भारत छोड़ो आंदोलन के तीन सितारे: यूसुफ मेहर अली, अरुणा आसफ अली और मातंगिनी हाज़रा

दूसरे विश्व युद्ध के दौरान आठ अगस्त, 1942 को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने बंबई के ग्वालिया टैंक मैदान से महात्मा गांधी की अगुवाई में 'करो या मरो' के नारे के साथ 'भारत छोड़ो' आंदोलन शुरू किया, तो देशवासियों को ब्रिटिश सत्ता के हाथों बेहद निर्मम दमन चक्र झेलना पड़ा. आज इस आंदोलन की कोई भी चर्चा यूसुफ मेहर अली और दो वीरांगनाओं- अरुणा आसफ अली और मातंगिनी हाजरा के बिना अधूरी है.

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भारत छोड़ो आंदोलन के तीन सितारे-यूसुफ मेहर अली, अरुणा आसफ अली और मातंगिनी हाज़रा. (फोटो साभार: विकिपीड़िया/ सोशल मीडिया)

‘क्विट इंडिया’ कहिए, ‘भारत छोड़ो’ अथवा ‘अगस्त क्रांति.’ दूसरे विश्व युद्ध के दौरान आठ अगस्त, 1942 को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने बंबई (अब मुंबई) के ग्वालिया टैंक मैदान से महात्मा गांधी की अगुवाई में उनके ‘करो या मरो’ के नारे के साथ यह आंदोलन शुरू किया, तो देशवासियों को अपनी छाती पर सवार ब्रिटिश सत्ता के हाथों बेहद निर्मम व क्रूर दमन चक्र झेलना पड़ा. कोई एक लाख देशवासियों ने जेलों की यातनाएं सहकर इस दमन चक्र की कीमत चुकाई तो सैकड़ों ने अपने प्राणों की आहुति देकर.

दमन का यह सिलसिला इस कारण कुछ ज्यादा ही क्रूर हो उठा था कि ब्रिटिश हुक्मरानों को अपने अंजाम का अहसास हो गया था. उनको लगने लगा था कि अब इस देश में उसके दिन ज्यादा नहीं रह गए हैं और प्रायः हर देशवासी को आलोड़ित कर देने वाला यह आंदोलन भारतीयों के आज़ादी की मंजिल तक पहुंचने में सबसे निर्णायक सिद्ध होने वाला है.

न वामपंथी, न दक्षिणपंथी

गौरतलब है कि यह स्थिति तब थी, जब भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानी वामपंथी व दक्षिणपंथी दोनों शक्तियों ने अलग-अलग कारणों से खुद को इस आंदोलन से किनारे कर रखा था.

मोहम्मद अली जिन्ना की मुस्लिम लीग और विनायक दामोदर सावरकर की हिंदू महासभा ने भी आंदोलन का साथ देना गवारा नहीं ही किया था. हिंदू महासभा के एक और नेता श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने तो बंगाल के अंग्रेज गवर्नर जॉन हरबर्ट को इस आंदोलन को कठोरता से दबाने के लिए पत्र तक लिख डाला था.

आंदोलन का ऐलान होते ही सत्ताधीशों ने कांग्रेस और उसकी चार प्रांतीय कमेटियों को क्रिमिनल लॉ एमेडमेंड ऐक्ट, 1908 के तहत गैरकानूनी घोषित कर दिया और डिफेंस ऑफ इंडिया रूल 56 के तहत सभाओं व प्रदर्शनों आदि पर प्रतिबंध लगा दिया था. इतना ही नहीं, उन्होंने महात्मा गांधी समेत प्रायः सारे बड़े कांग्रेसी नेताओं को गिरफ्तार कर जेलों में ठूंस दिया था, जिसके चलते अनेक जगहों पर आंदोलन की कमान समाजवादियों के हाथ आ गई थी.

दूसरी ओर, अनेक अन्य जनप्रवाहों ने भी स्वेच्छया, अपनी तरह से, यानी महात्मा के ‘करो या मरो’ के नारे की अपनी अलग व्याख्या के तहत, खुद को आंदोलन में झोंक दिया था. इसके चलते कुछ प्रेक्षक यह भी कहने लगे थे कि आंदोलन कांग्रेस के हाथ से निकल गया है. कहते भी क्यों नहीं, कांग्रेसियों में भी ‘करो या मरो’ को लेकर अलग-अलग धारणाएं व विचार थे.

इसकी एक मिसाल यह है कि इलाहाबाद में लंबी अवधि तक पुलिस को छकाते रहे लालबहादुर शास्त्री ने ‘करो या मरो’ के नारे को ‘मरो नहीं, मारो’ में बदल डाला था. लेकिन आंदोलन के बीच अगर कोई सबसे ज्यादा खुश था तो वे थे यूसुफ मेहर अली.

यूसुफ़ मेहर अली यानी उस वक्त के बॉम्बे (अब मुंबई) के सबसे कम उम्र के नवनिर्वाचित मेयर. इस आंदोलन के ही साल, यानी 1942 में, जब वे जेल में थे, कांग्रेस ने उनको इस पद के चुनाव के लिए अपना प्रत्याशी नामित किया था.

तब इस नामांकन का समर्थन करते हुए सरदार वल्लभभाई पटेल ने कहा था कि यूसुफ मेहर अली के लिए व्यक्तिगत संतुष्टि का मतलब साथी देशवासियों की भलाई सुनिश्चित करना है. चुनाव जीतने के बाद यूसुफ ने भी वल्लभभाई को ग़लत सिद्ध नहीं होने दिया था और प्रभावी नागरिक सेवा सुनिश्चित करके बेहद लोकप्रिय हो गए थे.

लेकिन उनके लिए भारत छोड़ो आंदोलन की सफलता से खुश होने का इसके अतिरिक्त भी एक कारण था. यह कि इसका नाम भी उन्होंने ही सुझाया था, जो खासा चल निकला था.

जानकारों के अनुसार, महात्मा गांधी ने बंबई में अपने सहयोगियों से स्वतंत्रता के इस निर्णायक आंदोलन के लिए सबसे अच्छा नारा सुझाने को कहा तो सबसे पहले किसी ने ‘गेट आउट’ सुझाया. लेकिन महात्मा को लगा कि यह शिष्ट नहीं है. तब चक्रवर्ती राजगोपालाचारी ने ‘रिट्रीट’ एवं ‘विदड्रा’ नाम सुझाए, लेकिन महात्मा को वे भी नहीं जमे.

यूसुफ़ मेहर अली

तब यूसुफ मेहर अली ने महात्मा को एक धनुष भेंट किया, जिस पर ‘क्विट इंडिया’ गुदा हुआ था. इस पर महात्मा ने कहा, आमीन यानी ऐसा ही हो और यही ‘क्विट इंडिया’ आंदोलन का नाम हो गया, क्विट इंडिया यानी भारत छोड़ो. चूंकि यह अगस्त महीने में शुरू हुआ, बाद में अनेक लोग इसको अगस्त क्रांति भी कहने लगे.

यूसुफ़ मेहर अली के निकट यह नामकरण इस मायने में दुगुनी खुशी देने वाला था कि इससे पहले 1927 में साइमन कमीशन के बहिष्कार के कांग्रेस के आंदोलन को ‘साइमन कमीशन गो बैक’ (साइमन कमीशन वापस जाओ) का नारा भी उन्होंने ही दिया था.

इसी आंदोलन के दौरान 30 अक्टूबर, 1928 को लाहौर में हुए बर्बर पुलिस लाठीचार्ज के दौरान घायल लाला लाजपत राय बाद में शहीद हो गए, तो देश में गुस्से की लहर दौड़ गई थी. यूसुफ मेहर अली को इसके बाद ही पहली बार जेल में डाला गया, जो उनके जेल जाने के सिलसिले की शुरुआत सिद्ध हुआ. अनंतर दांडी मार्च में उनके योगदान से ब्रिटिश सरकार इतनी चिढ़ी कि उनको वकालत करने तक से रोक दिया.

अफसोस कि आज़ादी के बाद यूसुफ की सेवाओं को जल्दी ही भुला दिया गया. हालांकि, उन्होंने तब भी सामाजिक और राजनीतिक उद्देश्यों के लिए काम करना जारी रखा था और उनकी देशसेवाएं न महत्वहीन थीं, न ही विस्मृति की पात्र.

क्योंकि वे सिर्फ नारों के लेखक नहीं, समाजवादी विचारधारा से ओतप्रोत स्वतंत्रता सेनानी भी थे. उन्होंने कई किसान और मजदूर आंदोलनों में भागीदारी भी की थी और उनका नेतृत्व भी. वे नेशनल मिलीशिया और बॉम्बे यूथ लीग के संस्थापक तो थे ही, 1934 में जयप्रकाश नारायण व मीनू मसानी आदि के साथ कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी की स्थापना में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका थी.

गौरतलब है कि 23 सितंबर 1903 को बॉम्बे में पैदा हुए यूसुफ एक संपन्न पारिवारिक पृष्ठभूमि से आते थे और उन्होंने कलकत्ता और मुंबई से शिक्षा प्राप्त की थी. वे महात्मा गांधी के अहिंसक प्रतिरोध और सामाजिक समानता के दर्शन से बहुत प्रभावित थे.

विडंबना यह कि जीवन भर किसानों व मजदूरों के लिए इंसाफ की हिमायत करने वाले यूसुफ के साथ उम्र ने बड़ी नाइंसाफी की और 31 मई, 1950 को उनके 47वें वर्ष में ही उनको हमसे छीन लिया.

बहरहाल, भारत छोड़ो आंदोलन और यूसुफ द्वारा उसके नामकरण की कोई भी चर्चा तब तक पूरी नहीं हो सकती, जब तक इस आंदोलन की दो वीरांगनाओं-अरुणा आसफ अली और मातंगिनी हाज़रा-को उसमें न शामिल किया जाए.

जहां, यूसुफ़ ने इस आंदोलन का नामकरण किया, वहीं इन दोनों वीरांगनाओं ने क्रमशः अपने साहस और शहादत से उसकी शौर्यगाथा को सुनहरी करने में कुछ भी उठा नहीं रखा.

अरुणा आसफ अली

‘ग्रैंड ओल्ड लेडी’ कहलाने वाली अरुणा आसफ अली को खास तौर पर उनके उस अदम्य साहस के लिए याद किया जाता है, जो उन्होंने नौ अगस्त, 1942 को बॉम्बे के ऐतिहासिक ग्वालिया टैंक (अगस्त क्रांति) मैदान में प्रदर्शित किया था.

जैसा कि पहले बता आए हैं, इससे एक दिन पहले आठ अगस्त को इसी मैदान से आंदोलन के ऐलान के फौरन बाद ब्रिटिश सरकार सारे बड़े कांग्रेस नेताओं को गिरफ्तार कर भीषण दमन पर उतर आई थी. उसने सोचा था कि अब कांग्रेस को ग्वालिया टैंक मैदान में तिरंगा फहराने वाला भी कोई नहीं मिलेगा. लेकिन साहस की पुतली अरुणा ने न सिर्फ वहां कांग्रेस कार्यकर्ताओं को नेतृत्व प्रदान किया, बल्कि पुलिस को चकमा देकर मैदान में तिरंगा भी फहरा दिया.

लेकिन यह तो सिर्फ शुरुआत थी. स्वतंत्रता आंदोलन में उनकी भूमिगत सक्रियताओं से क्रुद्ध अंग्रेजों द्वारा उनकी सारी संपत्ति जब्त कर लिए जाने के बावजूद उन्होंने आत्मसमर्पण नहीं किया, न ही कभी पुलिस की पकड़ में आईं. आज़ादी के ऐलान तक वे निर्भयता से देश के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग भूमिकाओं में अलख जगाती रहीं.

1930, 1932 और 1941 के व्यक्तिगत सत्याग्रह के दौरान तो वे जेल गई ही थीं, डाॅ. राममनोहर लोहिया के साथ कांग्रेस की मासिक पत्रिका ‘इंकलाब’ का संपादन और ऊषा मेहता के साथ गुप्त रेडियो स्टेशन से प्रसारण भी किया था.

29 जुलाई, 1996 को 87 साल की अवस्था में संसार को अलविदा कहते वक्त तक उनकी झोली में अंतरराष्ट्रीय लेनिन पुरस्कार, ऑर्डर ऑफ लेनिन, जवाहरलाल नेहरू पुरस्कार और पद्मविभूषण आदि सम्मान. मरणोपरांत उन्हें देश का सबसे बड़ा नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ भी दिया गया.

मातंगिनी हाज़रा

मातंगिनी हाज़रा की बात करें, तो इस आंदोलन में सितंबर, 1942 में पश्चिम बंगाल के तामलूक शहर के थाने पर प्रदर्शन के दौरान उन्होंने पुलिस की तीन गोलियां झेलने के बाद भी अपने हाथ के तिरंगे की आन पर आंच नहीं आने दी थी.

आठ सितंबर को वहां गोरी पुलिस ने आंदोलनकारियों पर गोली चलाई, तो उन्होंने तुरंत जवाब देने के बजाय 20 दिन तक उसके प्रतिरोध की व्यापक तैयारी की. फिर 28 सितंबर को उग्र होकर शेष देश से तामलुक का संपर्क काट दिया.

अगले दिन कोई छह हजार आंदोलनकारियों के जत्थे का, जिसमें अधिकतर महिलाएं थीं, नेतृत्व करती हुई मातंगिनी हाज़रा जैसे ही शहर पहुंचीं और अपनी मंजिल की ओर जाने लगीं, पुलिस ने निषेधाज्ञा के हवाले से उन्हें रोकने की कोशिश की. लेकिन मातंगिनी हाथ में तिरंगा लिए आगे बढ़ती और वंदेमातरम का उद्घोष करती रहीं.

फिर क्या था, पुलिस ने गोलीबारी आरंभ कर दी. उसकी दो गोलियां मातंगिनी के दोनों हाथों में और एक माथे पर आ लगी. इसके बावजूद वे तिरंगे को मजबूती से पकड़े रहीं और जब तक निष्प्राण नहीं हो गईं, उसे भूमि पर नहीं गिरने दिया.

उस दिन पुलिस फायरिंग में उनके अलावा 43 आंदोलनकारी शहीद हुए, लेकिन उनका मनोबल नहीं टूटा. वे तामलुक व कोनताई में आजाद ‘ताम्रलिप्ता जातीय सरकार’ गठित करने में सफल रहे जो 1945 तक चली. आंदोलन के दौरान ऐसी दो सरकारें उत्तर प्रदेश के बलिया और महाराष्ट्र के सतारा में भी बनी थीं.

अपने बचपन में बाल विवाह के अभिशाप से पीड़ित रही मातंगिनी ने 1905 के स्वदेशी आंदोलन, फिर नमक सत्याग्रह और सविनय अवज्ञा आंदोलन में भी हिस्सेदारी की थी. उन्होंने मुर्शिदाबाद जेल में छह माह का सश्रम कारावास भी झेला था.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)