श्रीनगर: जम्मू और कश्मीर प्रशासन ने केंद्र शासित प्रदेश में ‘अलगाववाद को बढ़ावा देने’ और ‘भारत के खिलाफ हिंसा भड़काने’ के आरोप में 25 पुस्तकों को जब्त करने का आदेश दिया है. इन किताबों में से कुछ शीर्ष भारतीय और विदेशी लेखकों सहित जाने-माने इतिहासकारों द्वारा लिखी गई हैं.
इस संबंध में जम्मू-कश्मीर के गृह विभाग, जिसके प्रमुख उपराज्यपाल मनोज सिन्हा हैं, द्वारा मंगलवार (5 अगस्त) को जारी एक आदेश में कहा गया है कि ये किताबें जम्मू-कश्मीर को लेकर ‘एक गलत नैरेटिव का प्रचार करती हैं’ जो युवाओं को ‘हिंसा और आतंकवाद’ की ओर गुमराह कर रही हैं.
मालूम हो कि यह आदेश 2019 में भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार द्वारा अनुच्छेद 370 को हटाए जाने की छठी वर्षगांठ पर जारी किया गया है. इस अनुच्छेद के हटने के बाद जम्मू-कश्मीर को राज्य से केंद्र शासित प्रदेश में विभाजित कर दिया गया था.
ताज़ा आदेश में जिन पुस्तकोंं को प्रतिबंधित किया गया है, उनमें से कुछ प्रकाशन उद्योग के प्रमुख नामों जैसे पेंगुइन, ब्लूम्सबरी, हार्पर कॉलिन्स, पैन मैकमिलन इंडिया, रूटलेज और वर्सो बुक्स द्वारा प्रकाशित की गई हैं, और अब गृह विभाग के आदेश का मतलब है कि ये प्रकाशन अब इन पुस्तकों का वितरण या पुनर्मुद्रण नहीं कर पाएंगे.
इन पुस्तकों की सूची में भारतीय संवैधानिक विशेषज्ञ और बुद्धिजीवी एजी नूरानी की बहुप्रशंसित पुस्तक ‘द कश्मीर डिस्प्यूट’, ब्रिटिश लेखिका और इतिहासकार विक्टोरिया स्कोफील्ड की ‘कश्मीर इन कॉन्फ्लिक्ट – इंडिया, पाकिस्तान एंड द अनएंडिंग वॉर’, बुकर पुरस्कार विजेता अरुंधति रॉय की ‘आज़ादी’ और लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के प्रोफेसर सुमंत्र बोस की ‘कंटेस्टेड लैंड्स’ शामिल हैं.
उल्लेखनीय है कि गृह विभाग के आदेश में कहा गया है कि इन पुस्तकों को ‘भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 की धारा 98 के अनुसार ‘ज़ब्त’ घोषित किया जाना चाहिए’. यह प्रावधान सरकार को पुस्तकों या अन्य दस्तावेज़ों को ज़ब्त करने और ऐसे दस्तावेज़ों के लिए तलाशी वारंट जारी करने का अधिकार देता है.
युवाओं को गुमराह करने, आतंकवाद का महिमामंडन करने का आरोप
आदेश में कहा गया है कि इन पुस्तकों ने जम्मू-कश्मीर पर ‘ऐतिहासिक या राजनीतिक टिप्पणी के रूप में युवाओं को गुमराह करने, आतंकवाद का महिमामंडन करने और भारतीय राज्य के विरुद्ध हिंसा भड़काने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है.’
उपराज्यपाल द्वारा जारी आदेश में आगे कहा गया है, ‘यह साहित्य शिकायत, पीड़ित होने और आतंकवादी वीरता की संस्कृति को बढ़ावा देकर युवाओं के मानस पर गहरा प्रभाव डालेगा.’
साथ ही, यह भी कहा गया है कि इन पुस्तकों ने ‘ऐतिहासिक तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश करने, आतंकवादियों का महिमामंडन करने, सुरक्षा बलों की निंदा करने, धार्मिक कट्टरपंथ, अलगाव को बढ़ावा देने, हिंसा और आतंकवाद के रास्ते खोलने आदि’ के ज़रिए ‘जम्मू-कश्मीर में युवाओं के कट्टरपंथीकरण में योगदान दिया है.’
गृह विभाग के आदेश में कहा गया है कि ये पुस्तकें ‘अलगाववाद को बढ़ावा देने और भारत की संप्रभुता और अखंडता को खतरे में डालने वाली पाई गई हैं, इसलिए भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) 2023 की धारा 152, 196 और 197 के प्रावधानों के अधीन हैं.’
ज्ञात हो कि बीएनएस की धारा 152 ‘भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता को खतरे में डालने’ से संबंधित अपराधों से संबंधित है; बीएनएस की धारा 196 धर्म, जाति आदि के आधार पर विभिन्न समूहों के बीच दुश्मनी को बढ़ावा देने से संबंधित अपराधों से संबंधित है, जबकि बीएनएस की धारा 197 ‘राष्ट्रीय एकता के लिए हानिकारक आरोपों और दावों’ से संबंधित है.
भारतीय न्याय संहिता 2023 की धारा 98 द्वारा प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग
गृह विभाग के आदेश के अनुसार, ‘अब भारतीय न्याय संहिता 2023 की धारा 98 द्वारा प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए, जम्मू और कश्मीर सरकार 25 पुस्तकों के प्रकाशन को लेकर घोषणा करती है … जिन्हें सरकार द्वारा जब्त किया जाता है.’
इस सूची की अन्य प्रमुख पुस्तकों में ऑस्ट्रेलियाई अकादमिक क्रिस्टोफर स्नेडेन की ‘इंडिपेंडेंट कश्मीर’, पत्रकार और संपादक अनुराधा भसीन की ‘अ डिस्मेंटल स्टेट- द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ कश्मीर ऑफटर आर्टिकल 370’, सीमा काजी द्वारा लिखित ‘बिटवीन डेमोक्रेसी एंड नेशन – जेंडर एंड मिलिटराइजेशन इन कश्मीर’, हफ्सा कंजवाल की’ कोलोनाइजिंग कश्मीर – स्टेट-बिल्डिंग अंडर इंडियन ऑक्यूपेशन’ और डेविड देवदास की लिखित ‘इन सर्च ऑफ ए फ्यूचर द स्टोरी ऑफ कश्मीर समेत कई ऐसी किताबें शामिल हैं, जिन्होंने घाटी और वहां के लोगों की कहानियां दुनिया के सामने रखी हैं.
इस संबंध में अनुराधा भसीन, जिनकी अनुच्छेद 370 को हटाए जाने पर लिखी किताब को गृह विभाग ने निशाना बनाया है, ने ‘आतंकवाद का महिमामंडन’ करने के आरोप को खारिज करते हुए एक फेसबुक पोस्ट में कहा, ‘ये किताबें अच्छी तरह से शोध पर आधारित हैं और इनमें से एक भी आतंकवाद का महिमामंडन नहीं करती, जिसे यह सरकार खत्म करने का दावा करती है. आपको झूठ को चुनौती देने वाले शब्दों से डर लगता है! मैं किताबों को बैन करने वालों (एक विकृत मानसिकता की हास्यास्पद निशानी) को चुनौती देती हूं कि वे आतंकवाद का महिमामंडन करने वाला एक भी शब्द साबित करें. जो लोग सच्चाई को महत्व देते हैं, वे इसे पढ़ें और खुद फैसला करें.’
‘लोकतंत्र में हर आवाज़ के लिए जगह देनी चाहिए’
गृह विभाग के ताज़ा आदेश पर प्रतिक्रिया देते हुए ऑल पार्टीज़ हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष मीरवाइज़ उमर फ़ारूक़ ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर लिखा, ‘विद्वानों और प्रतिष्ठित इतिहासकारों की किताबों पर प्रतिबंध लगाने से ऐतिहासिक तथ्य और कश्मीर के लोगों की जीवित स्मृतियों का भंडार मिट नहीं जाएगा. यह केवल ऐसे सत्तावादी कार्यों के पीछे छिपे लोगों की असुरक्षा और सीमित समझ को उजागर करता है, और अपनी साहित्यिक प्रतिबद्धता को प्रदर्शित करने के लिए चल रहे पुस्तक महोत्सव के गर्वपूर्ण आयोजन में विरोधाभास को भी उजागर करता है!’
Banning books by scholars and reputed historians will not erase historical facts and the repertoire of lived memories of people of Kashmir. It only exposes the insecurities and limited understanding of those behind such authoritarian actions, and the contradiction in proudly…
— Mirwaiz Umar Farooq (@MirwaizKashmir) August 7, 2025
वहीं, राष्ट्रीय जनता दल के सांसद मनोज कुमार झा ने लिखा कि ऐसा कृत्य विचारों, बहस और असहमति के प्रति अंतर्निहित भय को दर्शाता है.
उन्होंने कहा, ‘किसी भी लोकतंत्र में किताबों पर प्रतिबंध लगाना सबसे प्रतिगामी कदम है. यह विचारों, बहस और असहमति के प्रति अंतर्निहित भय को दर्शाता है. लोकतंत्र विचारों के मुक्त आदान-प्रदान पर फलता-फूलता है, यहां तक कि उन विचारों पर भी जो ‘आधिकारिक सत्य’ से असहमत या आलोचनात्मक हों. जिस क्षण हम किसी किताब पर प्रतिबंध लगाते हैं, वह उसकी मजबूती का नहीं, बल्कि असुरक्षा का संकेत देता है.’
Banning of books is the most regressive act in a democracy. It reflects an inherent fear of ideas, debate, and dissent. Democracies thrive on the free exchange of thoughts, even those that are uncomfortable or critical of the ‘official truth.’ The moment we ban a book, it signals… pic.twitter.com/1NUcLRmDS6
— Manoj Kumar Jha (@manojkjhadu) August 7, 2025
मनोज कुमार झा ने आगे कहा कि यह सरकार की संवाद के माध्यम से विरोधी विचारों से जुड़ने में असमर्थता को भी उजागर करता है. सेंसरशिप, खासकर साहित्य पर, कल्पनाशीलता, बौद्धिक स्वतंत्रता और लोगों के स्वतंत्र विचार बनाने के अधिकार का गला घोंटती है. एक जागरूक नागरिक वर्ग को पोषित करने के बजाय, यह समाज को अज्ञानता और अनुरूपता की ओर धकेलती है. एक आत्मविश्वासी लोकतंत्र को हर आवाज़ के लिए जगह देनी चाहिए- यहां तक कि उन लोगों के लिए भी जिनसे वह असहमत हैं.
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