नई दिल्ली: दिल्ली स्थित छात्र संगठन भगत सिंह छात्र एकता मंच (बीएससीईएम) और फोरम अगेंस्ट कॉरपोरेटाइज़ेशन एंड मिलिटराइज़ेशन (एफएसीएएम) के सदस्यों ने आरोप लगाया है कि उनसे जुड़े कम से कम छह लोगों और नज़रिया पत्रिका में काम करने वाले एक व्यक्ति को दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने बिना किसी उचित प्रक्रिया के हिरासत में लिया और उन पर हमला किया.
19 से 26 वर्ष की आयु के इन लोगों ने दावा किया है कि एक आईएएस अधिकारी की बेटी के ठिकाने के बारे में स्पेशल सेल द्वारा ‘पूछताछ’ की आड़ में 9 जुलाई से 21 जुलाई के बीच उन्हें अत्यधिक शारीरिक और मानसिक यातना दी गई.
हिरासत की समयसीमा
पुलिस ने कथित तौर पर बीएससीईएम से जुड़े गुरकीरत (20), गौरव (23) और गौरांग (24) को 9 जुलाई को दोपहर करीब 3:30 बजे दिल्ली के बेर सराय से हिरासत में लिया. उन्होंने द वायर को बताया कि बिना किसी कानूनी प्रक्रिया का पालन किए, सादे कपड़ों में पुलिस अधिकारियों ने उन्हें जबरन हिरासत में लिया.
दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने इन छात्रों और कार्यकर्ताओं को राजधानी के विभिन्न स्थानों से हिरासत में लिया था.
दो दिन बाद 11 जुलाई को एफएसीएएम के एहतेमाम (26) और लक्षिता (बादल) (21) को दिल्ली में दोपहर लगभग 1:00 बजे हिरासत में लिया गया.
प्रोफ़ेसर और सामाजिक कार्यकर्ता सम्राट को अगले दिन 12 जुलाई को हरियाणा स्थित उनके घर से हिरासत में लिया गया. नज़रिया पत्रिका से जुड़े रुद्र को 19 जुलाई को नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर हिरासत में लिया गया.
हिरासत के बारे में द वायर से बात करते हुए बीएससीईएम सदस्य गुरकीरत ने कहा, ‘9 जुलाई को गौरव, गौरांग और मैं दिल्ली के बेर सराय में रुद्र के घर से कुछ किताबें लेने गए थे. दोपहर करीब साढ़े तीन बजे सादे कपड़ों में तीन-चार पुलिस अधिकारी आए और हमसे पूछताछ की. उन्होंने कहा, ‘तुम आतंकवादी हो, छात्र नहीं. तुम्हें हमारे साथ कार्यालय चलना होगा.’ हमने विरोध किया और उनसे वॉरंट दिखाने को कहा और उनके पुलिस पहचान पत्र मांगे. इसके बाद एक अधिकारी ने अपना पहचान पत्र दिखाया और कहा, ‘अब तुम्हें आना होगा.’
गुरकीरत ने दावा किया कि जब उन्होंने विरोध किया, तो एक पुलिसवाले ने गौरव और गौरांग दोनों को पांच-छह थप्पड़ मारे. उन्होंने कहा, ‘एक पुलिसवाले ने मुझे धक्का दिया और धमकाया भी. उन्होंने कहा, ‘मुझे परवाह नहीं कि तुम लड़की हो.’ इसके बाद, उन्होंने एक महिला कॉन्स्टेबल को बुलाया और मुझे ज़बरदस्ती पुलिस की गाड़ी में बिठा दिया.’
इसी तरह अपनी हिरासत के बारे में बताते हुए एफएसीएएम की सदस्य लक्षिता ने कहा, ‘मैं 11 जुलाई को सुबह करीब 11 बजे अहमदाबाद से दिल्ली पहुंची. दोपहर 1 बजे, कुछ पुलिसवाले मेरे घर आए और मुझे और मेरे दोस्त एहतेमाम को ज़बरदस्ती एक गाड़ी में बिठा लिया. उन्होंने हमारे फ़ोन, लैपटॉप और आईपैड ज़ब्त कर लिए और जैसे ही हम गाड़ी में बैठे, उन्होंने सभी डिवाइस एयरप्लेन मोड पर डाल दिए. उन्होंने हमें यह नहीं बताया कि हमें कहां ले जाया जा रहा है.’
उन्होंने आगे कहा, ‘हमारे खिलाफ एक एफआईआर दर्ज की गई है, लेकिन हमें उसकी एक प्रति नहीं दी गई है. जब मुझे पूछताछ के लिए नोटिस मिला (पुलिस ने उन्हें एक ऑनलाइन नोटिस भेजा था, जैसा उन्होंने बताया) तो उसमें एफआईआर नंबर लिखा था, लेकिन मुझे एफआईआर में मेरे खिलाफ दर्ज विशिष्ट आरोपों के बारे में जानकारी नहीं है.’
‘थाने नहीं ले जाया गया’
हिरासत में लिए गए कार्यकर्ताओं के अनुसार, दिल्ली पुलिस उन्हें किसी आधिकारिक थाने नहीं ले गई. द वायर से बात करने वाले छात्रों ने दावा किया कि उन्हें दिल्ली के न्यू फ्रेंड्स कॉलोनी में एक अज्ञात स्थान पर रखा गया था.
अलग-अलग दिनों में अलग-अलग जगहों से उठाए गए सभी सात लोगों को इसी जगह पर रखा गया था.
गुरकीरत और लक्षिता ने दावा किया कि वह जगह ‘कोई आम पुलिस स्टेशन’ नहीं, बल्कि एक बड़ा बंगला था, जिसके बारे में उन्हें बताया गया था कि वह दिल्ली पुलिस के स्पेशल सेल का कार्यालय है.
पूछताछ, शारीरिक यातना, धमकियां और उत्पीड़न
छात्रों और कार्यकर्ताओं ने आरोप लगाया है कि हिरासत में लिए जाने के बाद पुलिस द्वारा की गई पूछताछ उनके साथ उत्पीड़न और शारीरिक व मानसिक यातना का एक तरीका थी.
कार्यकर्ताओं ने आरोप लगाया कि गुरकीरत को डराने के लिए गौरव और गौरांग को उसके सामने निर्वस्त्र कर दिया गया और चमड़े के कोड़े से उनके तलवों पर बेरहमी से पीटा गया.
गुरकीरत ने कहा, ‘वे हमें एक कमरे में ले गए जहां से हम शीशे से अगले कमरे में हो रही गतिविधियों को देख सकते थे. वहां पुलिस अधिकारी ने मेरे दोस्तों गौरव और गौरांग को बुलाया, उनके कपड़े उतारे और उन्हें एक ठंडी स्टील की मेज पर लिटा दिया. फिर, चमड़े की बेल्ट से अधिकारियों ने उनके पैरों के तलवों पर बार-बार कोड़े मारे. वे उन्हें पीटते और खड़े होने के लिए कहते, और जब वे खड़े नहीं हो पाते, तो वे उन्हें फिर से पीटते.’
उन्होंने कहा, ‘यह किसी पूछताछ प्रक्रिया के लिए नहीं था, यह सिर्फ़ मुझे यह दिखाने के लिए किया गया था कि मेरे साथ क्या हो सकता है. इसके बाद वे मुझे उसी कमरे में ले गए और उसी तरह पीटा.’
हालांकि गुरकीरत के पूरे कपड़े नहीं उतारे गए, लेकिन सादे कपड़ों में मौजूद महिला पुलिसकर्मियों ने उसे प्रताड़ित किया और चमड़े के कोड़े से उसके पैर पर मारा. उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि इससे पहले पुलिसकर्मियों ने उन्हें थप्पड़ मारे और उसके बाल खींचे.
द वायर से बात करते हुए छात्रों और कार्यकर्ताओं ने दावा किया कि अंत में उन्हें ‘कागज़ के कई खाली पन्नों और झूठे बयानों’ पर हस्ताक्षर करने के लिए मजबूर किया गया, यहां तक कि उन्हें पढ़ने की भी अनुमति नहीं दी गई.
दिल्ली स्कूल ऑफ जर्नलिज्म के छात्र गौरव, जो अब बिहार के नवादा स्थित अपने गृहनगर लौट गए हैं, ने द वायर से अपनी आठ दिनों की यातना के बारे में बताया.
उन्होंने कहा, ‘गुरकीरत, गौरांग और मुझे 9 जुलाई को बेर सराय से उठाया गया था. पहले तीन दिनों तक पुलिस ने हमें खूब प्रताड़ित किया. वे हमें रात के डेढ़-दो बजे जगाते और पूछताछ कक्ष में ले जाते. वहां वे हमें पूरी तरह नंगा कर देते, ज़मीन पर लिटा देते और बेल्ट और डंडों से पीटते.’
उन्होंने आगे कहा, ’17 जुलाई को रिहाई के दिन उन्होंने हमसे कई दस्तावेज़ों पर हस्ताक्षर करने को कहा. उनमें से कुछ कोरे कागज़ थे. हमें धमकी दी जा रही थी कि अगर हमने हस्ताक्षर नहीं किए, तो वे हमें रिहा नहीं करेंगे.’
जब उनसे पूछा गया कि पूछताछ के दौरान पुलिस ने उनसे क्या पूछा, तो उनमें से चार (लक्षिता, गौरव, गुरकीरत और एहतेमाम) ने बताया कि सबसे पहला और सबसे लगातार सवाल आईएएस अधिकारी अर्चना वर्मा की बेटी वालिका के बारे में था.
पुलिस लगातार पूछ रही थी, ‘वालिका कहां है?’ वे बार-बार ऐसे सवाल पूछ रहे थे, जैसे ‘वह घर से क्यों गई?’ और क्या किसी ने उसे ‘भागने’ में मदद की थी.
लक्षिता और गुरकीरत ने दावा किया कि सात बंदियों में से एहतेमाम को सबसे गंभीर और अमानवीय यातना का सामना करना पड़ा. उनका आरोप है कि पूरी हिरासत के दौरान जामिया मिलिया इस्लामिया से पढ़ाई करने वाले एफएसीएएम के वकील-कार्यकर्ता एहतेमाम को उनकी ‘मुस्लिम पहचान’ के कारण जानबूझकर और उससे भी ज़्यादा क्रूरता से निशाना बनाया गया.
उन्होंने कहा कि उन्हें लगातार पीटा गया और ‘मुल्ला’ और ‘कटवा’ जैसे इस्लामोफोबिक गालियों का सामना करना पड़ा.
लक्षिता ने दावा किया कि पुलिस ने उनके और एहतेमाम के रिश्ते को ‘लव जिहाद’ के पहलू से जोड़ने की भी कोशिश की. दक्षिणपंथी समूहों द्वारा इस्तेमाल किया जाने वाला एक नैरेटिव है जो मुस्लिम पुरुषों पर हिंदू (गैर-मुस्लिम) महिलाओं को प्यार, और शादी का वादा करके उनका धर्मांतरण करने का झूठा आरोप लगाता है.
आईएएस अधिकारी और उनकी बेटी का हिरासत से क्या संबंध है?
लक्षिता और गुरकीरत ने दावा किया कि उन्हें लगातार प्रताड़ित किए जाने का मुख्य कारण एक वरिष्ठ नौकरशाह आईएएस अधिकारी अर्चना वर्मा और उनकी बेटी वालिका वर्मा के बीच एक ‘व्यक्तिगत विवाद’ है.
कुछ बंदियों के अनुसार, हरियाणा के जिंदल विश्वविद्यालय से कानून स्नातक और नजरिया पत्रिका की संपादकीय सदस्य 24 वर्षीय वालिका ने अपनी मां के साथ वैचारिक मतभेदों के कारण अपना घर छोड़ दिया था और दिल्ली के बेर सराय में स्वतंत्र रूप से रह रही थी.
गुरकीरत ने कहा, ‘हमें नहीं पता कि वालिका कहां है. उसके अपनी मां से वैचारिक मतभेद थे और वह घर छोड़कर चली गई थी. लेकिन पुलिस हमारे पीछे पड़ी है और हमें बेरहमी से प्रताड़ित कर रही है. पूछताछ के दौरान उन्होंने बार-बार पूछा कि वालिका कहां है.’
लक्षिता ने यह भी कहा कि उन्हें अभी तक एफआईआर की कॉपी नहीं दी गई है, जिसका नंबर उन्हें मिले नोटिस पर लिखा था. उन्हें उन पर लगे आरोपों की पूरी जानकारी नहीं है.
उन्होंने कहा, ‘एक एफआईआर दर्ज हो गई है. मुझे भी एक ऑनलाइन नोटिस मिला है, मेरे पास वह नोटिस है, जिसमें मुझे उस एफआईआर के तहत जांच के लिए बुलाया गया है. लेकिन पुलिस हमें एफआईआर नहीं दे रही है, कुछ भी नहीं दे रही है. पुलिस लगातार कह रही थी, ‘अगर तुम दिल्ली आओगे, तो हम तुम्हें गिरफ्तार कर लेंगे.’
उन्होंने आगे बताया कि पुलिस से उन्हें जो नोटिस मिला था, वह 20 जुलाई को उनके माता-पिता के मोबाइल पर ऑनलाइन भेजा गया था.
अभिभावकों को तलब किया गया
इस पूरे मामले में हिरासत में लिए गए छात्रों के अभिभावकों को भी उत्पीड़न का सामना करना पड़ा है. लक्षिता और गुरकीरत – दोनों ने बताया कि उनके अभिभावकों को दिल्ली बुलाया गया और बच्चों को रिहा करने के लिए उनसे जबरन दस्तावेज़ों पर हस्ताक्षर करवाए गए.
लक्षिता ने कहा, ‘उन्होंने हमारे अभिभावकों से लिखवाया और उन पर दस्तखत करवाए कि अगर वे हमें वापस दिल्ली भेजेंगे, तो पुलिस हमें गिरफ्तार कर लेगी. इसी डर से मेरे अभिभावक मुझे किसी से बात नहीं करने दे रहे हैं और घर पर ही रहने का दबाव बना रहे हैं.’
अन्य छात्रों के अभिभावक भी अपने बच्चों को घर वापस ले गए और उन्हें किसी भी तरह की कानूनी या सार्वजनिक कार्रवाई से दूर रखा.
इस भयावह हिरासत के बाद एहतेमाम फिलहाल अपने परिवार के साथ लखनऊ में हैं.
द वायर से बात करते हुए उन्होंने कहा, ‘पुलिस ने मुझे शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित किया. पूछताछ के दौरान वे मुझसे बार-बार पूछते रहे कि वालिका कहां है, जो मुझे नहीं पता था. उन्होंने मुझे ‘मुल्ला’ कहा और कहा कि वे मेरी दोस्त लक्षिता के साथ ‘लव जिहाद’ का मामला बनाएंगे. उन्होंने मेरे घर पर हथियार रखने की धमकी दी और कहा कि वे मेरे माता-पिता को हथियारों की तस्करी के आरोप में गिरफ्तार कर लेंगे.’
उन्होंने दावा किया कि जब पुलिस ने उन्हें रिहा किया, तो उन्होंने उनका सामान वापस नहीं किया.
उन्होंने आगे कहा, ‘पुलिस ने मेरा फ़ोन, मेरा बटुआ, मेरा बार एसोसिएशन का पहचान पत्र, आधार कार्ड, पैन कार्ड और सबसे ज़रूरी बात, उन्होंने मेरे फ़्लैट की चाबियां भी नहीं लौटाईं, जो उन्होंने शुरू में मुझसे ली थीं.’
सात बंदियों में रुद्र सबसे काम उम्र हैं और सिर्फ़ 19 साल के हैं. वे दिल्ली विश्वविद्यालय के ज़ाकिर हुसैन कॉलेज में पढ़ते हैं और नज़रिया पत्रिका के लिए वालिका के साथ काम कर रहे थे.
रुद्र 19 जुलाई को नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर पुलिस द्वारा हिरासत में लिए गए आखिरी व्यक्ति थे, और उन्हें तब हिरासत में लिया गया जब शुरू में हिरासत में लिए गए कुछ लोगों को पहले ही रिहा कर दिया गया था.
9 जुलाई को छात्र कार्यकर्ताओं की हिरासत से लेकर 18 जुलाई तक नज़रिया मैगज़ीन अपने सोशल मीडिया हैंडल जैसे फेसबुक, एक्स, इंस्टाग्राम और अपनी वेबसाइट पर उनकी रिहाई की मांग करता रहा है. हालांकि, उनके फेसबुक पेज पर आखिरी पोस्ट 18 जुलाई को थी.
19 जुलाई को रुद्र की हिरासत के बाद किसी भी प्लेटफॉर्म पर कोई और पोस्ट नहीं किया गया.
हिरासत में लिए गए छात्रों को 16 जुलाई से 21 जुलाई के बीच चरणों में रिहा किया गया. आठ दिनों की हिरासत के बाद 16 जुलाई की रात को गुरकीरत को सबसे पहले रिहा किया गया. उनकी रिहाई के बाद ही बाहरी दुनिया को इस मामले और अन्य छात्रों की हिरासत के बारे में ठोस जानकारी मिली.
अगले दिन 17 जुलाई को लक्षिता, गौरव और गौरांग को रिहा कर दिया गया. एहतेमाम, जिन्हें सबसे गंभीर शारीरिक और मानसिक यातनाएं झेलनी पड़ी थीं, 18 जुलाई को रिहा कर दिया गया. सम्राट, जिन्हें हरियाणा में गिरफ्तार किया गया था, 19 जुलाई को रिहा कर दिया गया. अंत में रुद्र, जिन्हें आखिर में हिरासत में लिया गया था, 21 जुलाई को रिहा कर दिया गया.
यह पहली बार नहीं है जब बीएससीईएम के छात्रों को हिरासत में लिया गया हो
पिछले साल मई में लोकसभा चुनावों के दौरान बीएससीईएम ने दिल्ली में दीवारों पर पेंटिंग बनाकर चुनाव बहिष्कार का आह्वान किया था. संगठन की दो छात्राओं, लक्षिता और उत्तरा को एक परीक्षा के बाद कॉलेज से बाहर निकलते समय पुलिस ने हिरासत में ले लिया था.
कुछ महीने पहले बीएससीईएम से जुड़े छात्रों ने आरोप लगाया था कि जेएनयू में बस्तर में अत्याचारों को दर्शाने वाली एक दीवार पेंटिंग के बाद चार सदस्यों – गौरव, गौरांग, किरण और राहुल – को दिल्ली के वसंत विहार पुलिस स्टेशन में 15 घंटे तक अवैध रूप से हिरासत में रखा गया था, जहां उनके साथ कथित तौर पर मारपीट भी की गई थी.
द वायर ने दिल्ली पुलिस से टिप्पणी के लिए संपर्क किया, लेकिन फ़ोन पर संपर्क नहीं हो पाया. हमने दिल्ली पुलिस के आधिकारिक ईमेल pro@delhipolice.gov.in पर भी संपर्क किया है. जवाब मिलने पर इस खबर को अपडेट कर दिया जाएगा.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)
