संसार से भागे फिरते हो भगवान को तुम क्या पाओगे
इस लोक को भी अपना न सके उस लोक में भी पछताओगे
ये पाप है क्या ये पुण्य है क्या रीतों पर धर्म की मोहरें हैं
हर युग में बदलते धर्मों को कैसे आदर्श बनाओगे
ये भोग भी एक तपस्या है तुम त्याग के मारे क्या जानो
अपमान रचयिता का होगा रचना को अगर ठुकराओगे
हम कहते हैं ये जग अपना है तुम कहते हो झूठा सपना है
हम जनम बिता कर जाएंगे तुम जनम गंवा कर जाओगे
1964 में आई ‘चित्रलेखा’ नामक फिल्म (जो पाप-पुण्य जैसे अब तक अनसुलझे दार्शनिक विषय पर आधारित है) के लिए साहिर लुधियानवी का लिखा और लता मंगेशकर का गाया गया यह गीत आज भी कहीं बजने लग जाए तो जिंदगी की तेज रफ्तार से परे जाकर हमारे कदम ठिठक जाते हैं और रुककर इसे सुनने का मन होता है. लेकिन अपने समय के जिन लब्धप्रतिष्ठ कथाकार भगवतीचरण वर्मा के इसी नाम के उपन्यास पर यह फिल्म बनी थी, उनका नाम तक याद नहीं आता.
अब कोई इसे हिंदी समाज में लेखकों की बेकद्री से जोड़कर देखे या इस समाज की विस्मरण की प्रवृत्ति से, लेकिन यह निर्विवाद है कि पहले कवि, फिर कथाकार के रूप में भगवतीचरण द्वारा की गई हिंदी साहित्य की सेवा इतनी उपेक्षा के लायक कतई नहीं थी.
1934 में उन्होंने ‘चित्रलेखा’ नामक इस उपन्यास की रचना की तो उपन्यासकार के तौर पर न सिर्फ हिंदी क्षेत्र बल्कि उसके बाहर भी उनके नाम की धूम मच गई थी और आलोचक मानव समाज व उसमें व्याप्त मानवीय रिश्तों की उनकी गहरी समझ के कायल हो गए थे. ‘चित्रलेखा’ को हिंदी के क्लासिक उपन्यासों में अग्रगण्य माना जाने लगा था और उस पर 1940 में केदार शर्मा के निर्देशन में भी एक फिल्म बनी थी.
जीवन-मूल्यों में परिवर्तन की कथा
आज़ादी के बारह वर्षों बाद 1959 में भगवतीचरण ने ‘भूले-बिसरे चित्र’ नामक उपन्यास लिखा, तो उनके कथाकार की चमक एक बार फिर चहुंओर बिखरी. इसके दो साल बाद 1961 में उनको इस उपन्यास के लिए प्रतिष्ठित साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त हुआ. फिर विभिन्न भारतीय व विदेशी भाषाओं में उसके अनुवाद का सिलसिला शुरू हुआ तो उसने अरसे तक रुकने का नाम ही नहीं लिया.
‘भूले-बिसरे चित्र’ की लोकप्रियता का सबसे बड़ा कारण यह था कि भगवतीचरण ने उसमें एक ही परिवार की स्वतंत्रता संघर्ष के दौर की तीन पीढ़ियों के जीवन-मूल्यों में आए परिवर्तनों की कथा लिखी थी. उसके बहाने उन्होंने 1880 यानी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के गठन के थोड़ा पहले के वक्त से 1930 तक के देश के जीवन व समाज में आए बदलावों (मिसाल के तौर पर संयुक्त परिवार प्रथा के विघटन, मध्यवर्ग के उदय, सामंतवाद के अंत के आरंभ, जातिप्रथा, छुआछूत, साम्प्रदायिकता और राष्ट्रीय आंदोलन के जोर पकड़ने) को शब्दांकित किया था.
इससे पहले 1946 में लिखे उनके ‘टेढ़े-मेढ़े रास्ते’ नामक उपन्यास को (जिसमें 1920 के बाद के स्वतंत्रता संग्राम और उस समय की राजनीतिक विचारधाराओं व ताकतों का चित्रण है) हिंदी के गिने-चुने शुरुआती राजनीतिक उपन्यासों में से एक माना जाता है. इसमें उन्होंने उस समय के सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक प्रभावों के साथ गांधीवाद, साम्यवाद, समाजवाद और पारंपरिक मूल्यों के बीच के संघर्षों को भी दर्शाया है.
1970 में प्रकाशित उनके एक अन्य उपन्यास ‘सबहिं नचावत राम गोसाईं’ की विषयवस्तु स्वतंत्र भारत में कस्बाई मध्य वर्ग की महत्वाकांक्षाओं के विस्तार और उसके प्रभाव की कथा पर आधारित है, जबकि उनके अन्य चर्चित उपन्यासों में ‘तीन वर्ष’, ‘अपने खिलौने’, ‘सामर्थ्य और सीमा’, ‘थके पांव’, ‘रेखा’, ‘प्रश्न और मरीचिका’ और ‘धुप्पल’ आदि शामिल हैं.
यहां जानना दिलचस्प है कि उनको लोकप्रियता भले ही हिंदी में प्रेमचंद के बाद के युग के उपन्यासकार के रूप में ज्यादा मिली, हिंदी के की अन्य साहित्यकारों की तरह उन्होंने अपना साहित्यिक जीवन छायावादी कवि के रूप में आरंभ किया था. अलबत्ता, उनकी कुछ कविताओं में प्रगतिवाद और प्रयोगवाद की भी झलक मिलती है.
हिंदी साहित्य संसार को वे ‘मधुकण’, ‘प्रेम-संगीत’ और ‘मानव’ नामक तीन कविता संग्रह दे गए हैं. एक आलोचक के अनुसार ‘अस्मिता की खोज’ उनकी कविताओं का केंद्र-बिंदु है और उनमें बहुधा आत्म-दर्शन अभिव्यक्त हुआ है.
उत्तर प्रदेश में ऐतिहासिक कानपुर जिले के पड़ोसी उन्नाव जिले के सफीपुर क़स्बे में 1903 में 30 अगस्त को जन्मे भगवतीचरण वकील पिता देवीचरण वर्मा की संतान थे. होश संभालते ही उन्हें विभिन्न कारणों से अपने परिवार की जमींदारी को संकटग्रस्त होते देखना पड़ा था. उनके पिता देवीचरण वर्मा का वकालत करना भी, बताते हैं कि, जमींदारी के पराभव और घटती आमदनी से जन्मी परिस्थितियों के ही कारण था.
1908 में देश में प्लेग फैला और उसने देवीचरण की भी जान ले ली, तो जानकार बताते हैं कि उनके घर की माली हालत इतनी खराब हो गई थी कि उसके चलते भगवतीचरण की शिक्षा-दीक्षा की राह भी खासी कंटकाकीर्ण हो गई थी.
कवि बनने के फेर में
इसके बावजूद अपने जीवन संघर्ष में उन्होंने किसी भी मोड़ पर हार नहीं मानी. लिखाई-पढ़ाई के साथ वे छुटपन से ही अच्छी-बुरी कविताएं रचने लगे थे. अनंतर, उनकी रचनाओं में थोड़ा परिष्कार हुआ, तो उन्हें उनके स्कूल की हस्तलिखित पत्रिका के अलावा कानपुर से प्रकाशित गणेशशंकर विद्यार्थी के प्रतिष्ठित पत्र ‘प्रताप’ और ‘शारदा’ जैसी पत्रिकाओं में जगह मिलने लगी, जो उन दिनों बड़ी बात थी.
15 वर्ष के होते-होते उन्हें कानपुर में विश्वंभरनाथ शर्मा ‘कौशिक’, बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’, रमाशंकर अवस्थी व चंडीकाप्रसाद मिश्र आदि साहित्यिक-सांस्कृतिक विभूतियों का सानिध्य मिलने लगा था.
लेकिन कवि बनने के प्रति जरूरत से ज्यादा आकर्षण उन पर इस अर्थ में बहुत भारी पड़ा था कि उन्हें हाईस्कूल और इंटर दोनों परीक्षाओं में एक-एक बार फेल होना पड़ा. जैसे-तैसे पास हुए तो उच्च शिक्षा के लिए उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय का रुख किया.
1928 में वहीं से कानून की पढ़ाई पूरी कर जीविकोपार्जन के लिए वकालत करने की सोची तो उसमें भी सफल नहीं हो पाए.
वकालत नहीं चली तो दुखी होकर गंभीरता से उपन्यासकार बनने की ओर प्रवृत्त हुए और ‘चित्रलेखा’ जैसा क्लासिक उपन्यास दिया तो सफलता को सायास अपने निकट आती देखा. तकनीकी तौर पर ‘चित्रलेखा’ उनका दूसरा उपन्यास था, क्योंकि इससे पहले अपने कॉलेज के दिनों में उन्होंने ‘पतन’ नाम का उपन्यास भी लिखा था, लेकिन कथाकार के तौर पर भरपूर मान्यता उनको चित्रलेखा ने ही दिलाई.
फिल्म निर्देशक केदार शर्मा ने ‘चित्रलेखा’ पर फिल्म बनाई तो उन्हें मशहूर बम्बई टाकीज का सिनेरियो लेखक बनने का अवसर भी दिलाया. आगे चलकर उन्होंने पत्रकारिता में भी हाथ आजमाये. लेकिन अंततः उन्हें पूर्णकालिक साहित्य सृजन ही रास आया.
उपन्यासों के अलावा उन्होंने दार्शनिकता और कौतूहल से भरी अनेक कहानियां, एकांकी और निबंध वगैरह भी लिखे हैं. उनके रहते उनका ‘दो बाँके’ नामक कहानी संग्रह बहुत चर्चित रहा था, जबकि ‘मोर्चाबंदी’, ‘राख़ और चिंगारी’ व ‘इनस्टॉलमेंट’ जैसे कहानी संग्रह भी उनके खाते में थे.
उनके नाटकों के भी तीन ही संग्रह प्रकाशित हैं. अपने कई निबंधों में उन्होंने अपने समय की गंभीर सामाजिक समस्याओं पर विचार किया है तो कई में अपने आलोचक रूप को आगे किया है.
स्वयं से भागने के विरुद्ध
साहित्य और शिक्षा के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए 1971 में उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया गया, जबकि 1978 में राज्यसभा के लिए मनोनीत किया गया था. राज्यसभा सदस्य रहते हुए ही 5 अक्टूबर, 1981 को उन्होंने दिल्ली में आखिरी सांस लेकर इस संसार को अलविदा कह दिया था.
इससे पहले अपने प्रभूत साहित्य की मार्फत वे मनुष्यमात्र को यह सीख दे चुके थे कि मनुष्य को स्वयं से भागने के बजाय अपने जीवन के अनुभवों, साथ ही नियति को सहजता से स्वीकार करना और उनका आनंद लेना चाहिए. क्योंकि भूत और भविष्य केवल कल्पनाएं हैं और वर्तमान ही वास्तविक है, जिसे खुशी-खुशी पूरी तरह जीना चाहिए.
उनकी निगाह से देखें तो वही मनुष्य श्रेष्ठ है, जो अपनी कमज़ोरियां जानकर उनको दूर करने का उपाय कर सके. इस सिलसिले में एक जगह उन्होंने अपने एक पात्र के मुंह से कहलवाया है कि ‘जब-जब थक कर उलझो, तब-तब लंबी तानो!’
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)
