नई दिल्ली: केंद्रीय गृह मंत्रालय ने बुधवार (30 जुलाई) को संसद को बताया कि 2018-2022 के बीच अदालतों ने कठोर गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) के तहत दर्ज केवल दो मामलों को रद्द किया.
गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने राज्यसभा में एक प्रश्न के लिखित उत्तर में बताया कि इस अवधि के दौरान यूएपीए के तहत 6,503 व्यक्तियों के ख़िलाफ़ आरोप-पत्र दायर किए गए, जिनमें से 252 को दोषी ठहराया गया.
मंत्री द्वारा प्रस्तुत आंकड़े राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की ‘भारत में अपराध’ पर ताजा रिपोर्ट से लिए गए हैं. जिन दो मामलों को रद्द किया गया, वे 2022 के हैं और केरल की अदालतों ने उन्हें खारिज कर दिया था.
एनसीआरबी के आंकड़ों के अनुसार, 2018-2022 के बीच यूएपीए के तहत कुल 8,947 लोगों को गिरफ्तार किया गया, जिनमें से 2,633 गिरफ्तारियां जम्मू-कश्मीर में और 2,162 उत्तर प्रदेश में हुईं.
वर्ष-वार विवरण के अनुसार, 2018 में आतंकवाद-रोधी कानून के तहत 1,421 गिरफ्तारियां हुईं, 2019 में 1,948, 2020 में 1,321, 2021 में 1,621 और 2022 में 2,636 गिरफ्तारियां हुईं.
उल्लेखनीय है कि यूएपीए कानून पहली बार 1967 में लागू हुआ था, लेकिन कांग्रेस सरकार द्वारा वर्ष 2008 व 2012 और इसके बाद नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा किए गए हालिया संशोधनों ने इसे और सख्त बना दिया.
यूएपीए के प्रावधान के आरोप झेल रहे लोगों के लिए जमानत हासिल करना लगभग असंभव बना देते हैं. कानून कहता है कि अगर अदालत को लगता है कि आरोपी के खिलाफ लगाए गए आरोप प्रथमदृष्टया सही हैं तो उसे जमानत पर रिहा नहीं किया जा सकता है.
परिणामस्वरूप, यूएपीए के तहत आरोप झेल रहे ज्यादातर लोग लंबे समय तक जेलों में विचाराधीन कैदियों के रूप में पड़े रहते हैं.
