भारतीय राजनीति में राजनाथ सिंह को अक्सर संतुलित, नपे-तुले शब्दों वाला नेता माना जाता है. उनका मंचीय अंदाज़ कई बार आकाशवाणी के अनुभवी उद्घोषक जैसा लगता है: संयत स्वर, मापी-तौली वाणी और शालीन अभिव्यक्ति. लेकिन अभी चार दिन पहले रायसेन के दशहरा मैदान में देश की पहली रेल और मेट्रो कोच निर्माण इकाई ग्रीनफील्ड रेल कोच निर्माण केंद्र की आधारशिला रखते हुए उन्होंने जो कथन किया, उसने दिखा दिया कि गहरी आस्था जताने वाले भी कभी-कभी अपनी ‘धरोहर पुस्तकों’ की बुनियादी समझ और उसके अर्थ को लेकर गड़बड़ा सकते हैं.
राजनाथ सिंह ने मंच से कहा: ‘जब सीता जी लंका में थीं, रावण उनका अपहरण कर चुका था. तब हनुमान जी लंका पहुंचे. उन्होंने अशोक वाटिका में तोड़फोड़ मचाई, बहुत-से राक्षस मारे. जब वे सीता जी के पास पहुंचे तो उन्होंने पूछा, ‘हे हनुमान , आपने यह क्या किया?’ इस पर हनुमान जी ने हाथ जोड़कर कहा, ‘हे माते, जिन्ह मोहि मारा, तिन मोहि मारे.’
सुनने में यह भावुक और नाटकीय लगा; लेकिन रामचरित मानस में यह संवाद हनुमान और सीता के बीच हुआ ही नहीं था. सीता ने तो हनुमान को उस वाटिका में फल खाने भर की अनुमति दी थी और सजग किया था कि यहां फल भले खा लो; लेकिन ख़याल रहे कि यहां रावण के बहुत सुभट सैनिक तैनात हैं.
रामचरित मानस में सुंदरकांड का वह प्रसंग इस प्रकार है:
हनुमान सीता की खोज में रावण के महल में जाते हैं. पहले विभीषण से मिलते हैं. विभीषण उन्हें अशोक वाटिका का पता देते हैं और वहां प्रवेश का तरीका बताते हैं. हनुमान वहां सीता से भेंट कर राम का संदेश देते हैं. वे विदा लेकर रावण की वाटिका से फल खाते हैं. हनुमान वृक्ष तोड़ते हैं, सैनिक आते हैं, युद्ध होता है. रावण का पुत्र अक्षयकुमार मारा जाता है. अंतत: मेघनाद हनुमान को बांधकर दरबार में ले आता है. यहीं पर रावण और हनुमान के बीच वह कालजयी संवाद होता है :
खायऊँ फल प्रभु लागी भूखा, कपि सुभाव तें तोरेउं रूखा।
सब के देह परम प्रिय स्वामी, मारहिं मोहि कुमारग गामी।
जिन्ह मोहि मारा, ते मैं मारे; तेहि पर बाँधेउँ तनय तुम्हारे॥
मोहि न कछु बांधे कइ लाजा, कीन्हिं चहउँ निज प्रभु कर काजा।
यानी मेरे प्रभु, मुझे वहां भूख लगी तो मैंने कुछ फल खा लिए. मैं वानर हूं और आप जानते हैं कि वानर-स्वभाव क्या होता है तो मैंने कुछ वृक्ष भी तोड़ डाले. लेकिन आपके लोग मुझे पीटने आए तो आप जानते हैं कि सबको अपनी देह प्रिय होती है, सो उन्होंने मुझे मारा तो मैंने भी उन्हें मारा.
यानी यह संवाद सीता और हनुमान के बीच नहीं, रावण और हनुमान के बीच हुआ था. हनुमान और रावण का यह संवाद हिंदी साहित्य के श्रेष्ठ प्रसंगों में गिना जाता है. तुलसीदास ने इसे मर्यादा और विनम्रता के साथ रचा है. केशवदास ने इसे और रावण-अंगद संवाद को इससे भी कहीं अधिक चुटीले, व्यंग्यपूर्ण और शौर्य-रस से भरपूर रूप में प्रस्तुत किया है. वह हिंदी साहित्य की थाती है.
तुलसी की पंक्तियां नीति-रस का आदर्श हैं, वहीं केशव की सवैया शैली नाटकीय तनाव और चुटकी का मज़ा देती है. पुराने समय में केशव के यह सवैए इतने लोकप्रिय थे कि ये जन सामान्य को कंठस्थ थे.
किसी और ने कहा होता तो क्या होता?
कल्पना करिए, यही भाषण नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने दिया होता तो अब तक क्या कुछ नहीं हो गया होता! लेकिन यह भयंकर चूक देश के रक्षामंत्री राजनाथ सिंह से हुई तो किसी ने ध्यान भी नहीं दिया.
दरअसल, सार्वजनिक स्मृति की परीक्षा बड़ी बेरहम होती है. ख़ासकर तब जब चूक उस नेता के भाषण से फिसलकर आए, जिसे आप पहले ही गिरते देखने का इंतज़ार कर रहे हों. अन्यथा बाकी सबको सब माफ़ रहता है.
याद कीजिए, कौन बनेगा करोड़पति के मंच पर अभिनेता-राजनेता शत्रुघ्न सिन्हा की बेटी सोनाक्षी सिन्हा से पूछा गया कि हनुमान संजीवनी बूटी किसके लिए लाए थे. वे लक्ष्मण और सीता के बीच अटक गईं और लाइफ़लाइन लेनी पड़ी. नतीजा ये निकला कि सोशल मीडिया पर मीम्स की बाढ़, ताने, ट्रोलिंग, और ‘धार्मिक अज्ञान’ का ठप्पा. और वह भी कि घर का नाम रामायण, भाई लव और कुश और पिता स्वयं शत्रुघ्न! ऐसे घर की लड़की इतनी ‘अज्ञानी!’ रामायण की छोटी सी बात पता नहीं?
याद कीजिए, 2023 में लोकसभा में ‘संविधान की 75 वर्ष की गौरवशाली यात्रा’ पर चर्चा के दौरान राहुल गांधी ने एकलव्य–द्रोणाचार्य की कथा का उदाहरण देते हुए कहा, ‘जिस तरह द्रोणाचार्य ने एकलव्य का अंगूठा काटा था, उसी तरह आज की सरकार देश के युवाओं का अंगूठा काट रही है.’ व्यंग्य सटीक था या नहीं, यह अलग बहस है; लेकिन प्रतिक्रिया तूफानी थी; आरोप, घेराव और राजनीतिक प्रहार चौतरफा हुए. यह तक कि राहुल गांधी महाभारत के एकलव्य संबंधी उस प्रसंग से इतने अनजान कैसे हो सकते हैं?
लेकिन इसी देश में जब आज के दौर में मंच से तथ्यात्मक ग़लती कहीं ज़्यादा गहरी हो; लेकिन वह सत्तापक्ष के किसी नेता से हो जाए तो सन्नाटा भी हो सकता है. मध्यप्रदेश के रायसेन में दो दिन पहले देश के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने रामचरित मानस के एक कालजयी संवाद को पात्र और प्रसंग बदलकर सुनाया; लेकिन इतने बड़े गलत तथ्य के बावजूद न सोशल मीडिया में उबाल आया. मेरा ख़याल है, न किसी ने ट्वीट किया, न किसी ने फैक्ट चेक ही.
यानी तस्वीर उस बहुत जीर्णशीर्ण शे’र जैसी है, ‘इधर कत्ल भी होता है तो चर्चा नहीं होता और उधर आह भी करते हैं तो हो जाते हैं बदनाम.’
आस्था या वोट की राजनीति?
यहां सवाल सिर्फ़ एक संवाद के पात्र बदलने का नहीं है, उस ‘सलेक्टिव आलोचना’ का है, जहां सोनाक्षी सिन्हा को तो निशाने पर रखा जाता है या राहुल गांधी की गलती पर तो तीर छोड़े जाते हैं, लेकिन एक पक्ष विशेष के नेता की ऐसी भूल पर सन्नाटा रहता है, जिसकी उससे कभी अपेक्षा ही नहीं रहती.
अयोध्या आंदोलन, राम मंदिर और धर्म की राजनीति को हर समय ओढ़ने बिछाने वाले ‘जिन्ह मोहि मारा’ के संदर्भ को भूल जाते हैं तो साफ़ है कि आप आस्था को सिर्फ़ वोट की राजनीति समझते हैं.
राजनाथ सिंह की चूक याद दिलाती है कि धार्मिक आख्यान का राजनीतिक उपयोग तभी सार्थक है, जब वह गहन अध्ययन पर आधारित और सही संदर्भों में प्रस्तुत किया गया हो. अन्यथा, श्रद्धा से भरे शब्द भी संदर्भ से भटककर मूल भाव को कमजोर कर देते हैं.
और यह पहली बार नहीं है. 28 जून 2018 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मगहर में संत कबीर की 620वीं जयंती पर कहा था, ‘ऐसा कहा जाता है कि यहां संत कबीर, गुरु नानक देव और बाबा गोरखनाथ एक साथ बैठे और उन्होंने आध्यात्मिकता पर चर्चा की.’ यह सुनने में प्रेरक लगता है, लेकिन इतिहास कहता है : गोरखनाथ 11वीं–12वीं सदी में हुए थे तो कबीर और नानक 15वीं–16वीं सदी के. तीनों का एक साथ बैठना असंभव ही. पर उस पर कोई हंगामा नहीं हुआ. अकबर इलाहाबादी कह गए हैं, ता’लीम का शोर ऐसा तहज़ीब का ग़ुल इतना, बरकत जो नहीं होती निय्यत की ख़राबी है!
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)
