रवींद्रनाथ टैगोर का जन्म 6 मई 1861 को और उनकी पत्नी भवतारिणी उर्फ मृणालिनी देवी (विवाह पश्चात नाम) का जन्म 1 मार्च 1874 को हुआ. दोनों 9 दिसंबर 1883 में विवाह के सूत्र में बंधे. उनकी संतानों, क्रमशः मधुरिलता, रथींद्रनाथ, रेणुका, मीरा तथा शमींद्रनाथ का जन्म 1886 से 1896 के बीच हुआ. इस बीच मृणालिनी देवी अस्वस्थ होती गईं, 22 दिसंबर 1901 को ब्रह्म विद्यालय (शांति निकेतन स्कूल) की स्थापना के बाद गंभीर रूप से अस्वस्थ हुईं और 23 नवंबर 1902 को उनकी मृत्यु हुई.
पत्नी मृणालिनी की मृत्यु के दूसरे दिन से ही टैगोर ने पत्नी की याद में लगभग प्रतिदिन कविताएं लिखना शुरू किया. उनकी इन 27 कविताओं का संग्रह ‘स्मरण‘ शीर्षक से स्वतंत्र काव्यग्रंथ के रूप में मृणालिनी की मृत्यु के बारह वर्ष बाद 1914 में प्रकाशित हुआ. यह मोहितचंद्र सेन के संपादकत्व में रवींद्र काव्यग्रंथ के छठे भाग में भी शामिल है.
टैगोर का एक अन्य संग्रह ‘पलातका‘ 1918 में प्रकाशित हुआ. इस संग्रह में करीब डेढ़ सौ पंक्तियों, 11 पैरा और 830 शब्दों की कविता है, ‘फाँकी‘. इस कविता में पात्र बीनू की अस्वस्थता, उसके साथ ‘मैं‘ की रेलयात्रा और बिलासपुर रेलवे स्टेशन, झामरु कुली की पत्नी हिंदुस्तानी लड़की रुक्मिनी का उल्लेख है.
कविता ‘फाँकी‘ की एक पंक्ति है: ‘बिलासपुर स्टेशन से बदलनी है गाड़ी, जल्दी उतरना पड़ा, मुसाफिरखाने में पड़ेगा छः घंटे ठहरना‘.
26 दिसंबर 1983 को एके बनर्जी मंडल रेल प्रबंधक, बिलासपुर के पद पर आए. वे साहित्य में रुचि रखते थे, और प्रसिद्ध फिल्मकार हृषिकेश मुखर्जी के दामाद थे. बिलासपुर पदस्थापना के साथ उन्हें टैगोर की कविता ‘फाँकी‘ याद आई और उन्होंने बिलासपुर रेलवे स्टेशन के मुख्य प्रवेश के बाईं ओर प्लेटफार्म 1 पर, वीआईपी वेटिंग लाउंज के साथ कविता की इन पंक्तियों को रवींद्रनाथ टैगोर के चित्र के साथ खास फलक बनवा कर, एक समारोह आयोजित कर स्थापित किया.
यह आकर्षण का कारण बना और इसकी चर्चा बिलासपुर और खासकर पेंड्रा में होने लगी. कहा जाने लगा कि टैगोर बिलासपुर होते हुए पेंड्रा गए थे, वहां पत्नी का इलाज हुआ, पेंड्रा में ही पत्नी की मृत्यु हुई और उसके बाद अकेले वापस लौट गए. इस चर्चा का आधार यह कविता थी. कविता में आए नाम बीनू को टैगोर की पत्नी मृणालिनी देवी और ‘मैं‘ को साहित्यिक अभिव्यक्ति के पात्र प्रथम पुरुष के बजाय टैगोर मान लिया गया.

फाँकी और बिलासपुर का जुड़ाव
इंटरनेट पर तमाम ख़बरें मिल जाती हैं कि पेंड्रा में इलाज के दौरान मृणालिनी-बीनू का देहांत हो गया, इसी सैनेटोरियम में रविंद्रनाथ की पत्नी के शरीर को मिट्टी दी गई और समाधि बनाई गई.
अब बिलासपुर स्टेशन पर पूरी बांग्ला कविता हिंदी और अंग्रेजी अनुवाद सहित लगाई गई है, जिस पर अंकित है– ‘यह कविता कविगुरु श्री रवींद्रनाथ टैगोर द्वारा सन 1918 में बिलासपुर स्टेशन के प्रतीक्षालय में लिखी गई. और फिर 10.12.2012 को रवींद्रनाथ ठाकुर का 5 रुपये का डाक टिकट विशेष आवरण सहित जारी हुआ, जिसमें अंकित है– ‘रविन्द्र नाथ टैगोर एवं उनकी धर्म पत्नी श्रीमती मृणालिनी देवी सन् 1900 में अपनी एक यात्रा के दौरान बिलासपुर स्टेशन के प्रतीक्षालय में छः घंटा रुके. उन्होंने इसका वर्णन अपनी एक कविता में किया है.’
मई 2023 में जिला अस्पताल के सैनेटोरियम परिसर में टैगोर के प्रवास की स्मृति में उनकी प्रतिमा स्थापित की गई और जुलाई 2023 में परिसर के बरगद के पेड़ को काटने का यह कहकर विरोध हुआ कि टैगोर इस पेड़ के नीचे बैठते थे.

कविता के रचना काल, स्थान और बिलासपुर यात्रा के वर्ष की विसंगतियों के बावजूद यह मान्यता स्थापित हो गई.
मगर 2008 में रमेश अनुपम संपादित ‘जल भीतर इक बृच्छा उपजै’ पुस्तक का पहला संस्करण आया, जिसकी तीसरी आवृत्ति, 2012 में नेशनल बुक ट्रस्ट से प्रकाशित हो चुकी है.
पुस्तक के प्रवासी खंड में रवींद्रनाथ टैगोर की कविता फाँकी (बांग्ला), उत्पल बनर्जी के हिंदी अनुवाद ‘छलाना‘ (न कि छलना या छलावा) सहित प्रकाशित है. इसके साथ लंबी पाद– टिप्पणी है, जिसमें बताया गया है कि कविगुरु मृणालिनी देवी को लेकर छत्तीसगढ़ आए. छत्तीसगढ़ का पेंड्रा रोड उस समय क्षय रोग चिकित्सा के लिए संपूर्ण एशिया में विख्यात था. वे 1901 में पेंड्रा रोड में दो महीने रुके. मृणालिनी देवी मात्र तेईस वर्ष की अल्पायु में कविगुरु को अकेले छोड़कर अनंत में विलीन हो गईं. पेंड्रा रोड का विश्वविख्यात टीबी सैनेटोरियम तथा यहां की जलवायु भी मृणालिनी देवी को मृत्यु के चंगुल से नहीं बचा सका.
‘फाँकी’ कविता और मृणालिनी देवी
यहां भी पेंड्रा यात्रा–प्रवास का वर्ष 1901, तथा ‘मृणालिनी देवी मात्र तेईस वर्ष की अल्पायु‘ जैसी विसंगति है. मगर इन सबके बीच यह मान लेना कि बीनू, रवींद्रनाथ टैगोर की पत्नी मृणालिनी देवी का नाम है (जो किसी स्रोत से पुष्ट नहीं होता), ‘फाँकी‘ कविता का ‘मैं‘ स्वयं कवि है और यह संस्मरणात्मक, आत्मकथ्यात्मक अभिव्यक्ति है, के औचित्य पर विचार करने के लिए टैगोर से संबंधित अधिकृत और विश्वसनीय स्रोतों को देख लेना आवश्यक है.
रवींद्रनाथ टैगोर के पुत्र रथींद्रनाथ टैगोर की पुस्तक ‘ऑन द एजेस ऑफ टाइम‘ के विश्व–भारती द्वारा प्रकाशित जून, 1981 के द्वितीय संस्करण, पेज-52 पर मृणालिनी देवी को शांति निकेतन से इलाज के लिए कलकत्ता लाने, डॉक्टरों द्वारा आशा छोड़ देने के साथ मृणालिनी देवी की मृत्यु के दौरान सभी पांच संतानों का वहां होने का उल्लेख है.
कृष्ण कृपलानी (टैगोर की तीसरी बेटी मीरादेवी की बेटी नंदिता के पति) की बहु–प्रशंसित ‘रबीन्द्रनाथ टैगोर, ए बायोग्राफी‘ 1980 का संस्करण विश्व–भारती कलकत्ता ने प्रकाशित किया है. पेज 201 पर उल्लेख है कि शांति निकेतन में नया निवास मिलने के कुछ माह बाद ही मृणालिनी देवी गंभीर रूप से बीमार हुईं और उन्हें कलकत्ता लाया गया, जहां 23 नवंबर 1902 को उनकी मृत्यु हो गई.
रवींद्रनाथ टैगोर के पत्र–व्यवहार के प्रथम खंड में मृणालिनी देवी को लिखे पत्र हैं, इस पुस्तक के अंत में मृणालिनी देवी के जीवन की प्रमुख तिथियां–घटना दी गई हैं, जिसके अनुसार उन्हें 12 सितंबर 1902 इलाज के लिए कलकत्ता लाया गया. 23 नवंबर 1902 जोरासांको में निधन हो गया.

कृष्ण कृपलानी की पुस्तक ‘रवींद्रनाथ ठाकुर एक जीवनी’
1998 में नेशनल बुक ट्रस्ट द्वारा राष्ट्रीय जीवनचरित श्रृंखला में कृष्ण कृपलानी की पुस्तक का अनुवाद रणजीत साहा प्रकाशित ‘रवींद्रनाथ ठाकुर एक जीवनी‘ में पेज 116-117 पर वर्णित है कि ‘ शांतिनिकेतन में, अपना नया घर पाने के कुछ ही दिनों के अंदर रवींद्रनाथ की पत्नी मृणालिनी देवी गंभीर रूप से बीमार पड़ीं. उन्हें कलकत्ता ले जाया गया और जहां 23 नवंबर 1902 को उनका निधन हो गया. … ‘ किसी पेशेवर नर्स को बहाल न कर उन्होंने लगातार दो महीने तक रात और दिन उनकी सेवा की.
उन दिनों बिजली के पंखे नहीं हुआ करते थे और उनके समकालीन साक्ष्यकारों ने बताया है कि हर घड़ी कैसे उनके सिरहाने रवींद्रनाथ हाथ में पंखा लिए हुए लगातार धीरे धीरे झुलाते रहे थे. जिस रात को उनका निधन हुआ, वे पूरी रात अपनी छत की बारादरी के ऊपर नीचे घूमते रहे और उन्होंने सबसे कह रखा था कि उन्हें कोई परेशान न करे.
रंजन बंद्योपाध्याय की पुस्तक ‘आमि रवि ठाकुरेर बोउ‘ का शुभ्रा उपाध्याय द्वारा किया हिंदी अनुवाद ‘मैं रवींद्रनाथ की पत्नी‘ (मृणालिनी की गोपन आत्मकथा) प्रकाशित हुई है. पुस्तक के परिचय (2013) में स्पष्ट किया गया था– ‘मृणालिनी अपनी गोपन आत्मकथा में क्या लिखतीं? इस उपन्यास में वही सोचने की कोशिश की गई है.’
मगर इस पुस्तक का ‘उपसंहार‘ उल्लेखनीय है, जिसमें बताया गया है कि मृणालिनी देवी को चिकित्सा के लिए 12 सितंबर 1902 को कलकत्ता ला कर जोरासांको में रवींद्रनाथ की लालबाड़ी के दूसरे तल पर एक कमरे में रखा गया… मृणालिनी की स्थिति 17 नवंबर को आशंकाजनक हो गई. 23 नवंबर, 1902 को जोरासांको की बाड़ी में मृणालिनी के जीवन का अवसान हुआ. दो महीने ग्यारह दिन उन्हें कलकत्ता में मृत्युशैया की यंत्रणा भोगनी पड़ी.
विकीपीडिया तथा द स्कॉटिश सेंटर आफ टैगोर स्टडीज के वेबपेज के अनुसार– मृणालिनी देवी 1902 में मध्य में बीमार पड़ गईं, जबकि परिवार शांतिनिकेतन में एक साथ रहता था. इसके बाद वे और रवींद्रनाथ 12 सितंबर को शांति निकेतन से कलकत्ता चले गए. डॉक्टर उनकी बीमारी का निदान करने में विफल रहे और 23 नवंबर की रात को 29 वर्ष की आयु में उनकी मृत्यु हो गई. उनके बेटे रथिंद्रनाथ ने बाद में अनुमान लगाया कि उनकी मां को एपेंडिसाइटिस था.
पेंड्रा रेल लाइन और सैनेटोरियम के दस्तावेज़
1910 के गजेटियर के पेज 248 पर पेंड्रा अस्पताल में पुरुष एवं महिला के लिए दो-दो बिस्तर वाले अस्पताल की जानकारी है. पेज 69 पर क्षयरोग का उल्लेख है, मगर सैनेटोरियम का नहीं, जबकि मुंगेली और चांपा के कुष्ठ आश्रम का उल्लेख है. पेज 338 पर उल्लेख है कि एक जोगी और उसके दो विशाल सर्पों ने ‘खोडरी टनल’ काटने पर आपत्ति की और उनके शापवश बड़ी संख्या में मजदूर रोगग्रस्त हो कर मर गए.
1923 के ‘बिलासपुर वैभव‘ पेज 73 पर उल्लेख है कि ‘सन् 1891 में जबसे कटनी लाइन खुली है …’ पेज 105 पर पेंडरा शीर्षक के अंतर्गत उल्लेख है कि गौरेला और पेंडरा के बीच मिस लांगडन का क्षयरोगाश्रम है. पुनः पेज 136 पर ‘पेंडरा जमींदारी का जलवायु शीतल है. इसे बिलासपुर जिले की पंचमढ़ी समझिये. गौरेला और पेंडरा के बीच मिस लांगडनका क्षयरोगाश्रम देखने योग्य है.’
राष्ट्रीय तपेदिक उन्मूलन कार्यक्रम के वेबपेज की जानकारी के अनुसार देश का पहला ओपन एयर सैनेटोरियम अजमेर के पास तिलुआनिया (तिलौनिया) में 1906 में स्थापित हुआ. ऐसी स्थिति में पेंड्रा में आबोहवा बदलने के लिए मरीजों का आना संभव है मगर उपरोक्त उद्धरणों के आधार पर निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि सैनेटोरियम 1910 से 1923 के बीच कभी बना होगा.

कटनी रेलखंड पर गाड़ी का परिचालन 1891 में आरंभ होने की जानकारी मिलती है, मगर दुविधा रह जाती है कि रेलवे रिकॉर्ड्स में 1907 में पहले–पहल भनवारटंक टनेल डाउन का निर्माण हुआ तथा इस खंड में रेल लाइन के दोहरीकरण का कार्य 1960-65 के बीच हुआ. ऐसी स्थिति में 1907 के पहले बिलासपुर से पेंड्रा का रेल लाइन संपर्क कैसे संभव हुआ होगा?
इसी तरह, ‘फाँकी‘ कविता की पहली पंक्ति ‘बिनुर बयस तेइश तखन‘ यानि नाम बीनू और उसकी उम्र तेइस, दोनों ही बातें टैगोर की पत्नी मृणालिनी से मेल नहीं खातीं, क्योंकि भवतारिणी उर्फ मृणालिनी का अन्य नाम बीनू था ऐसा पुष्ट नहीं होता (अन्य संबोधन ‘छोटो बोउ‘, ‘छूटी‘ या ‘छुटि‘ जैसा पत्रों में संबोधन है) और इस समय यानी 1902 में मृणालिनी (जन्म 1874, कहीं 1872/1876 मिलता है) की उम्र 23 वर्ष भी नहीं बैठती.
पत्नी के निधन की कविताएं ‘स्मरण‘ में हैं और ‘फाँकी‘ कविता 1918 में प्रकाशित संग्रह ‘पलातका‘ में शामिल है, और इस कविता की रचना तिथि न होने से इसे 1918 या उसके दो–एक साल पहले की रचना मानना उचित होगा. कविता में बिलासपुर स्टेशन का नाम है, मगर वहां से गाड़ी बदल कर आगे जाने की बात के साथ पेंड्रा का नाम नहीं आया है, यह संभव है कि 1902 में पेंड्रा में अस्पताल था, जैसा कि 1909-10 के गजेटियर से पता लगता है.
साथ ही देश का पहला सैनेटोरियम तिलुआनिया (तिलौनिया) में 1906 स्थापित होने का तथ्य असंदिग्ध है. पेंड्रा सैनेटोरियम की स्थापना वर्ष 1916 में हुई. यह पेंड्रा के लोगों की स्मृति में साधु बाबू अर्थात् मन्म्थनाथ बैनर्जी के साथ जुड़ा है, जो टीबी के इलाज के लिए 1917 में सैनेटोरियम आए थे और फिर स्वस्थ हो कर पूरा जीवन यहां बिताया.
टैगोर का पेंड्रा प्रवास
पेंड्रा निवासी एक अन्य बुद्धिजीवी डॉ. प्रणब कुमार बनर्जी लगभग 25 वर्ष की उम्र में 1961 में यहां आए, 2018 में उनकी मृत्यु हुई. वे साधु बाबू से नियमित संपर्क में रहे थे. डॉ. प्रणब जी से मैंने टैगोर के पेंड्रा प्रवास के बारे में जिज्ञासा की थी, उन्होंने स्वयं अपनी तथा साधु बाबू से होने वाली उनकी चर्चाओं में ऐसी किसी बात को अपुष्ट माना था. डॉ. प्रणब के पुत्र प्रतिभू जी ने भी बताया कि ऐसी कोई बात अपने पिता से उन्होंने नहीं सुनी.
इस तरह टैगोर का पत्नी के इलाज के लिए 1902 में पेंड्रा आना और यहां उनकी मृत्यु मात्र एक काव्य रचना के आधार पर स्वीकार किया जाना उचित प्रतीत नहीं होता.
(इस लेख से संबंधित तथ्यों की सामग्री जुटाने में बिलासपुर और पेंड्रा से जुड़े बुद्धिजीवियों, सहकर्मियों का आभारी हूं.)
(लेखक बायोडायवर्सिटी एक्सप्लोरेशन एंड रिसर्च सेंटर में ‘धरोहर’ परियोजना के प्रमुख हैं.)
