चंद दिनों पहले मैं शेक्सपियर के गांव गया था— स्ट्रेटफर्ड-अपॉन-एवन. यूं तो 1196 में ही इस गांव को इंग्लैंड के राजा रिचर्ड 1 ने मंडी शहर का दर्जा दे दिया था, परंतु आकार और रूप से अभी भी यह गांव-सा ही दिखता है. 1989 में, जब मैं पहली बार वहां गया था तब इस शहर में 22,000 लोग रहते थे. अब 2021 के जनगणना के अनुसार इस शहर की जनसंख्या लगभग 30 हज़ार है.
लेकिन हर वर्ष इस छोटे से देश के इस छोटे से शहर में करीब तीस लाख सैलानी आते हैं— अंग्रेज़ी के जग प्रसिद्ध नाटककार और इंग्लैंड के राष्ट्रीय कवि विलियम शेक्सपियर के जन्म स्थान तथा उनके अंतिम विश्राम स्थल के दर्शन के लिए.
शेक्सपियर के जीवन के बारे में बहुत ही कम सत्यापित तथ्य ज्ञात हैं, विशेष रूप से उनकी शुरुआती ज़िंदगी के बारे में. उनका जन्म दिवस पूरे विश्व में 23 अप्रैल को बड़े धूमधाम से भले ही मनाया जाता हो, लेकिन यह तारीख़ एक अनुमान ही है, खरा तथ्य नहीं. यह अनुमान एक तथ्य के सहारे खड़ा किया गया है— शहर के होली ट्रिनिटी गिरजे के अभिलेखों से यह प्रमाणित होता है कि शेक्सपियर का बपतिस्मा 26 अप्रैल 1564 को हुआ था. चूंकि साधारणतः यह रस्म बच्चे के जन्म के दो-तीन दिन बाद ही अदा की जाती है, इसीलिए 23 अप्रैल को उनका जन्मदिन मान लिया गया है.
इसके अलावा हमारे पास शेक्सपियर की जीवनी के तीन पक्के तथ्य हैं: 18 वर्ष की उम्र में स्ट्रेटफर्ड की निवासी एन हैथवे के साथ उनका विवाह, उनके और एन के तीन बच्चों— सुज़ान्ना, हैम्नेट और जूडिथ— का जन्म, और 23 अप्रैल 1616 को उनकी मृत्यु. स्ट्रेटफर्ड में एन हैथवे का निवास स्थान भी देखा जा सकता है और होली ट्रिनिटी गिरजे में उनकी तथा उनके पति की कब्र भी.
ताज्जुब है कि शेक्सपियर के जीवन से कहीं अधिक जानकारी उनके पिता जॉन शेक्सपियर के बारे में मौजूद है. वह इसलिए कि जॉन, जो पास के गांव स्निट्टरफ़ील्ड से आकर स्ट्रेटफर्ड-अपॉन-एवन में बसे थे, ने अपना कार्य काल यहीं आरंभ किया और अपना जीवन यहीं व्यतीत किया.
जॉन शेक्सपियर दस्ताने बनाने का काम करते थे और काफ़ी दक्ष कारीगर तथा व्यापारी रहे होंगे क्योंकि उनके कारखाने में छह से आठ अप्रेंटिस काम सीखते तथा उनकी मदद करते थे. उनके अभिनेता, नाटककार तथा कवि पुत्र विलियम ने लंदन को अपना कर्मभूमि बनाया और मृत्यु से तीन वर्ष पहले वापस स्ट्रेटफर्ड रहने आ गये.
कई दस्तावेज़ मौजूद हैं जो दर्शाते हैं कि जॉन शेक्सपियर के व्यापार के साथ उनकी संपत्ति तथा राजनीतिक और सामाजिक प्रतिष्ठा भी बढ़ती रही. अभिलेखों से ज्ञात होता है कि जॉन स्थानीय राजनीति में सक्रिय भी रहे और वे स्थानीय प्रशासन के उच्चतम पद, बेलिफ़, की कुर्सी पर भी विराजे. उन्होंने स्ट्रेटफर्ड-अपॉन-एवन के हेन्ली मार्ग पर घर बनाया था जिसमें विलियम शेक्सपियर तथा उनके भाई और बहनों का जन्म हुआ था. यही घर इस शहर का प्रमुख आकर्षण है, और शेक्सपियर के भक्तों तथा साहित्य प्रेमियों का केंद्र बिंदु.
जून 1989 में जब मैं स्ट्रेटफर्ड-अपॉन-एवन गया था तो मैं छात्र था. यूपीएससी में सिविल सर्विसेज का इंटरव्यू देने के बाद परीक्षा-फल की प्रतीक्षा कर रहा था. उस बार वक्त प्रवेश शुल्क अधिक होने के कारण शेक्सपियर के जन्म स्थान और उनके घर को मैंने बाहर से ही देखकर संतोष कर लिया था.
यह भली भांति जानते हुए भी कि घर के अंदर शायद ही कुछ ऐसा दिखे जिसका शेक्सपियर के संग सीधा संबंध हो, इस बार मैं अपनी पत्नी के साथ मन बनाकर आया था कि शेक्सपियर के घर को अंदर से अवश्य देखूंगा. यह इसलिए क्योंकि शेक्सपियर के घर की सबसे बड़ी ख़ासियत यही है, कि यह उनका जन्म स्थान है.
इस आठ कमरों के ढाई मंजिले मकान के हर कक्ष को वैसे ही सुसज्जित किया गया है जैसा 16-17वीं शताब्दी के मकानों के कमरे रहे होंगे. पहली मंजिल पर स्थित बैठक घर और कार्यशाला, दूसरी मंजिल पर मुख्य शय्या गृह तथा बच्चों का शय्या गृह, और उससे ऊपर ढाई मंजिले पर अपरेंटिस के दो छोटे कमरों की साज-सज्जा पूर्ण रूप से अनुसंधान पर आधारित प्रामाणिक वस्तुओं से की गई है.
इन कमरों में रखी हर छोटी-बड़ी वस्तु का चयन या निर्माण समकालीन असबाब से किया गया है या वे फिर उस वक्त की चीज़ों की नक़ल हैं. दस्ताने बनाने की कार्यशाला को भी इस शिल्प के उपकरणों, कच्चे माल तथा तैयार वस्तुओं से इस तरह सजाया गया है कि जॉन शेक्सपियर के समय दस्ताने बनाने की पूर्ण पद्धति आप समझ सकें. इससे विलियम शेक्सपियर, विश्व कवि, का कोई सरोकार नहीं है परंतु इन सब चीजों के कारण आपकी दिलचस्पी उस घर में, उस समय काल में अटकी रहती है.
एक तल्ले पर जॉन तथा उनकी पत्नी मेरी आरडेन के शय्या गृह में बिछी खाट और शिशु का पालना वास्तव में उनका नहीं था, परंतु उनके समय को काफ़ी हद तक चित्रित कर पा रहा था. मुख्य शय्या घर में प्रवेश के पूर्व, बच्चों के कमरे में शेक्सपियर जन्मस्थान ट्रस्ट के प्रतिनिधि और गाइड पॉल लुईस हमें उस पूरे मकान के ढांचे तथा उसके विभिन्न कक्षों के बारे में बता रहे थे. फिर वे बताने लगे कि कितने साहित्यकारों की रुचि शेक्सपियर तथा उनके जन्म स्थान में रही है.
1846 में शेक्सपियर के जन्म स्थान का देख-रेख करने में असमर्थ स्थानीय प्रशासन ने इसे नीलाम करने की इच्छा व्यक्त की थी. अमेरिका के नामी बार्नम एंड बेली सर्कस के मालिक पीटी बार्नम, जिनके लिए हर रुचिकर चीज़ धनोपार्जन का अवसर और साधन था, उन्होंने निश्चय किया कि वे इस मकान को ख़रीदेंगे और ईंट-दर-ईंट उसे विगठित कर, जहाज़ से अटलांटिक महासागर पार ले जाकर न्यूयॉर्क में पुनः उसका हुबहू निर्माण करगें. फिर उसकी नुमाइश करेंगे और ढेरों डॉलर कमायेंगे.
यह बात जब प्रसिद्ध कथाकार चार्ल्स डिकेंस के कानों तक पहुंची तो वह बहुत विचलित हुए और उन्होंने इसे रोकने की ठानी. डिकेंस ने शेक्सपियर के घर को बचाने की आवश्यकता का प्रचार आरंभ किया, जनमत को संगठित किया तथा 1847 में विभिन्न लोगों से 3,000 पाउंड (आज के दिन लगभग चार लाख पाउंड या साढ़े चार करोड़ रुपये) की राशि के अनुदान की व्यवस्था कर पाए. तब जाकर शेक्सपियर का घर अपनी जगह खड़ा रह सका.
यह कहानी बताते हुए पॉल लुईस ने हमसे पूछा कि हम किस देश से आए हैं. हम भारत से हैं, यह सुनकर वे पुलकित हुए और उन्होंने हमें बताया कि इस घर के साथ लगे बगीचे में भारत के प्रसिद्ध कवि तथा शेक्सपियर प्रेमी रबींद्रनाथ टैगोर की मूर्ति लगी हुई है. पहले मुझे आश्चर्य हुआ फिर याद आया कि सालों पहले पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री ज्योति बसु ने रबींद्रनाथ टैगोर की एक मूर्ति शेक्सपियर के शहर को भेंट में दी थी. उस समय कई समाचार पत्रों में यह ख़बर प्राथमिकता से छपी थी.

हम लोग शेक्सपियर के घर के ऊपरी तलों को देख कर बाग में बाहर निकले तो स्लेटी आसमान के नीचे दर्शकों के घेरे के बीच दो युवाओं को 17वीं सदी की पोशाक पहने शेक्सपियर के दो किरदार मैकबेथ तथा लेडी मैकबेथ की भूमिका निभाते हुए पाया— वे राजा डंकन के खून का षड्यंत्र रच रहे थे. उन्होंने फिर दो और नाटकों से छोटे-छोटे दृश्यों को प्रस्तुत किया, ‘रोमियो और जूलिएट’ से तथा ‘मच अडू अबाउट नथिंग’ से. शेक्सपियर के जन्म स्थान में आए सैलानियों के अनुभव को समृद्ध का यह भी एक तरीक़ा था.
जन्म स्थान से जुड़े बगीचे को संस्थान ने ख़ूबसूरती से संवार-संभालकर रखा है. बगीचे की दक्षिण-पूर्वी दीवार के पास पेड़ों की हरी छांव में गुरुदेव की अर्ध प्रतिमा एक शोभायमान पत्थर के चबूतरे पर प्रतिष्ठित है.
चबूतरे के सामने के फलक पर लिखा है- ‘रबींद्रनाथ टगोर 1861-1941, कवि, चित्रकार, नाटककार, विचारक, शिक्षक – भारत की वाणी’. चबूतरे के बाएं फलक पर सुंदर बांग्ला अक्षरों में खुदी हुई है कविगुरु की एक कविता जो उन्होंने ब्रिटेन के शेक्सपियर त्रिशताब्दी समिति के आग्रह पर 1915-16 में लिखी थी. इस कविता के आरंभ में उन्होंने शेक्सपियर को ‘तुमी, बिश्व कबि, दूर सिंधु पारे (तुम विश्व कवि, दूर समुद्र के पार)’ कह कर संबोधित किया है. चबूतरे के दाएं मुख पर खुदा हुआ है उसी कविता का कवि द्वारा किया गया अंग्रेज़ी में अनुवाद.
पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा बनवाई गई कांस्य की इस सुंदर मूर्ति का निर्माण कलकत्ता के मूर्तिकार देबब्रत चक्रबर्ती ने किया है तथा 7 अक्तूबर 1995 को भारत के तत्कालीन उच्चायुक्त एलएम सिंघवी ने इसे शेक्सपियर जन्म स्थान संस्थान को भेंट किया था. अब हर वर्ष 7 मई को राष्ट्रीय कवि रबींद्रनाथ ठाकुर के जन्म दिवस के अवसर पर शेक्सपियर के जन्म स्थान में एक सांस्कृतिक समारोह का आयोजन किया जाता है.
मुझे याद आया कि 7 अगस्त को रबींद्रनाथ ठाकुर की 84 पुण्यतिथि थी. देखने तो हम शेक्सपियर के जन्म स्थान आए थे, परंतु वहां कवि गुरु से भेंट हो गई. पुनः यह अहसास हुआ कि कवियों का गगन ही नहीं उनका वतन भी सीमाहीन है, कुछ कवि सचमुच पूरे विश्व के होते हैं. उस हरे-भरे शांत स्थल पर कवि गुरु की मूर्ति को देखकर मुझे लगा कि गुरुदेव को भी यह जगह पसंद आती.
(चन्दन सिन्हा पूर्व भारतीय प्रशासनिक सेवा अधिकारी, लेखक और अनुवादक हैं.)
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