जम्मू-कश्मीर: सुप्रीम कोर्ट ने राज्य के दर्जे को लेकर पहलगाम हमले का ज़िक्र किया, बढ़ेगी नाराज़गी

जम्मू-कश्मीर को राज्य का दर्जा देने की मांग वाली याचिकाओं को सुनते हुए सुप्रीम कोर्ट में सीजेआई बीआर गवई ने पहलगाम आतंकवादी हमले का ज़िक्र किया था, जिसे सत्तारूढ़ नेशनल कॉन्फ्रेंस के प्रवक्ता ने 'दुर्भाग्यपूर्ण' बताया है.

जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा, मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला और अन्य लोगों के साथ स्वतंत्रता दिवस समारोह से पहले श्रीनगर में डल झील के किनारे मंगलवार (12 अगस्त) को तिरंगा रैली में भाग लेते हुए. (फोटो: पीटीआई)

श्रीनगर: जम्मू-कश्मीर का राज्य का दर्जा बहाल करने की मांग वाली एक याचिका पर गुरुवार (14 अगस्त) को सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट द्वारा पहलगाम आतंकवादी हमले का ज़िक्र किए जाने से मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के नेतृत्व वाली निर्वाचित सरकार मुश्किल में पड़ सकती है.

इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों पर प्रतिक्रिया देते हुए सत्तारूढ़ नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता और कैबिनेट मंत्री सतीश शर्मा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से शुक्रवार को स्वतंत्रता दिवस समारोह में जम्मू-कश्मीर का राज्य का दर्जा बहाल करने की घोषणा करने का आह्वान किया.

सतीश शर्मा ने श्रीनगर में संवाददाताओं से कहा, ‘राज्य का दर्जा हमारे अधिकार क्षेत्र से बाहर है, लेकिन आठ महीने तक इंतज़ार क्यों?’

उन्होंने आगे कहा कि अदालत को ‘सभी पहलुओं’ पर गौर करना चाहिए और ‘जम्मू-कश्मीर के लोगों के अधिकार’ लौटाने चाहिए.

नेशनल कॉन्फ्रेंस के मुख्य प्रवक्ता तनवीर सादिक ने शीर्ष अदालत की इस टिप्पणी को ‘दुर्भाग्यपूर्ण’ बताया.

उन्होंने कहा, ‘जम्मू-कश्मीर के लोगों को उस अपराध की कीमत चुकानी पड़ रही है, जो उन्होंने कभी किया ही नहीं. आज भी हमें बताया जा रहा है कि हालात ठीक नहीं हैं. जब पहलगाम की घटना हुई थी, तब जम्मू-कश्मीर एक राज्य नहीं था. कानून-व्यवस्था चुनी हुई सरकार के हाथ में नहीं थी. जिन्होंने ज़िम्मेदारी ली, उन्हें कभी सज़ा नहीं मिली, जबकि लोग इसकी क़ीमत चुका रहे हैं.’

मालूम हो कि जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने हाल ही में एक साक्षात्कार में पहलगाम में हुए हमले की ‘पूरी ज़िम्मेदारी’ ली थी.

इस बीच विपक्षी पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी की अध्यक्ष महबूबा मुफ़्ती ने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणी जम्मू-कश्मीर सरकार के ‘स्थिरता में निरंतर अविश्वास’ और ‘गहरे राजनीतिक और मनोवैज्ञानिक गतिरोध’ को दर्शाती है.

उल्लेखनीय है कि इससे पहले सर्वोच्च न्यायालय ने कश्मीर निवासी शिक्षक ज़हूर अहमद भट और कार्यकर्ता खुर्शीद अहमद मलिक की याचिका पर सुनवाई की. दोनों याचिकार्ताओं ने कहा कि अनुच्छेद 370 को हटाए जाने को चुनौती देने वाली याचिकाओं की सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल के आश्वासन के बावजूद जम्मू-कश्मीर का राज्य का दर्जा बहाल नहीं किया गया है.

‘भारत के संघीय ढांचे का उल्लंघन’ 

आवेदकों की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने अदालत को बताया, ‘अनुच्छेद 370 मामले में फैसला आए 21 महीने हो चुके हैं, लेकिन कोई प्रगति नहीं हुई है, क्योंकि जब केंद्र ने अदालत के समक्ष यह बयान दिया था कि वे राज्य का दर्जा लागू करेंगे, तो उन्हें केंद्र पर पूरा भरोसा था.’

उन्होंने इस देरी को ‘भारत के संघीय ढांचे का उल्लंघन’ बताया.

मामले की सुनवाई के दौरान भारत के मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई ने 22 अप्रैल को बैसरन घाटी में हुए आतंकी हमले का ज़िक्र करते हुए कहा, ‘आपको ज़मीनी हक़ीक़तों को भी ध्यान में रखना होगा… आप पहलगाम में जो हुआ है उसे नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते,’

इस पर शंकरनारायणन ने जवाब दिया, ‘दरअसल, इसीलिए राज्य का दर्जा दिया जाना चाहिए. एक स्पष्ट सीमारेखा है…’.

सर्वोच्च न्यायालय की पीठ, जिसमें जस्टिस के. विनोद चंद्रन भी शामिल थे, ने कहा कि जम्मू-कश्मीर के राज्य का दर्जा बहाल करने के मुद्दे पर निर्णय ‘कार्यपालिका और संसद को’ लेना है. पीठ ने कहा, ‘हमारे पास विशेषज्ञता नहीं है.’

इससे पहले सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने जम्मू-कश्मीर की ‘अजीबोगरीब स्थिति’ का हवाला दिया, जहां ‘निर्णय लेने की प्रक्रिया में कई बातों पर विचार किया जाता है.’

इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, उन्होंने कहा, ‘मुझे नहीं पता कि इस समय इस मुद्दे को क्यों उठाया जा रहा है. क्योंकि यह स्थिति को उलझाने का सही समय नहीं है. मुझे नहीं पता कि वे ऐसा क्यों कर रहे हैं.’

केंद्र सरकार को जवाब दाखिल करने के लिए आठ हफ़्ते का समय दिया गया

उल्लेखनीय है कि इस याचिका पर सुनवाई के बाद केंद्र सरकार को जवाब दाखिल करने के लिए आठ हफ़्ते का समय दिया गया, जबकि अधिवक्ता शंकरनारायणन ने अदालत से ऐसी सभी याचिकाओं को एक साथ सूचीबद्ध करने का आग्रह किया.

उन्होंने कहा, ‘अगर निष्पादन संबंधी पहलू की मांग की जा रही है, तो एक पीठ गठित की जा सकती है और एक समय-सीमा तय की जा सकती है.’

गौरतलब है कि जम्मू-कश्मीर के राज्य के दर्जे की बहाली को सुरक्षा स्थिति से जोड़ने से अब्दुल्ला की निर्वाचित सरकार पर और दबाव पड़ने की संभावना है. हलांकि, फिलहाल इस केंद्रशासित प्रदेश की सुरक्षा केंद्रीय गृह मंत्रालय और जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल के नेतृत्व वाले स्थानीय प्रशासन के अधीन है,

इस संबंध  में भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार के प्रति सुलह का रुख अपनाने के लिए मुख्यमंत्री को अपनी पार्टी के भीतर ही आलोचनाओं का सामना करना पड़ रहा है.

हाल ही में अब्दुल्ला की सोशल मीडिया पर गुजरात में स्टैच्यू ऑफ यूनिटी, जिसके कारण 5,000 से ज़्यादा आदिवासी विस्थापित हुए हैं, का जश्न मनाने के लिए आलोचना हुई थी.

कश्मीर में एक विपक्षी राजनीतिक दल के एक वरिष्ठ नेता ने अनुमान लगाया कि सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से जम्मू-कश्मीर के राज्य के दर्जे को चरणबद्ध तरीके से बहाल करने का रास्ता साफ हो सकता है.

नाम न छापने की शर्त पर नेता ने कहा, ‘इस बात की बहुत संभावना है कि राज्य का दर्जा दो चरणों में बहाल किया जाएगा.’

राजनीतिक दलों से जम्मू-कश्मीर के राज्य का दर्जा बहाल करने के लिए संसद में विधेयक पेश करने का आग्रह

ज्ञात हो कि अब्दुल्ला ने हाल ही में एक पत्र में सभी राजनीतिक दलों से जम्मू-कश्मीर के राज्य का दर्जा बहाल करने के लिए संसद में एक विधेयक पेश करने का आग्रह किया था.

उन्होंने तर्क दिया था कि यह कोई ‘एहसान’ नहीं, बल्कि एक ‘आवश्यक सुधार’ है.

इस बीच सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों पर प्रतिक्रिया देते हुए पीडीपी प्रमुख मुफ्ती ने कहा कि भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार 2019 में जम्मू-कश्मीर के विभाजन और दो केंद्र शासित प्रदेशों में बांटने के बाद ‘जम्मू-कश्मीर पर अपने कड़े नियंत्रण को कम करने के लिए अनिच्छुक प्रतीत होती है’.

उन्होंने ‘स्थायी शांति और सम्मान लाने के लिए बातचीत और सुलह’ की वकालत की.

मुफ्ती ने एक्स पर एक पोस्ट में कहा, ‘पीडीपी का मानना है कि जम्मू-कश्मीर का मुद्दा राज्य के दर्जे या संवैधानिक दर्जे के सवाल से कहीं आगे तक जाता है. जब तक नई दिल्ली लोगों की राजनीतिक आकांक्षाओं से नहीं जुड़ती और मूल मुद्दे का सीधे तौर पर समाधान नहीं करती, तब तक चाहे वह कितनी भी ताकत लगा ले, स्थिति अनिश्चित ही रहेगी.’

पीडीपी नेता वहीद पारा ने खेद व्यक्त किया कि सर्वोच्च न्यायालय ने पहलगाम में आतंकवादी घटना को ‘भारत की सर्वोच्च संवैधानिक बहस को प्रभावित करने’ की अनुमति दे दी.

उन्होंने कहा, ‘जम्मू-कश्मीर के लोगों-कानून का पालन करने वाले और संविधान की रक्षा करने वाले नागरिकों-को पड़ोसी देश के कामों के चलते दूसरे भारतीय नागरिकोंं के साथ मिले समानता का अधिकार से क्यों वंचित रखा जाए? संवैधानिक अधिकार पाकिस्तान के आचरण पर निर्भर नहीं हो सकते. इस आधार पर राज्य का दर्जा न देना भारतीय संप्रभुता को उन लोगों के हाथों में सौंपना है जो इसे कमज़ोर करना चाहते हैं.’

पारा ने आगे कहा, ‘यह दावा करने का कोई कानूनी या अनुभवजन्य आधार नहीं है कि जम्मू-कश्मीर को केंद्र शासित प्रदेश बनाए रखने से आतंकवाद परास्त हो जाएगा; इससे संघीय ढांचा, समान व्यवहार का सिद्धांत और प्रतिनिधि लोकतंत्र का मूल नष्ट हो जाएगा.’

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