज में इस आलोचना का जवाब दिया.

चुनाव आयोग ने संदेश में कहा कि ‘संविधान भारतीय लोकतंत्र की जननी है और कई सवाल पूछे, जिनमें पूछा गया कि क्या उसे आलोचना से डरना चाहिए और उन लोगों के नाम पर वोट डालने की अनुमति देनी चाहिए जो मर चुके हैं, पलायन कर चुके हैं या दो जगहों पर पंजीकृत हैं.

उल्लेखनीय बात यह है कि यह संदेश निर्वाचन आयोग की वेबसाइट पर प्रेस विज्ञप्ति के रूप में उपलब्ध नहीं था, जहां चुनाव आयोग बिहार में एसआईआर की प्रगति पर अपनी दैनिक विज्ञप्तियां सूचीबद्ध करता है.

बल्कि चुनाव आयोग ने एक अलग वॉट्सऐप मैसेज, जो चुनिंदा पत्रकारों को भी भेजा गया था, में लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी के संसद के बाहर लगाए गए इस आरोप का जवाब दिया कि कांग्रेस के पास ‘कर्नाटक की एक सीट पर चुनाव आयोग द्वारा धोखाधड़ी की अनुमति देने के 100% ठोस सबूत’ हैं, जिन्हें जनता के सामने लाया जाएगा.

अपने जवाब में आयोग ने संदेश में कहा कि उसे ‘आश्चर्य है कि मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) के खिलाफ ऐसे निराधार और धमकी भरे आरोप क्यों लगाए जा रहे हैं, और वह भी अभी?’

चुनाव आयोग ने एसआईआर का बचाव ऐसे समय में किया है जब उसकी दैनिक प्रेस विज्ञप्तियों में मृत्यु, प्रवास या एक से ज़्यादा जगहों पर पंजीकृत होने के कारण मतदाता सूची से बाहर किए गए मतदाताओं की संख्या में तेज़ी से वृद्धि दिखाई गई है. 24 जुलाई को जारी उसकी प्रेस विज्ञप्ति – जो उसकी वेबसाइट पर भी उपलब्ध है – में कहा गया है कि 91.32% यानी 7.21 करोड़ मतदाताओं के फ़ॉर्म जमा कर लिए गए हैं, जबकि 1 लाख मतदाताओं का अभी तक पता नहीं चल पाया है.

आयोग ने यह भी कहा कि 60.1 लाख मतदाता मृत, विस्थापित या एक से अधिक स्थानों पर पंजीकृत पाए गए हैं.

‘क्या चुनाव आयोग को मृत मतदाताओं को भी मतदान की अनुमति देनी चाहिए?’

चुने हुए पत्रकारों को दिए गए मैसेज में चुनाव आयोग ने ‘एसआईआर’ की बढ़ती आलोचना का जवाब देने की कोशिश की. इसमें कहा गया कि ‘भारतीय संविधान भारतीय लोकतंत्र की जननी है.’

संदेश के रूप में जारी विज्ञप्ति में कहा गया है, ‘क्या चुनाव आयोग को इन लोगों से डरना और गुमराह होना चाहिए और मृत मतदाताओं, प्रवासी मतदाताओं या दो जगहों पर पंजीकृत मतदाताओं के नाम पर फर्जी वोट डालने की अनुमति देनी चाहिए, और संविधान के विरुद्ध जाकर पहले बिहार और फिर पूरे देश में जो प्रक्रिया अपनाई जा रही है, उसमें फर्जी मतदाताओं या विदेशी मतदाताओं को अनुमति देनी चाहिए? क्या चुनाव आयोग द्वारा कुशलतापूर्वक तैयार की जा रही प्रामाणिक मतदाता सूची निष्पक्ष चुनाव और एक मजबूत लोकतंत्र की नींव नहीं है?’

इसमें कहा गया है, ‘किसी समय इन सवालों पर हम सभी को, भारत के प्रत्येक नागरिक को, राजनीतिक विचारधाराओं से ऊपर उठकर विचार करना होगा. और शायद आप सभी के लिए इस पर विचार करने का सबसे उपयुक्त समय अब भारत में आ गया है.’

हालांकि वॉट्सऐप संदेश में इस बयान का ज़िक्र चुनाव आयोग या मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के नाम से नहीं किया गया था, फिर भी इसे बाद में कई मीडिया संस्थानों ने दोनों रूपों में प्रकाशित किया.

हालांकि, यह संदेश चुनाव आयोग की वेबसाइट पर प्रेस विज्ञप्ति के रूप में उपलब्ध नहीं कराया गया.

द वायर ने चुनाव आयोग के प्रेस सूचना ब्यूरो (पीआईबी) के अधिकारियों से संपर्क किया और पूछा कि क्या इसे चुनाव आयोग द्वारा एक प्रामाणिक बयान के रूप में प्रकाशित किया जा सकता है. उनका जवाब मिलने पर इस रिपोर्ट को अपडेट किया जाएगा.

चुनाव आयोग के प्रवक्ता ने राहुल गांधी के आरोपों का जवाब दिया

गुरुवार को संसद के बाहर पत्रकारों से बात करते हुए गांधी ने कहा कि कांग्रेस के पास ‘कर्नाटक की एक सीट पर चुनाव आयोग द्वारा धोखाधड़ी की अनुमति देने के 100% ठोस सबूत’ हैं, जहां ‘हज़ारों नए मतदाता’ जोड़े गए थे जिनकी उम्र 18 साल से ज़्यादा थी.

उन्होंने कहा, ‘और मैं चुनाव आयोग को एक संदेश देना चाहता हूं, अगर आपको लगता है कि आप इससे बच निकलेंगे, अगर आपको लगता है कि आपके अधिकारी इससे बच निकलेंगे, तो आप ग़लतफ़हमी में हैं. हम आपके ख़िलाफ़ कार्रवाई करेंगे.’

भारत के चुनाव आयोग ने एक्स पर राहुल गांधी के उस बयान को पोस्ट किया जिसे उन्होंने एक ट्वीट के रूप में पोस्ट किया था और इसे ‘भ्रामक‘ बताया. चुनाव आयोग ने कर्नाटक के मुख्य चुनाव अधिकारी के उस बयान का हवाला दिया जिसमें कहा गया था कि मतदाता सूची सभी मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों के साथ साझा की जाती है.

लोकसभा चुनाव 2024 से पहले मतदाता सूची के मसौदे और प्रकाशन के बीच सभी 224 विधानसभा क्षेत्रों की प्रतियां उपलब्ध कराई गईं. कर्नाटक के सीईओ ने कहा, ‘मतदाता सूची के प्रारूप और अंतिम प्रकाशन के बीच 9,17,928 दावे और आपत्तियां विचारार्थ प्राप्त हुईं.’

उन्होंने कहा, ‘कानून के अनुसार, मतदाता सूची में गलत नाम जोड़ने या हटाने के विरुद्ध अपील दायर की जा सकती है. कोई अपील प्राप्त नहीं हुई.’

चुने हुए पत्रकारों को चुनाव आयोग के प्रवक्ता के हवाले से एक अलग वॉट्सऐप संदेश उपलब्ध कराया गया, जिसका शीर्षक था ‘कर्नाटक लोकसभा चुनाव 2024 पर मुख्य चुनाव आयुक्त के विरुद्ध राहुल गांधी द्वारा दिए गए अनुचित धमकी भरे बयान. तथ्य जो भारत के सभी नागरिकों को जानने चाहिए.’

बिहार एसआईआर की आलोचना का जवाब देने वाले पिछले संदेश की तरह इस संदेश में भी एक प्रश्न उठाया गया था: ‘चुनाव आयोग को आश्चर्य हो रहा है कि मुख्य चुनाव आयुक्त के विरुद्ध ऐसे निराधार और धमकी भरे आरोप क्यों लगाए जा रहे हैं, और वह भी अभी?’

सन्देश में आगे कहा गया:

‘1. जहां तक कर्नाटक लोकसभा 2024 की मतदाता सूची का संबंध है, कर्नाटक के डीएम/सीईओ के समक्ष एक भी अपील दायर नहीं की गई, जो कि जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 की धारा 24 के तहत कांग्रेस के लिए उपलब्ध एक वैध कानूनी उपाय है; और

2. जहां तक 2024 के लोकसभा चुनावों के संचालन का संबंध है, 10 चुनाव याचिकाओं में से किसी भी हारने वाले कांग्रेस उम्मीदवार द्वारा जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 की धारा 80 के तहत कांग्रेस के लिए उपलब्ध एक भी कानूनी उपाय के रूप में एक भी चुनाव याचिका दायर नहीं की गई,’ बयान में कहा गया और सीईओ कर्नाटक के पहले के बयान को भी जोड़ा गया.

3. चुनाव आयोग को आश्चर्य है कि मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ ऐसे निराधार और धमकी भरे आरोप क्यों लगाए जा रहे हैं, और वह भी अभी?’

हालांकि यह बयान भी चुनाव आयोग की वेबसाइट पर आधिकारिक प्रेस विज्ञप्ति के रूप में प्रकाशित नहीं हुआ था, तेलंगाना के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने इसे एक्स पर पोस्ट किया था.

बिहार में चल रहे विशेष जांच दल (एसआईआर) के दौरान चुनाव आयोग ने पहले कुछ मीडिया संस्थानों को ‘सूत्रों‘ के माध्यम से बताया था कि नेपाल, म्यांमार और बांग्लादेश से अनिर्दिष्ट संख्या में अवैध अप्रवासी पाए गए हैं.

राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के नेता और बिहार के पूर्व उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने तब कहा था कि चुनाव आयोग ‘खुद आगे आने के बजाय, सूत्रों के माध्यम से खबरें प्लांट करवा रहा है ताकि वह इसकी आड़ में अपना खेल खेल सके. ये वही सूत्र हैं जिन्होंने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान इस्लामाबाद, लाहौर और कराची पर कब्जा किया था.’

उन्होंने कहा, ‘इसलिए, हम ऐसे स्रोतों को मूत्र मानते हैं. मूत्र, यानी एक अपशिष्ट पदार्थ जो दुर्गंध फैलाता है.’

‘बिचौलियों को हस्ताक्षररहित, टालमटोल वाले नोट जारी करना’

जून में चुनाव आयोग ने महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों में मतदाता सूची में हेराफेरी के गांधी के आरोपों का जवाब अखबारों में प्रकाशित एक लेख के माध्यम से दिया था. हालांकि, चुनाव आयोग का जवाब एक हस्ताक्षररहित और बिना तारीख वाले नोट के माध्यम से स्पष्टीकरण के रूप में था.

बाद में गांधी ने चुनाव आयोग को जवाब देते हुए कहा था, ‘आप एक संवैधानिक संस्था हैं. बिचौलियों को अहस्ताक्षरित, टालमटोल वाले नोट जारी करना गंभीर सवालों का जवाब देने का तरीका नहीं है.’

24 जून को एसआईआर की विवादास्पद प्रक्रिया शुरू करने के बाद से चुनाव आयोग ने अभी तक इसकी शुरुआत की घोषणा करते हुए कोई प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं की है या इस प्रक्रिया की किसी भी आलोचना का सीधे जवाब नहीं दिया है, सिवाय सुप्रीम कोर्ट में एक हलफनामे के, जो इस प्रक्रिया को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा है.

सुप्रीम कोर्ट को दिए अपने हलफनामे में चुनाव आयोग ने कहा है कि उसके पास नागरिकता का प्रमाण मांगने का अधिकार है और उसने इस प्रक्रिया में मतदाता सत्यापन के लिए आधार, मतदाता पहचान पत्र और राशन कार्ड को वैध दस्तावेज़ मानने के उसके सुझाव को भी खारिज कर दिया है.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)