चीन के विदेश मंत्री वांग यी की भारत यात्रा: सात सवाल, जिनके जवाब नहीं मिले

चीनी विदेश मंत्री वांग यी की दिल्ली यात्रा सुर्खियों में रही. इस यात्रा ने आधिकारिक तौर पर एक उम्मीद देने का काम किया, लेकिन यह दौरा भारत के सबसे जटिल द्विपक्षीय संबंधों के प्रति मोदी सरकार के दृष्टिकोण को लेकर कुछ गहरे और अनसुलझे सवाल भी पीछे छोड़ गया है.

/
19 अगस्त, 2025 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नई दिल्ली में एक बैठक के दौरान चीनी विदेश मंत्री वांग यी के साथ. ( फोटो: @narendramodi on X via PTI)

नई दिल्ली: चीनी विदेश मंत्री वांग यी की हालिया दिल्ली यात्रा सुर्खियों में रही. इस यात्रा ने आधिकारिक तौर पर एक उम्मीद देने का काम किया, लेकिन इस दौरे ने भारत के सबसे जटिल द्विपक्षीय संबंधों के प्रति मोदी सरकार के दृष्टिकोण को लेकर कुछ गहरे और अनसुलझे सवाल भी छोड़े हैं.

भले ही दोनों पक्ष फिर से राजनयिक माध्यमों और नए संवाद मंचों की शुरुआत को लेकर उत्साहित हैं, लेकिन भारत की सुरक्षा और भू-राजनीतिक स्थिति को निर्धारित करने वाले अंतर्निहित मुद्दे अभी भी काफी हद तक अनसुलझे हैं.

वांग यी की यात्रा के बाद ये सात जरूरी सवाल, जिनके जवाब नहीं मिले.

1) क्या पूर्वी लद्दाख में एलएसी पर स्थिति अप्रैल 2020 वाली यथास्थिति पर लौट आई है?

मोदी सरकार सीधी उड़ानों, सीमा व्यापार और तीर्थयात्राओं को फिर से शुरू करने सहित संबंधों को तेज़ी से सामान्य बना रही है, लेकिन मुख्य सीमा विवाद पर कोई ठोस प्रगति नहीं हुई है और लद्दाख में प्रमुख टकराव बिंदुओं पर यथास्थिति बहाल नहीं हुई है.

यह भारत की दीर्घकालिक नीति से उलट है, जैसा कि विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने स्पष्ट किया है, ‘हमारे संबंध सामान्य नहीं हैं, यह सामान्य नहीं हो सकते क्योंकि सीमा पर स्थिति सामान्य नहीं है.’

मालूम हो कि बफर ज़ोन के कुछ क्षेत्र भारतीय सैन्य गश्ती दल की पहुंच से बाहर हैं, जो इस बात की पुष्टि करता है कि क्षेत्रीय यथास्थिति की ठोस बहाली अभी भी दूर की कौड़ी है.

यदि लद्दाख सीमा संकट का समाधान किए बिना द्विपक्षीय संबंधों का सामान्यीकरण संभव है, तो ऐसे में सवाल उठता है कि भारत भविष्य में सैन्य वापसी का लाभ कैसे प्राप्त करेगा?

2) क्या चीन द्वारा स्टेपल्ड वीज़ा पर अपनी नीति बदले बिना भारत ने ताइवान पर अपना रुख दोहराया है?

चीन के आधिकारिक बयानों के अनुसार, जयशंकर ने अपने चीनी समकक्ष से कहा कि ‘ताइवान चीन का हिस्सा है‘ और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने वांग से कहा कि ‘भारत ने हमेशा एक-चीन नीति का पालन किया है.’

उल्लेखनीय है कि विदेश मंत्रालय ने जयशंकर के बयान का खंडन नहीं किया, न ही डोभाल के शब्दों पर कोई स्पष्टीकरण दिया गया है. जबकि, ‘एक-चीन’ एक ऐसा वाक्यांश है, जिसका इस्तेमाल भारत 2008 से संयुक्त बयानों में करने से बचता रहा है, जब बीजिंग ने जम्मू-कश्मीर और अरुणाचल प्रदेश के कुछ भारतीय नागरिकों को स्टेपल्ड वीज़ा जारी करना शुरू किया था.

चीन की वीज़ा नीति में बदलाव का कोई सबूत नहीं है, जिससे यह संदेह पैदा होता है कि मोदी सरकार ने यह कूटनीतिक रियायत क्यों दी, खासकर बिना किसी सार्वजनिक स्पष्टीकरण या बीजिंग की ओर से कोई प्रतिक्रिया दिए.

3) चीन के ‘अर्ली हार्वेस्ट’ प्रस्ताव पर नीतिगत बदलाव क्यों आया है?

मोदी सरकार अब ‘अर्ली हार्वेस्ट’ सीमा समझौते के प्रस्ताव पर विचार करने के लिए सहमत हो गई है, जिसे 2019 में 2005 के राजनीतिक मानदंड समझौते के विपरीत बताते हुए अस्वीकार कर दिया गया था.

इस प्रस्ताव का उद्देश्य सीमा विवाद को टुकड़ों में सुलझाना है, जिसमें सिक्किम सीमा को ‘अर्ली हार्वेस्ट’ मानकर चीन को भूटान के साथ सीमा समझौता करने की अनुमति दी गई है, बजाय इसके कि पूरी सीमा को एक ही पैकेज के रूप में माना जाए. यह भारत के वार्ता रुख में एक महत्वपूर्ण बदलाव का संकेत है, हालांकि यह बिना किसी सार्वजनिक बहस या संसदीय जांच के हुआ है.

ऐसे में यह सवाल बना हुआ है कि 2019 और अब के बीच ऐसा क्या बदलाव आया है जो मोदी सरकार की इस अस्पष्ट रियायत को उचित ठहराता है.

4) बीजिंग अपनी नदियों से केवल आपातकालीन जलविज्ञान संबंधी आंकड़े ही क्यों साझा करेगा?

भारत ब्रह्मपुत्र पर चीन के विशाल बांध निर्माण को लेकर चिंता में है, जो जल प्रवाह और निचली धाराओं की सुरक्षा को प्रभावित करता है. फिर भी चीन ने वास्तविक समय पर निरंतर आंकड़े प्रदान करने के बजाय, केवल ‘मानवीय कारणों से आधारित आपातकालीन स्थितियों’ के दौरान ही जलविज्ञान संबंधी जानकारी साझा करने की प्रतिबद्धता जताई है.

यह सीमा भारत को रणनीतिक परिणामों वाले एकतरफा ऊपरी धाराओं के निर्णयों के प्रति संवेदनशील बनाती है. बयानों में इस मुद्दे को हल करने के लिए चीन की कोई प्रतिबद्धता नहीं दिखाई देती है, क्योंकि मोदी सरकार ‘चिंताओं को रेखांकित’ करती है जबकि चीन केवल उन्हें ‘नोटिस’ करता है, जो बातचीत में प्रभाव की कमी को दर्शाता है.

5) क्या चीन पाकिस्तान को अपना सक्रिय सैन्य समर्थन बंद करने को तैयार है?

भारत के लिए एक और लगातार चिंता का विषय बना हालिया झड़प के दौरान पाकिस्तान को चीनी सैन्य समर्थन रहा है. भारतीय सेना के उप-प्रमुख ने एक सार्वजनिक मंच पर इस बात को उजागर किया था, और ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय सशस्त्र बलों को हुए कुछ बड़े नुकसान के लिए चीनी हथियारों को ज़िम्मेदार ठहराया गया है.

इस बात का कोई सबूत नहीं है कि मोदी सरकार ने इस मामले में गारंटी के लिए चीन पर दबाव डाला हो. यह भारत और चीन के बीच सच्ची दोस्ती और बेहतर संबंधों के लिए एक महत्वपूर्ण शर्त होनी चाहिए. इस आश्वासन के बिना कि बीजिंग भारत के प्रमुख सुरक्षा खतरे को अपना समर्थन कम करेगा, रणनीतिक घेराबंदी और दो मोर्चों पर मिलीभगत का ख़तरा बना रहेगा.

बीजिंग ने आतंकवाद को पाकिस्तान के समर्थन की निंदा करने से भी इनकार किया है.

मालूम हो कि वांग यी के इस दौरे का आखिरी पड़ाव इस्लामाबाद है.

6) क्या चीन ने विवादास्पद व्यापार और आपूर्ति श्रृंखला के मुद्दों को सुलझाने के लिए आधिकारिक तौर पर प्रतिबद्धता जताई है?

मोदी सरकार के आधिकारिक बयान में व्यापार बहाली और सहयोग बढ़ाने का दावा तो किया जा रहा है, लेकिन रणनीतिक आयातों की आपूर्ति को लेकर सवाल बने हुए हैं.

चीन ने डीएपी उर्वरकों, दुर्लभ मृदा या बोरिंग मशीनों, जो भारत के उद्योग और कृषि के लिए महत्वपूर्ण हैं, तक पहुंच बहाल करने या गारंटी देने के लिए कोई सार्वजनिक प्रतिबद्धता जारी नहीं की है.

चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने दुर्लभ मृदा मुद्दे पर किसी आश्वासन की जानकारी से इनकार किया है. इससे बीजिंग द्वारा की गई प्रतिबद्धताओं पर संदेह पैदा होता है.

आधिकारिक बयान और मोदी सरकार की हताशा, चीन द्वारा अचानक निर्यात नियंत्रणों के प्रति भारत की संवेदनशीलता को भी दर्शाती है, जिसका इस्तेमाल बीजिंग भविष्य में कर सकता है.

7) चीन भारत के साथ अपने व्यापक व्यापार असंतुलन को अपने पक्ष में कैसे दूर करेगा?

भारत के लिए चीन के साथ बढ़ता व्यापार घाटा एक प्रमुख चिंता का विषय है. ट्रंप के टैरिफ ने इसे और बढ़ा दिया है, जिससे भारत का निर्यात प्रभावित होगा.

हालांकि, वांग यी की दिल्ली यात्रा के दौरान दोनों पक्षों ने व्यापार को बढ़ाने पर सहमति व्यक्त की है, लेकिन भारत के घाटे को कम करने या बाज़ार पहुंच असंतुलन को दूर करने के लिए कोई विशेष कदम घोषित नहीं किए गए हैं. ऐसे में बढ़ता व्यापार इस असमानता को और बढ़ा सकता है, जिससे भारत की आर्थिक स्थिति कमज़ोर हो सकती है.

संक्षेप में समझें, तो यह अनुत्तरित सवाल व्यापक चिंता का विषय हैं. चीन के प्रति मोदी सरकार के दृष्टिकोण में अचानक आए बदलाव और दोनों देशों के बीच हुए अस्पष्ट समझौते दोनों देशों के बीच मज़बूत जुड़ाव के बजाय भारत द्वारा रणनीतिक रूप से पीछे हटने के समान हैं.

गौरतलब है कि स्पष्ट उत्तरों का अभाव संबंधों में बढ़ती विषमता को उजागर करता है, जहां भारत भू-भाग, कूटनीति और आर्थिक लाभ के मामले में अपनी ज़मीन गंवा रहा है, साथ ही  चीन से पारस्परिक प्रतिबद्धताएं हासिल करने में विफल रहा है.

ऐसे में जब तक मोदी सरकार स्पष्टता और ठोस परिणाम नहीं देती, चीन के साथ संबंधों को सामान्य बनाने की दिशा में कदम केवल कमज़ोरियों को और उजागर करेंगे, असुरक्षा को बढ़ाएंगे. साथ ही घरेलू और विश्व मंच पर भारत की स्थिति को कमज़ोर करेंगे.