नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले की सुनवाई के दौरान इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक फैसले को अब तक का सबसे खराब आदेश बताते हुए फैसला सुनाने वाले जज जस्टिस प्रशांत कुमार को सेवानिवृत्ति तक आपराधिक मामलों की सुनवाई करने से रोक दिया है.
ख़बरों के मुुताबिक, शीर्ष अदालत संबंधित मामले में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश प्रशांत कुमार द्वारा दीवानी विवाद में आपराधिक मुकदमा चलाने की अनुमति देने से नाराज़ थी, जो मूलत: न्याय की बुनियादी समझ है.
इस संबंध में जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने 4 अगस्त के अपने आदेश में कहा,’ इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश, जस्टिस प्रशांंत कुमार को उच्च न्यायालय के एक अनुभवी वरिष्ठ न्यायाधीश के साथ एक खंडपीठ में बैठाएंगे. हम यह भी निर्देश देते हैं कि संबंधित न्यायाधीश को उनके पद छोड़ने तक कोई आपराधिक निर्णय नहीं सौंपा जाएगा. अगर किसी समय उन्हें एकल न्यायाधीश के रूप में बैठाया भी जाता है, तो उन्हें कोई आपराधिक निर्णय नहीं सौंपा जाएगा.’
मालूम हो कि यह मामला मेसर्स ललिता टेक्सटाइल कंसर्न, जो कपड़ा निर्माण में इस्तेमाल होने वाले धागे का थोक और खुदरा व्यापार करती है और मेसर्स शिखर केमिकल्स, जो मेसर्स ललिता टेक्सटाइल कंसर्न द्वारा आपूर्ति किए गए धागे से बने कपड़े के निर्माण और बिक्री के कारोबार में शामिल थी, के मालिकों के बीच विवाद से जुड़ा था.
दो कंपनियों के बीच पैसे के लेन-देन का मामला
ललिता टेक्सटाइल कंसर्न ने शिखर केमिकल्स को 52,34,385 रुपये का धागा आपूर्ति किया था, जिसमें से 47,75,000 रुपये का भुगतान किया गया था और शेष 4,59,385 रुपये अगस्त 2019 से बकाया थे.
ललिता टेक्सटाइल कंसर्न के शिकायतकर्ता मालिक के अनुसार, उन्होंने भुगतान के लिए दूसरे पक्ष से टेलीफोन पर संपर्क करने के कई प्रयास किए, लेकिन कोई राशि नहीं दी गई.
इस मामले में जीएसटी विभाग ने भी कार्यवाही शुरू की, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ. उन्होंने आगे बताया कि उन्होंने अपने वकील के माध्यम से दूसरे पक्ष को एक कानूनी नोटिस भी भेजा, लेकिन फ़ैक्टरी/घर/कार्यालय के पते पर भेजे गए सभी नोटिस ‘परिसर बंद’ जैसी टिप्पणियों के साथ वापस आ गए.
उन्होंने धोखाधड़ी के लिए आपराधिक कार्रवाई शुरू करने हेतु फिर से वसूली नोटिस और कानूनी नोटिस भेजे, लेकिन वे भी वापस आ गए.
इसके बाद उन्होंने पुलिस में शिकायत दी, लेकिन कोई एफआईआर दर्ज नहीं हुई. फिर उन्होंने मजिस्ट्रेट कोर्ट का रुख किया, जिसने शिकायत का संज्ञान लेते हुए भारतीय दंड संहिता की धारा 406 (आपराधिक विश्वासघात) के तहत दंडनीय अपराध के लिए समन जारी किया.
इसे दूसरे पक्ष ने उच्च न्यायालय में चुनौती दी और कहा कि मामला दीवानी प्रकृति का है. इसे उच्च न्यायालय के जस्टिस प्रशांत कुमार द्वारा खारिज कर दिया गया.
इसके बाद मामला सर्वोच्च न्यायालय पहुंचा, जहां अदालत ने जस्टिस प्रशांत कुमार को कड़ी फटकार लगाई है.
‘सबसे खराब और सबसे गलत आदेशों में से एक’
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा, ‘पूरे सम्मान और विनम्रता के साथ हम यह कहने के लिए बाध्य हैं कि यह आदेश सबसे खराब और सबसे त्रुटिपूर्ण आदेशों में से एक है, जो हमें इस न्यायालय के न्यायाधीशों के रूप में अपने कार्यकाल में मिले हैं.’
शीर्ष अदालत ने आगे कहा, ‘संबंधित न्यायाधीश ने न केवल खुद को एक दयनीय स्थिति में पहुंचाया है, बल्कि न्याय का भी मज़ाक उड़ाया है. हम यह समझने में असमर्थ हैं कि उच्च न्यायालय स्तर पर भारतीय न्यायपालिका में क्या गड़बड़ है. कई बार हम यह सोचकर हैरान रह जाते हैं कि क्या ऐसे आदेश किसी बाहरी विचार से पारित किए जाते हैं या यह कानून की सरासर अज्ञानता है. जो भी हो, ऐसे बेतुके और गलत आदेश पारित करना क्षमा योग्य नहीं हैं.’
अदालत ने कहा, ‘हमें इस बात पर कोई आश्चर्य नहीं हुआ कि मजिस्ट्रेट ने कानून की स्थिति के बारे में पूरी तरह से अनभिज्ञता दिखाई और मामले को आईपीसी की धारा 420 के तहत दंडनीय धोखाधड़ी और आईपीसी की धारा 406 के तहत दंडनीय आपराधिक विश्वासघात के दायरे में ले आए. हालांकि, हमें उम्मीद थी कि कम से कम उच्च न्यायालय इन दोनों अपराधों के बीच के सूक्ष्म अंतर और धोखाधड़ी तथा आपराधिक विश्वासघात के अपराध के लिए आवश्यक तत्वों को समझेगा.’
अदालत ने आगे कहा कि इस मामले का ‘सबसे परेशान करने वाला हिस्सा’ वह ‘तरीका’ है जिससे उच्च न्यायालय ने याचिकाकर्ता द्वारा दायर निरस्तीकरण आवेदन और उसके आदेश के पैरा 12 में की गई टिप्पणियों पर विचार किया.
न्यायाधीश ने यहां तक कहा है कि शेष राशि की वसूली के लिए शिकायतकर्ता को दीवानी उपाय अपनाने के लिए कहना बहुत अनुचित होगा क्योंकि दीवानी मुकदमे का फैसला होने में लंबा समय लग सकता है और इसलिए शिकायतकर्ता को शेष राशि की वसूली के लिए आपराधिक कार्यवाही शुरू करने की अनुमति दी जानी चाहिए.
पीठ ने कहा, ‘क्या उच्च न्यायालय की यह समझ है कि यदि अंत में अभियुक्त दोषी ठहराया जाता है, तो निचली अदालत उसे शेष राशि प्रदान करेगी? पैरा 12 में दर्ज टिप्पणियां चौंकाने वाली हैं.’
मामले पर नए सिरे से विचार करें: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उच्च न्यायालय से अपेक्षा की जाती है कि वह शिकायत में लगाए गए आरोपों की प्रकृति को समझे.
पीठ ने आगे कहा, ‘वास्तव में उच्च न्यायालय ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि विशुद्ध रूप से दीवानी विवाद के मामले में शिकायतकर्ता द्वारा शुरू की गई आपराधिक कार्यवाही उचित है क्योंकि शिकायतकर्ता को दीवानी मुकदमा दायर करके शेष राशि वसूलने में काफी समय लग सकता है.’
सुप्रीम कोर्ट ने उच्च न्यायालय के आदेश को रद्द कर दिया और मामले को नए सिरे से विचार करने के लिए हाईकोर्ट को वापस भेज दिया.
अदालत ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से कहा कि वे इस मामले को किसी अन्य उच्च न्यायालय के न्यायाधीश को सौंप दें, जैसा वे उचित समझें.
इस मामले में अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा, ‘…हम निर्देश जारी करने के लिए बाध्य हैं…यह ध्यान में रखते हुए कि विवादित आदेश संबंधित न्यायाधीश का एकमात्र त्रुटिपूर्ण आदेश नहीं है जिस पर हमने पहली बार गौर किया है. हमने समय-समय पर ऐसे कई त्रुटिपूर्ण आदेशों पर गौर किया है.’
