अलास्का बैठक: ट्रंप-पुतिन की मुलाकात और भारत पर इसका प्रभाव

अलास्का में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की मुलाकात का भारत पर क्या असर पड़ सकता है? क्या इससे भारत को टैरिफ में रियायत मिल सकती है?

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, अलास्का के एंकोरेज स्थित ज्वाइंट बेस एल्मेंडॉर्फ-रिचर्डसन में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ बैठक के दौरान. (फोटो: @WhiteHouse on X via PTI)

नई दिल्ली: अलास्का में शुक्रवार (15 अगस्त) को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की मुलाकात भारत की आर्थिक स्थिति को गहराई से प्रभावित कर सकती है.

मालूम हो कि रूस से तेल खरीदने को लेकर अमेरिका ने दंड के तौर पर भारतीय वस्तुओं पर 50% टैरिफ का ऐलान किया है. इसमें से 25% पारस्परिक (रेसिप्रोकल) टैरिफ बीते सात अगस्त से लागू हो चुका है, जबकि 25% का अतिरिक्त टैरिफ 27 अगस्त से लागू होगा.

ऐसे में भारत की इस बैठक पर कड़ी नज़र थी और सवाल यह था कि क्या यह बैठक ट्रंप के कूटनीति दबाव को कम करेगी या और गहरा करेगी.

ट्रंप-पुतिन शिखर सम्मेलन में आखिर हुआ क्या?

औपचारिक बातचीत सुबह लगभग 11:30 बजे शुरू हुई. ट्रंप विदेश मंत्री मार्को रुबियो और दूत स्टीव विटकॉफ के साथ बैठे, जबकि पुतिन के साथ विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव और सलाहकार यूरी उशाकोव भी थे. यह चर्चा लगभग तीन घंटे तक चली .

दोपहर लगभग 3 बजे दोनों नेता प्रेस के सामने आए, लेकिन उन्होंने किसी प्रश्न का उत्तर नहीं दिया और न ही इस बैठक की किसी सफलता की घोषणा की.

इसके तुरंत बाद पुतिन वहां से रवाना हो गए, जबकि ट्रंप ने शाम को वाशिंगटन वापसी की उड़ान ली. कुल मिलाकर, पुतिन की दस वर्षों में पहली अमेरिका यात्रा छह घंटे से भी कम समय तक चली.

क्या ट्रंप युद्धविराम कराने में सफल रहे, या वार्ता बिना किसी प्रगति के समाप्त हो गई?

अलास्का जाते समय ट्रंप ने एयर फ़ोर्स वन पर फॉक्स न्यूज़ से कहा था कि अगर बैठक में समझौता नहीं हुआ, तो वे ‘खुश नहीं होंगे’. इससे बैठक के लिए उम्मीदें बढ़ गई थीं. हालांंकि, बैठक के बाद ट्रंप उत्साहजनक बात कहीं. उन्होंने कहा, ‘आज हमने वाकई अच्छी प्रगति की है.’

उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि बातचीत जारी है और आगे और बैठकें होंगी. लेकिन उन्होंने इस बैठक का ब्यौरा नहीं दिया.

बाद में फॉक्स न्यूज़ के साथ साक्षात्कार में उन्होंने कहा कि अब युद्धविराम समझौता कराने की ज़िम्मेदारी यूक्रेनी राष्ट्रपति वोलोदिमीर ज़ेलेंस्की पर है.

पुतिन ने भी आशावादी रुख़ जारी रखते हुए कहा, ‘हमने रचनात्मक और परस्पर सम्मानपूर्ण माहौल में बातचीत की और ये सार्थक और उत्पादक साबित हुई हैं.’

रूसी राष्ट्रपति ने ट्रंप की तारीफ़ करते हुए कहा कि अगर ट्रंप राष्ट्रपति होते तो यूक्रेन युद्ध शुरू ही नहीं होता.

उन्होंने यूक्रेन युद्ध पर एक ‘दीर्घकालिक और स्थायी’ समाधान की मास्को की मांगों को भी दोहराया, जिसमें संघर्ष के ‘मूल कारणों’ को संबोधित करना, यह सुनिश्चित करना कि ‘रूस की सभी जायज़ चिंताओंं’ का समाधान हो, और ‘यूरोप और बाकी दुनिया में एक निष्पक्ष सुरक्षा संतुलन’ बहाल करना शामिल है.

उन्होंने कहा, ‘हमें उम्मीद है कि कीव और यूरोपीय राजधानियां मौजूदा घटनाक्रम को रचनात्मक रूप से देखेंगी और बाधाएं नहीं खड़ी करेंगी.

क्या पुतिन बैठक के असली विजेता हैं?

व्लादिमीर पुतिन के लिए अलास्का में हुई बातचीत एक कूटनीतिक जीत है. इसे लेकर मॉस्को में माहौल उत्साहपूर्ण था.

रॉयटर्स के अनुसार, रूसी संसद के उच्च सदन की विदेश मामलों की समिति के अध्यक्ष कोंस्टेंटिन कोसाच्योव ने टेलीग्राम पर लिखा, ‘अलास्का में हुई बैठक, उसका स्वरूप और उसका परिणाम, दोनों राष्ट्रपतियों के लिए एक महत्वपूर्ण और संयुक्त सफलता का प्रतीक है.’

एक वरिष्ठ रूसी नेता ने द गार्जियन को बताया, ‘पुतिन ने ट्रंप को कुछ नहीं दिया, फिर भी उन्हें वह सब कुछ मिल गया जो वह चाहते थे.’

उन्होंने आगे कहा: नए प्रतिबंधों का न होना, ट्रंप द्वारा मास्को की रेड लाइइन्स को मौन स्वीकृति और अमेरिकी राष्ट्रपति के बराबर समझे जाना, इन सभी ने पुकिन की जीत को और मज़बूत किया है.

रूसी सुरक्षा परिषद के उपाध्यक्ष दिमित्री मेदवेदेव ने भी यूक्रेन को लेकर मास्को पर दबाव बढ़ाने से ट्रंप के इनकार को सबसे महत्वपूर्ण परिणामों में से एक बताया.

संयुक्त राज्य अमेरिका में भी यह मत था कि पुतिन ने जनसंपर्क का लक्ष्य हासिल कर लिया है.

वाशिंगटन पोस्ट ने इसे ‘अमेरिका की हार’ बताया है.

न्यूयॉर्क टाइम्स ने तर्क दिया कि पुतिन ने प्रभावी रूप से एक बड़ा युद्ध लक्ष्य हासिल कर लिया है. ‘वह प्रतिबंधित तानाशाह के दायरे से बाहर निकल आए हैं, और संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति ने उन्हें एक शांतिदूत के रूप में स्वागत किया. पुतिन ने अपनेे तेल क्षेत्र पर प्रतिबंधों की सारी बातों को शांत कर दिया है. और उन्होंने कुछ भी नहीं छोड़ा.’

यूरोप और यूक्रेन ने शिखर सम्मेलन पर कैसी प्रतिक्रिया दी?

जर्मनी, फ्रांस, ब्रिटेन, इटली और यूरोपीय संघ के नेतृत्व में यूरोपीय नेताओं ने एक संयुक्त बयान जारी कर यूक्रेन की संप्रभुता के प्रति अपने अटूट समर्थन की पुष्टि की और ज़ोर दिया कि रूस कीव के नाटो या यूरोपीय संघ के साथ भविष्य के संबंधों को निर्धारित नहीं कर सकता.

उन्होंने तब तक मास्को पर प्रतिबंध कड़े करने और आर्थिक दबाव बनाए रखने का संकल्प लिया, जब तक कि उनके अनुसार न्यायसंगत और स्थायी शांति स्थापित नहीं हो जाती.

ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टारमर और फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने व्लादिमीर पुतिन से मुलाकात करने की डोनाल्ड ट्रंप की पहल की सराहना की, लेकिन उन्होंने ज़ोर दिया कि किसी भी बातचीत के साथ यूक्रेन के लिए मज़बूत सुरक्षा गारंटी भी होनी चाहिए.

कीव की प्रतिक्रिया ज़्यादा सतर्क थी. राष्ट्रपति व्लादिमीर ज़ेलेंस्की ने यूक्रेन को शामिल करते हुए त्रिपक्षीय समझौते के ट्रंप के प्रस्ताव का स्वागत किया, लेकिन कहा कि यूरोपीय भागीदारी ज़रूरी है.

हालांकि, फ़ॉक्स न्यूज़ पर ट्रंप की टिप्पणियों ने कीव और कई यूरोपीय राजधानियों में बेचैनी बढ़ा दी है.

ट्रंप ने रूस और यूक्रेन की स्थिति की तुलना करते हुए कहा, ‘रूस एक बहुत बड़ी शक्ति है, और वह (यूक्रेन) नहीं है.’

उन्होंने आगे कहा कि ज़ेलेंस्की को ‘समझौता करना होगा.’

यूरोप के लिए इससे यह आशंका और प्रबल हो गई कि ट्रंप मास्को से पारस्परिक गारंटी हासिल किए बिना कीव पर रियायतें देने का दबाव डाल सकते हैं.

ट्रंप ने रूस के इस पुराने रुख को दोहराया कि युद्धविराम अनावश्यक है.

ट्रुथ सोशल पर, ट्रंप ने लिखा कि सबसे अच्छा तरीका ‘सीधे शांति समझौते पर पहुंचना है, जिससे युद्ध समाप्त हो जाएगा, न कि केवल युद्धविराम समझौता, जो अक्सर टिक नहीं पाता.’

यूक्रेनी संसद की विदेश मामलों की समिति के अध्यक्ष ओलेक्सांद्र मेरेज़्को ने फ़ाइनेंशियल टाइम्स को बताया कि ऐसा प्रतीत होता है कि ‘ट्रंप पुतिन के साथ मिल गए हैं और वे दोनों हमें शांति संधि स्वीकार करने के लिए मजबूर कर रहे हैं, जिसका वास्तव में मतलब है यूक्रेन का आत्मसमर्पण.’

मीडिया रिपोर्ट कहती हैं कि इस बैठक के बाद हुए एक फ़ोन कॉल में ट्रंप ने राष्ट्रपति ज़ेलेंस्की और यूरोपीय नेताओं से कहा कि पुतिन ने प्रस्ताव दिया है कि अगर यूक्रेन अपने डोनेट्स्क और लुगांस्क इलाकों को पूरी तरह से सौंप दे, तो ज़्यादातर अग्रिम मोर्चे बंद कर दिए जाएंगे.

रॉयटर्स ने बताया कि ज़ेलेंस्की ने इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया, जबकि फ़ाइनेंशियल टाइम्स ने कहा कि वह ट्रंप की आगामी वाशिंगटन यात्रा के दौरान उनके साथ क्षेत्रीय मुद्दे पर चर्चा करने को तैयार हैं.

नई दिल्ली ने इस पर क्या प्रतिक्रिया दी?

भारत ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के बीच अलास्का शिखर सम्मेलन का स्वागत किया और इसे बातचीत की दिशा में एक सकारात्मक कदम बताया.

विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा, ‘भारत राष्ट्रपति ट्रंप और राष्ट्रपति पुतिन के बीच अलास्का में हुई शिखर बैठक का स्वागत करता है.’

उन्होंने आगे कहा कि नई दिल्ली ‘यूक्रेन संघर्ष के समाधान के लिए बातचीत और कूटनीति को आगे बढ़ाने के तरीके के रूप में लगातार वकालत करता है.’

उल्लेखनीय है कि नई दिल्ली की प्रतिक्रिया को इस राहत के रूप में देखा जा सकता है कि बातचीत पर ध्यान केंद्रित करने से भारत के लिए एक संभावित अवसर पैदा होता है, जो वाशिंगटन के साथ अपनी रणनीतिक साझेदारी और रूसी ऊर्जा पर अपनी भारी निर्भरता के बीच फंसा हुआ है.

यह दबाव इस महीने की शुरुआत में और बढ़ गया जब अमेरिका ने रूसी तेल खरीद पर 25 प्रतिशत के द्वितीयक प्रतिबंधों के बाद भारतीय वस्तुओं पर टैरिफ बढ़ाकर 50 प्रतिशत कर दिया.

क्या भारत को अमेरिकी टैरिफ से कुछ राहत मिल सकती है?

डोनाल्ड ट्रंप द्वारा मास्को को यूक्रेन समझौते के लिए प्रेरित करने के नवीनतम प्रयास ने यह सवाल पैदा कर दिया है कि क्या भारत को भारी अमेरिकी टैरिफ से राहत मिल सकती है.

दो दिन पहले, अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने कहा था कि अगर यह बैठक योजना के अनुसार नहीं हुई, तो ट्रंप भारत पर द्वितीयक शुल्क बढ़ा सकते हैं.

अलास्का जाते समय ट्रंप ने फॉक्स न्यूज़ को बताया कि टैरिफ के कारण भारत को रूसी तेल खरीदना बंद करना पड़ेगा.

पाकिस्तान में भारत के पूर्व राजदूत अजय बिसारिया ने अलास्का बैठक को भारत के लिए ‘आश्वस्त करने वाला’ बताया.

उन्होंने द वायर को बताया, ‘पहली अच्छी खबर यह है कि बैठक हुई.’

उन्होंने आगे कहा, ‘कोई भी समस्या का कोई चौंकाने वाला परिणाम नहीं निकला’ और ‘उस रिश्ते के पूरी तरह से टूटने’ का कोई संकेत नहीं मिला.

बिसारिया ने कहा, ‘ऐसे संकेत थे कि ट्रंप या तो भारत को 25 प्रतिशत प्रतिबंधों के लिए और समय देंगे… या उन्हें वापस ले लेंगे, या फिर उसे और लंबी समयसीमा देंगे.’

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