गुड़गांव पुलिस ने बांग्लाभाषी प्रवासी मज़दूरों को रिहा किया, ‘बांग्लादेशी’ बताए गए दस अब भी हिरासत में

गुड़गांव में असम और पश्चिम बंगाल से आए सैकड़ों बांग्लाभाषी प्रवासी मज़दूरों को हिरासत में लेने के बाद पुलिस ने लगभग सभी को रिहा कर दिया है. पुलिस का दावा है कि अब सिर्फ़ 10 लोग हिरासत में हैं, जिन्हें वह ‘बांग्लादेशी नागरिक’ बता रही है.

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गुरुग्राम के खटोला गांव के असमिया मुस्लिम मोहल्ले की महिलाएं अपने हिरासत में लिए गए पतियों से मिलने जाते हुए. (फोटो: अलीशान जाफरी/द वायर)

नई दिल्ली: गुड़गांव में असम और पश्चिम बंगाल के बांग्लाभाषी प्रवासी मजदूरों को हिरासत में लेने के कुछ दिनों बाद रिहा कर दिया है. हिरासत में लिए गए प्रवासियों की संख्या सैकड़ों में थी, जिनमें कूड़ा बीनने वाले, सफाईकर्मी और घरेलू सहायक शामिल थे. लेकिन प्रशासन ने दस लोगों को ‘बांग्लादेशी नागरिक’ बताते हुए रिहा नहीं किया है. 

गुड़गांव पुलिस के जनसंपर्क अधिकारी (पीआरओ) संदीप कुमार ने पुष्टि की कि दस लोगों को छोड़कर बाकी सभी को रिहा कर दिया गया है. उनका दावा है कि ये दस लोग बांग्लादेश से आए बिना दस्तावेज वाले अवैध प्रवासी हैं और उनके देश वापसी की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है.

उन्होंने कहा, ‘हिरासत में अब सिर्फ दस लोग बचे हैं, जिनकी पहचान बांग्लादेशी नागरिकों के रूप में हुई है.’

हालांकि, उन्होंने यह नहीं बताया कि कुल कितने लोगों को हिरासत में लिया गया था और बाद में रिहा किया गया.

जब द वायर ने पूछा कि किन आधारों पर इन दस लोगों को अवैध प्रवासी माना गया जबकि बाकी को रिहा कर दिया गया, तब संदीप कुमार ने बताया, ‘इन दस लोगों के पास कुछ दस्तावेज हैं जो साबित करते हैं कि वे बांग्लादेश से हैं.’ 

यह पूछे जाने पर कि क्या अवैध बांग्लादेशी नागरिकों की पहचान और निर्वासन की यह मुहिम आगे भी जारी रहेगी या तेज़ की जाएगी, उन्होंने जवाब दिया, ‘सत्यापन चल रहा है, और सिर्फ़ उन्हीं को उठाया जाएगा जो बेहद संदिग्ध हैं.’ 

जब पूछा गया कि जो ‘सैकड़ों लोग’ पहले हिरासत में लिए गए और फिर उन्हें रिहा किया गया, क्या वे भी ‘बेहद संदिग्ध’ थे, तब कुमार ने इस आंकड़े पर सवाल उठाते हुए कहा कि यह संख्या कहां से आई, और बताया कि अभियान जारी है और फिलहाल कोई आधिकारिक आंकड़ा साझा नहीं किया जा सकता.

रिहाई की प्रक्रिया के बारे में उन्होंने कहा, ‘हमने उन जिलों के प्रशासन से संपर्क किया जिनके बारे में हिरासत में लिए गए लोगों ने दावा किया था कि वे वहां के निवासी हैं. संबंधित जिलों के अधिकारियों द्वारा उनकी नागरिकता की पुष्टि के बाद हमने उन्हें रिहा कर दिया.’

यह रिहाइयां विपक्षी नेताओं और नागरिक समाज की ओर से इस कार्रवाई की आलोचना और लगातार सवाल उठाए जाने के बीच हुई है. 

गुड़गांव में हुई इस कार्रवाई को ‘भाषाई आतंकवाद’ (linguistic terrorism) बताते हुए पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने एक्स पर लिखा कि वह इन ‘डबल इंजन की सरकारों द्वारा बंगालियों पर किए जा रहे भयानक अत्याचारों’ को देखकर स्तब्ध हैं. उन्होंने कहा, ‘आप क्या साबित करना चाहते हैं? यह बेहद अमानवीय और भयावह है. हम इसे सहन नहीं करेंगे.’ 

एक वीडियो संदेश में तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा ने इस अभियान की तुलना ‘नाजी जर्मनी में जीने’ से की.

हैदराबाद से सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने इन हिरासतों को अवैध बताते हुए एक्स पर लिखा, ‘यह सरकार कमजोरों पर सख्त और ताकतवरों पर नरम है. जिन लोगों को ‘अवैध प्रवासी’ बताया गया है, वे सबसे गरीब हैं. झुग्गीवासियों, सफाईकर्मियों, घरेलू सहायकों, कूड़ा बीनने वालों आदि को बार-बार निशाना बनाया जाता है क्योंकि वे पुलिस की ज्यादतियों का विरोध करने की स्थिति में नहीं होते.’ 

शुक्रवार को भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माले) के महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य ने गुड़गांव में बांग्लाभाषी प्रवासियों से मुलाकात की.

दिल्ली और गुड़गांव की कापसहेड़ा सीमा के पास बंगाली रैगपिकर बस्ती में अमनुर शेख की झोपड़ी. (फोटो: अलीशान जाफरी)

हालिया कार्रवाई के बाद बड़ी संख्या में बांग्ला बोलने वाले प्रवासी मजदूर अपने गृह राज्य- असम और पश्चिम बंगाल लौट चुके हैं.

जब द वायर की टीम गुड़गांव के असमिया मुस्लिम बाहुल मुहल्ला- खटोला गांव पहुंची, तब वह पूरा मोहल्ला लगभग वीरान था. वहां के निवासियों के अनुसार, पहले यहां करीब 2000 लोग रहते थे. वहां केवल लगभग एक दर्जन महिलाएं बची थीं, जो अपने हिरासत में लिए गए अपने पतियों और पुरुष रिश्तेदारों से मिलने जा रहीं थीं. 

हालिया कार्रवाई के बाद, लगभग पूरा मोहल्ला असम पलायन कर चुका है. 

अब जब हिरासत में लिए गए लोगों को रिहा किया जा रहा है, तब सायरा बानो और उनका परिवार समेत बचे सभी लोग असम लौट रहे हैं. 

गुड़गांव से द वायर की पिछली रिपोर्ट में शामिल सभी प्रवासी मजदूरों को रिहा कर दिया गया है. 

हिरासत में लिए गए हाफिज़ुर शेख के भाई अमानूर शेख ने बताया कि उनके भाई को रिहा कर दिया गया है, लेकिन परिवार अब भी डर के साए में जी रहा है. 

रफुकुल इस्लाम को 23 जुलाई को रिहा किया गया, उन्हें पांच दिनों से अधिक समय तक हिरासत में रखा गया था. उन्हें 18 जुलाई को हिरासत में लिया गया था और बसापुर सिटी सेंटर स्थित वोट कैंप में ले जाया गया था, जिसे पुलिस ‘होल्डिंग सेंटर’ कहती है.

रफुकुल के अनुसार, उस सेंटर में करीब 150 लोगों को रखा गया था. उन्होंने दावा किया कि उनमें से 15-16 लोग हिंदू थे, जिन्हें पहले ही रिहा कर दिया गया था. बाकी सभी असम और बंगाल के मुसलमान थे.

उन्होंने कहा, ‘हमारे साथ 27 लोग ऐसे थे जिन्हें मैं व्यक्तिगत रूप से जानता हूं. हम सभी को एक ही मोहल्ले से उठाया गया था. अब पुलिस ने हम सबको छोड़ दिया है.’

यह पूछे जाने पर की रिहाई के दौरान पुलिस ने उनसे क्या कहा, रफुकुल ने जवाब दिया, ‘कुछ नहीं, बस कुछ कागज़ों पर साइन करवाए और बोले, ‘तुम लोग अब जाओ यहां से, तुम्हारा हो गया अभी.’ 

उन्होंने यह भी दावा किया कि पुलिस ने सभी के मोबाइल फोन ज़ब्त कर लिए. ‘कुछ लोगों को फोन वापस मिले, लेकिन मुझे और बाकी कई लोगों को अब तक नहीं मिला है.’ 

रिहाई के बाद रफुकुल और बाकी लोग एनसीआर छोड़कर अपने-अपने गांव लौट गए. रफुकुल असम के कोकराझार जिले के निवासी हैं.

उन्होंने कहा, ‘जब हालात सामान्य होंगे तब हम फिर से आएंगे. रोज़ी-रोटी वहीं है, ज़्यादा दिन दूर रहकर कैसे जिएंगे? लेकिन फिलहाल गुड़गांव में नहीं रुक सकते.. क्या पता फिर कब आकर पुलिस उठा ले?’

यह पूछे जाने पर कि पुलिस ने उन्हें किन आधारों पर उठाया था, रफुकुल ने बताया, ‘पुलिस ने पूछा कि कहां से हो. जब हमने कहा कि असम से हैं, तब वे बोले, ‘नहीं-नहीं, तुम लोग बांग्लादेश से हो, चलो गाड़ी में बैठो.’ और फिर हमें सेंटर ले गए.’

(इस रिपोर्ट को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)