आरा: ‘अब कहां जाएंगे-खानगी जमीन है, जीवन भर की कमाई से 15 साल में तीन कमरों का घर बनाए थे. गंगा मइया में जा रहा है, सरकार से कुछ मदद दिलवा दीजिये.’
बेतरतीब बाल, आसमानी रंग का लुंगी और रंगीन गंजी पहने 55 वर्षीय ईश्वर दयाल यादव के चेहरे पर हताशा साफ नजर आ रही है. उनका यह घर गंगा के तेज कटाव से पानी में समाने जा रहा है.
भोजपुर जिला मुख्यालय आरा से लगभग 35 किलोमीटर दूर जवईनिया गांव इस समय जिले के हर नागरिक की ज़बान पर है. जहां से प्रत्येक रोज किसी न किसी का घर गंगा में बह जाने की ख़बर स्थानीय अखबारों और सोशल मीडिया पर जगह घेरे हुए हैं.

ईश्वर दयाल बताते हैं, ‘पत्नी सुशीला देवी ने इस घर को बनाने में खूब मेहनत की थी. चार साल पहले ही कोरोना काल के समय इस घर को बनाए थे ताकि बुढ़ापा ठीक से बीते. जीवन अब यही कट जाएगा, लेकिन अब पता नहीं क्या होगा?.’
ईश्वर दयाल अपना घर बार-बार दिखाते है. उन्होंने अपना घर खाली कर दिया है. तब तक उनके सामने गंगा के तेज धार में उनका घर धड़ाम से गिरता है और ईश्वर दयाल और उनकी पत्नी चीत्कार करने लगते हैं. वातावरण भयावह हो जाता है.
70 वर्षीय पचरत्नी देवी अपनी बहू के साथ बैठी है. आसपास उनके लड़के-पोते-पोतियां मौजूद हैं. उनके घर की खिड़की, दरवाजा निकालकर उनके लड़कों ने कहीं सुरक्षित स्थान पर भेज दिया है ताकि भविष्य में उसका कहीं उपयोग किया जा सके.
पचरत्नी देवी के मझले बेटे वीरेंद्र बताते है, ‘मां को सदमा पहुंचा है, इसी घर में ब्याह कर आई थीं, इसी घर में अब तक जीवन का बड़ा हिस्सा गुजार दिया, अब कहां जाना होगा, जीवन असुरक्षित हो गया है. 11 कमरों का बड़ा घर में हम सब रहते थे, अब तो 11 कमरों का घर सपना हो गया है, जल्द ही इसे छोड़कर हम अनजान जगह जाएंगे.’

38 वर्षीय संतोष शाह अपनी पत्नी निशु देवी के साथ चार कमरों का घर दिखाते हैं, जिसका आधा हिस्सा गंगा नदी में चला गया है.
वे बताते हैं, ‘एक महीना पहले पिता भरत शाह का निधन हो गया था तो इसी घर में सब क्रियाकर्म हुआ था. अब यह घर नहीं रहा. हम तीन भाई चार कमरों के घर में ठीक से रहते थे, कभी मन-मुटाव होता था, लेकिन सब ठीक था. अब तो पता नहीं क्या होगा.’

अनिश्चितता की तीखी धूप और गंगा नदी के धार से हो रहे कटाव ने गांव की एक तिहाई भूमि जलमग्न कर दिया है.
46 वर्षीय अरविंद पांडेय भाजपा नेता हैं और इसी गांव के निवासी है. अपना घर दिखाते हुए कहते हैं, ‘ इस 9 कमरे के घर में मेरे पिताजी गोपालजी पांडेय का जन्म हुआ था. मेरे बाबा बासरोपन पांडेय ने बड़े जतन से इसे बनवाया था. हमें पता चल गया है कि यह घर अब नहीं बचने वाला है, सब सदमे में हैं.’

‘अब इस गांव का नाम-ओ-निशान मिटने जा रहा है.’
45 वर्षीय विनोद पांडेय एक टूटी हुई कुर्सी पर बैठे हुए हैं. उनकी आंखें पथराई हैं और गला भर्राया हुआ है. वे बताते हैं, ‘अब पड़ोसी और गांव वाले पता नहीं कहा जाएंगे. हमें भी पता नहीं अब कहां जाना होगा. सब छूट गया. पता नहीं कभी कोई मिल पायेगा या नहीं.’

इस गांव का मौजा 1,870 बीघा का है. 2,000 लोग रहते थे. 2021 में अचानक गंगा किनारे कटान होने लगा. वर्ष 2023 में कटान में तेज़ी आई और 2024 आते-आते इसने भयावह रूप ले लिया.
‘2025 में इस गांव का अस्तित्व खत्म हो गया. यह भूगोल से ही मिट गया. सरकार जब एक गांव नहीं बचा पायी तो राज्य या देश क्या बचा पायेंगी,’ विनोद कहते हैं.

45 वर्षीय बेबी देवी अपनी तीन बच्चों अभिषेक (18 वर्ष) नीतीश (14 वर्ष) और गुंजन (16 वर्ष) के साथ घर खाली कर चुकी हैं.
चेहरे को साड़ी के आंचल से छिपाकर वे कहती हैं, ‘यह घर बहुत मेहनत से पांच साल पहले बनाया था. एक कमरा प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत बना था और दो कमरा खुद के पैसे से बनवाया था. इसका पेंट-पोचारा किया था. अब इस घर को पानी में जाते देखा नहीं जा रहा है.’
बेबी देवी की बेटी गुंजन कुमारी मैट्रिक की पढ़ाई कर रही है. वह अपनी मां के आंसू पोंछने की कोशिश में है. इसी बीच बेबी देवी के मकान का एक हिस्सा गंगा के हल्फी से टकराकर टूट कर गिर जाता है. मकान गिरने से आवाज़ दूर तक जाती है.
बेबी देवी कहती हैं, ‘ तीन गाय रखे हैं, उसी से घर-गृहस्थी चलता है. खुद खाने-पीने से ज्यादा माल-मवेशी की चिंता है. उसको कहां रखेंगे, क्या खिलायेंगे-पिलायेंगे?’
थोड़ी दूर पर 21 वर्षीय रामेश्वर कुमार यादव का चार कमरों का घर खाली हो चुका है. खिड़की और दरवाजे निकाले जा चुके हैं. मिट्टी का चूल्हा आंगन में पड़ा है. घर वीरान है, मरघटी सन्नाटा छाया हुआ है.

घर के बाहर 50 वर्षीय हीरामणि देवी अपने दुआर पर खड़ी हैं.
वे बताती हैं, ‘चार कमरों का मकान हमने मजदूरी करके बनाया है. इसी में एक लड़का और चार लड़की के साथ रहते हैं. मंगलवार को गांव में हल्ला हुआ. हमने भी घर खाली कर दिया. अब कहीं रहने का जगह नहीं है.’

जवईनिया गांव से सटे उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के गांव चकिया नौरंगा की स्थिति भी यही है.
एक गली में 65 वर्षीय दीनानाथ राम ईंटें समेट रहे हैं. वह इन ईंटों को अपनी बेटी बिंदा देवी के ससुराल में रखकर किसी सुरक्षित स्थान पर जाने की तैयारी में हैं.

इस गांव में आसपास के लोग कटाव देखने पहुंच रहे है. कुछ इस विभीषिका से जूझ रहे लोगों के लिए भोजन सामग्री मुहैया करा रहे हैं. स्थानीय यूट्यूबरों की भीड़ लगी हुई है. वे टीवी वाले अंदाज़ में जोर से चिल्ला रहे हैं और अपने कैमरामैन से गंगा में गिर रहे घर को कैमरे में समेट लेने को कह रहे हैं.
पीड़ा में डूबे लोगों से कैमरा भिड़ाकर पूछ रहे है, ‘यह टूटते हुए घर, आपको कैसा लग रहा है?’

इसी गांव के बब्बन यादव कहते है, ‘कोई सहायता नहीं कर रहा है. सरकार और प्रशासन चुप है. सब आकर देखकर चला जा रहा है. लेकिन कोई कुछ कह नहीं रहा है कि हम कहां जाएं. मेरे पास 14 गायें हैं. इसको खिलाना-पिलाना है, कहां रखेंगे? कोई अधिकारी, विधायक और नेता पूछने तक नहीं आया.’
स्थानीय राजद विधायक राहुल तिवारी ने बताया कि वर्ष 2023 में बिहार विधानसभा में तत्कालीन जल संसाधन मंत्री से एक तारांकित प्रश्न पूछा था कि ‘क्या यह सही है कि भोजपुर जिले के शाहपुर प्रखंड के दामोदरपुर पंचायत के गांव जवईनिया में गंगा नदी के पानी से तेज कटाव हो रहा है, यदि हां तो कब तक सरकार इस कटाव को रोकने का प्रयास कर रही है?’
जल संसाधन मंत्री ने कहा था, ‘गांव जवईनिया में गंगा नदी के किनारे कोई कटाव परिलक्षित नहीं हो रहा है.’

राहुल तिवारी ने आरोप लगाया कि ‘सरकार की लापरवाही के चलते यह गांव खत्म हो गया.’
इससे पहले राहुल तिवारी ने वर्ष 2019 में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का ध्यान दिलाते हुए पत्र लिखा था, जिसके जवाब में कहा गया, ‘पत्र को यथोचित कार्रवाई हेतु संबंधित विभाग में भेज दिया गया है.’
बिहार की नदियों का सघन अध्ययन करने वाले विशेषज्ञ दिनेश मिश्र ने बताया, ‘गंगा जहां मुड़ती है, वहां बाहरी हिस्से में कटाव होता है. कहीं ज्यादा कटाव होता है. लोगों के खेत और घर कटकर गंगा में बह जाता है. फिर लोग दिल्ली, मुंबई, पंजाब पलायन कर जाते हैं.’
वे आगे कहते है, ‘समय रहते सरकार कोई ठोस कदम नहीं उठाती. लोगों की जान-माल की कीमत के बारे सरकार कुछ नहीं सोचती है.’

भोजपुर जिले के सवा सौ से अधिक गांव पूरी तरह जलमग्न है. बाढ़ के पानी से चारों से घिर चुके दामोदरपुर निवासी आकाश कुमार राय ने कहा, ‘सरकार की ओर से आवागमन की कोई व्यवस्था नहीं है. स्थानीय लोगों खुद से नाव की व्यवस्था की है. एक बार नाव बाजार जाती है, शाम होने से पहले लौट आती है.’
इन दरकती नावों पर बैठे ये ग्रामीण पानी के सिमटने की आस देख रहे हैं.
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं.)