15 अगस्त को विशेष अतिथि बने पूर्व बंधुआ मज़दूरों को दिल्ली में क्या सहना पड़ा…

स्वतंत्रता दिवस पर मोदी सरकार के विशेष अतिथि बनाकर बुलाए गए पूर्व बंधुआ मजदूरों को 15-16 घंटे भूखे रहने पड़ा. प्रधानमंत्री से मुलाक़ात का वादा भी पूरा नहीं किया गया. बिहार के पितांबर साह जैसे ग़रीबों को सिर्फ़ तस्वीरों में ‘सम्मानित’ किया गया, जबकि राहत और पुनर्वास योजनाएं अब भी अधूरी हैं.

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पूर्व बंधुआ मजदूरों को मोमेंटो देकर सम्मानित करतीं श्रम व रोजगार मंत्रालय की केंद्रीय राज्य मंत्री व भाजपा नेत्री शोभा करंदलाजे. (फोटो साभार: एक्स)

नई दिल्ली: स्वतंत्रता दिवस समारोह में केंद्र सरकार ने बंधुआ मज़दूरी के दलदल से निकले 100 से अधिक लोगों को आमंत्रित किया था. उन्होंने लाल किले के सामने बैठकर समारोह देखा. श्रम मंत्री शोभा करंदलाजे के हाथों सम्मानित हुए, उपहार भी मिला.

लेकिन कम लोगों को पता है कि स्वाधीनता दिवस के इस समारोह ने बंधुआ मज़दूरी के चंगुल से निकले इन विशेष अतिथियों को चार दिनों से ‘सरकारी बंधुआ’ बना दिया है.

सरकारी जश्न के लिए आधी रात से जगाए गए इन लोगों को करीब 15-16 घंटे भूखे रहना पड़ा. भूखे रहने वालों में तीन साल की बच्ची भी शामिल थी.

वे वादे भी पूरे नहीं हुए, जो उन्हें दिल्ली लाने से पहले किए गए थे कि ‘आपसे प्रधानमंत्री मोदी मिलेंगे, बात करेंगे’. मिलना तो दूर नज़दीक से देखना तक मयस्सर नहीं हुआ. फोटो तक नहीं ले पाए क्योंकि फोन बंद करवा दिया गया था.

लाल किले के समारोह में शामिल होने के लिए बुलाए गए इन मजदूरों को सरकार दिल्ली की सीमा पर, लाल किले से 22 किलोमीटर दूर महिपालपुर में एक सादा जगह, स्टार होटल, पर ठहराती है, उनके खाने का इंतजाम किसी ढाबे में करती है, जहां भोजन कम पड़ जाता है और उन्हें भीड़ के साथ धक्का-मुक्की भी करनी पड़ती है.

इस साल मई में केंद्र सरकार ने निर्णय लिया था कि बंधुआ मजदूरी से छुटकारा पाए 100 लोगों को उनके जीवनसाथी के साथ, स्वतंत्रता दिवस समारोह में लाल किले पर विशेष अतिथि के रूप में आमंत्रित किया जाएगा.

बंधुआ मज़दूरी से ‘सरकारी बंधुआ’ तक

जून 2025 में बेतिया जिला के पितांबर साह को उस एनजीओ से जुड़े एक व्यक्ति का कॉल आया, जिसने कभी इन्हें बंधुआ मजदूरी से निकलने में मदद की थी.

‘दिल्ली जाना चाहोगे?’ पितांबर साह ने ‘हां’ कर दिया. अब उनके पास जिला अधिकारियों का कॉल आने लगा. एक बार लेबर इंस्पेक्टर ने जिला कार्यालय में मुलाकात भी की. कुछ पेपर साइन करवाए और बताया कि ‘परेड में शामिल होना है. प्रधानमंत्री मोदी मुलाकात करेंगे.’

13 अगस्त को साह अपनी पत्नी और दो छोटी बच्चियों (एक की उम्र डेढ़ साल, दूसरे की साढ़े तीन साल) के साथ ट्रेन में बैठे. उनके साथ छह अन्य भूतपूर्व बंधुआ मजदूर और उनका परिवार भी था. सभी को महिपालपुर के एक होटल में ठहराया गया. खाने का इंतजाम पास के एक ढाबे में हुआ.

महिपालपुर का यह होटल राष्ट्रीय राजमार्ग 48 के बगल में है. (फोटो: अंकित राज/द वायर हिंदी)

14 तारीख को जब एक बस में बैठाकर पितांबर साह को इंदिरा गांधी मेमोरियल और प्रधानमंत्री संग्रहालय ले जाया जा रहा था तब उन्होंने पाया कि बस में और राज्यों के लोग भी हैं.

बारिश और जाम की वजह से पितांबर और अन्य देर रात होटल पहुंचे. करीब 10 बजे सभी ने खाना खाया. रात करीब 11 बजे होटल के कमरा नंबर 005 में हमारी मुलाकात पितांबर से हुई. वह पहली बार लाल किले से स्वतंत्रता दिवस समारोह को देखने और प्रधानमंत्री से मिलने के लिए बहुत उत्सुक थे, ‘बहुत अच्छा लग रहा है. देश के पीएम सर से मुलाकात हो जाएगी, इससे ज्यादा सौभाग्य की बात क्या होगी.’

पितांबर ने बताया, ‘सर लोगों ने रात दो बजे तक जग जाने को कहा है, सुबह चार बजे निकलना है.’ मजदूरी के दौरान दोनों पैर से लगभग विकलांग हो चुके पितांबर को नहीं पता था कि उन्हें दिल्ली से अपने घर कब लौटना है? दिल्ली में आखिर क्या करना है?

पितांबर साह ने बताया कि स्वतंत्रता दिवस समारोह में शामिल होने के लिए उन्हें कुर्ता, पजामा और जूता मिला था. उनकी पत्नी को साड़ी मिला था. बच्चों के लिए कोई कपड़ा नहीं मिला था. (फोटो: अंकित राज/द वायर हिंदी)

15 अगस्त की देर शाम फोन पर हुई बातचीत में पितांबर निराश थे, ‘हम लोग रात में दो बजे जग गए थे. बस में बैठकर पांच बजे से पहले लाल किला पहुंच गए थे. हम लोग बहुत दूर बैठे थे. वहां से मोदी जी दिखाई नहीं दे रहे थे. वहां टीवी लगा हुआ था. बोला गया था कि प्रधानमंत्री मिलेंगे, हाथ मिलाएंगे, पुरस्कार देंगे… लेकिन कुछ नहीं हुआ.’

पितांबर ने बताया कि उन सभी को सुबह नाश्ता तक नहीं कराया गया. ये सभी लोग रात दो बजे के जगे हुए थे. आखिरी बार खाना रात 10 बजे खाया था, इसके बाद सीधे स्वतंत्रता दिवस की शाम करीब ढाई-तीन बजे भोजन मिला, ‘हम सब भूखे थे. बहुत खराब सिस्टम है. रात में भी खाना के लिए बहुत भीड़ हो जाता है. जानते ही हैं गांव की लेडीज़ लोग बहुत शर्माती हैं. इसी में कभी कुछ खत्म हो जाता है, तो कभी कुछ.’

15 अगस्त, 2025 के जश्न के लिए सजा लाल किला. (फोटो: पीआईबी)

वंचित समुदाय से ताल्लुक रखने वाले इन ‘सरकारी मेहमानों’ का यह पीड़ादायक अनुभव स्वतंत्रता भारत की 79 साल की यात्रा के स्याह पक्ष को उघाड़ता है. हालांकि, श्रम व रोजगार मंत्रालय की केंद्रीय राज्य मंत्री व भाजपा नेत्री शोभा करंदलाजे का सोशल मीडिया इस स्याह पक्ष को ढकने का पूरा प्रयास करता है.

15 अगस्त शाम 05:22 बजे करंदलाजे ने अपने मेहमानों के साथ की तस्वीर साझा करते हुए लिखा है, ‘दिल्ली के नेशनल एग्रीकल्चर कॉम्प्लेक्स में हमारे 79वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर पुनर्वास किए गए बंधुआ मजदूरों के साथ बातचीत करने और उनका सम्मान करने का अवसर पाकर मैं गौरवान्वित महसूस कर रही हूं…उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान और महाराष्ट्र से ऐसे 143 विशेष अतिथि इस ऐतिहासिक अवसर के लिए दिल्ली आए हैं. उनकी मौजूदगी इस बात की सशक्त याद दिलाती है कि हमारी आज़ादी तभी सार्थक है जब वह हर नागरिक के लिए गरिमा, समानता और दूसरा मौका लेकर आए.’

गरिमा और समानता का हाल आपने जान ही लिया है. अब पुनर्वास का हाल भी जान लीजिए.

केंद्र सरकार ने 2016 के विजन डॉक्यूमेंट में आने वाले सात वर्षों में बंधुआ मज़दूरों की संख्या को 50% तक घटाने का लक्ष्य रखा था. सरकार ने कहा था कि वह 2030 तक 1.84 करोड़ बंधुआ मज़दूरों की पहचान, मुक्ति और पुनर्वास का काम करेगी.

इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए सरकार को औसतन प्रतिवर्ष 13.14 लाख बंधुआ मज़दूरों का पुनर्वास कराना था. लेकिन संसद में प्रस्तुत किए गए ताजा आंकड़े बताते हैं कि 2023-24 में सरकार मात्र 468 बंधुआ मज़दूरों का पुनर्वास करा पायी. इतना ही नहीं पुनर्वास कराने की संख्या में साल दर साल गिरावट भी आ रही है.

लोकसभा में सरकार द्वारा दिए गए आंकड़े.

पिछले साल प्रकाशित इंडियास्पेंड की रिपोर्ट कहती हैं कि जिस गति से सरकार इस दिशा में काम कर रही है, उससे 2030 तक लक्ष्य का केवल दो प्रतिशत ही प्राप्त हो पाएगा.

केंद्रीय राज्य मंत्री ने भले ही यह दावा कर दिया हो कि उन्होंने ‘पुनर्वास किए गए बंधुआ मजदूरों’ से भेंट की और उन्हें सम्मानित किया. लेकिन पितांबर साह का पुनर्वास नहीं हुआ है.

साह को 2023 में महाराष्ट्र के कोल्हापुर के महालक्ष्मी कंस्ट्रक्शन कंपनी की कंस्ट्रक्शन साइट से छुड़ाया गया था. वहां उन्हें अपने भाई के साथ करीब आठ महीने बंधुआ मजदूरी करनी पड़ी थी.

एक स्थानीय वर्कर यूनियन और एक एनजीओ की मदद से वे मुक्त हो पाये. द वायर हिंदी से बातचीत में साह ने बताया, ‘रिलीज के बाद मुझे सरकार से 30 हजार रुपये ही मिला था.’ ध्यान रहे यह सहयोग राशि है, पुनर्वास राशि नहीं.

दरअसल, बंधुआ मज़दूरों के पुनर्वास के लिए केंद्र सरकार की योजना है, जिसके तहत बचाए गए बंधुआ मज़दूर को तत्काल 30,000 रुपये की सहायता देने का प्रावधान है. पुनर्वास के लिए 1 लाख रुपये, 2 लाख रुपये और 3 लाख रुपये तक की सहायता दी जाती है, जो मज़दूर की श्रेणी और उसके शोषण की गंभीरता के आधार पर दी जाती है.

इसका मतलब यह है कि मंत्री ने जो ‘पुनर्वास किए गए बंधुआ मजदूरों’ से मिलने का दावा किया, वह गलत है.

पितांबर साह आज भी बेरोजगार हैं. 2024 में तमिलनाडु में काम करते थे, जब ट्रक से गिरने पर उनका पैर टूट गया था. वह अब ठीक से चल नहीं सकते. किसी तरह का बोझ नहीं उठा सकते. मजदूरी नहीं कर सकते. लेकिन स्वतंत्रता दिवस समारोह के लिए दिल्ली लाए जाने से पहले उनका मनरेगा जॉब कार्ड बनवा दिया गया और एक सरकारी आवास का भी वादा किया गया.

पितांबर के मुताबिक, उनके पिता दूसरों के खेत में काम करते हैं और उससे ही परिवार का गुजारा होता है.

21वीं सदी के ‘नए भारत’ में करोड़ों बंधुआ मजदूर हैं. लेकिन सरकार उन्हें बचा नहीं पा रही है. हालांकि, किसी ट्रेड यूनियन व एनजीओ की मदद से बचाए जाने के बाद सरकारी अधिकारी इन मज़दूरों के साथ अपनी तस्वीर जरूर खिंचवा लेते हैं.

कौन बनता है बंधुआ मजदूर?

ग्लोबल कमीशन ऑन मॉडर्न स्लेवरी एंड ह्यूमन ट्रैफिकिंग की एक रिपोर्ट बताती है कि ये अपराध ज़्यादातर उन व्यक्तियों और समूहों को प्रभावित करता है जो पहले से ही वंचित, हाशिए पर और भेदभाव का शिकार होते हैं.

साल 2018 में प्रकाशित जावेद आलम खान का शोध अध्ययन (Assessing Budgetary Priorities for the Rehabilitation of Bonded Labour) बताता है कि ‘भारत की कुल श्रमिक शक्ति में से लगभग 10 प्रतिशत श्रमिक बंधुआ मज़दूरी की श्रेणी में आते हैं. अब तक जितने बंधुआ मज़दूरों का पुनर्वास हुआ है, उनमें से 83 प्रतिशत अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति समुदाय से आते हैं.’