नई दिल्ली: दिल्ली हाईकोर्ट ने दिल्ली दंगों-2020 की तथाकथित ‘बड़ी साज़िश’ के मामले में उमर खालिद, शरजील इमाम और 7 अन्य को जमानत देने से इनकार कर दिया है. इन सभी को जनवरी से सितंबर 2020 के बीच गिरफ्तार किया गया था.
यह फैसला जस्टिस नवीन चावला और जस्टिस शालिंदर कौर की बेंच 2 सितंबर, 2025 (मंगलवार) को सुनाया.
अन्य आरोपियों में अतहर खान, खालिद सैफी, मोहम्मद सलीम खान, शिफा उर रहमान, मीरान हैदर, गुलफिशा फातिमा और शादाब अहमद शामिल हैं. इन सभी आरोपियों ने निचली अदालत के उन आदेशों को चुनौती दी थी, जिनमें उन्हें ज़मानत देने से मना कर दिया गया था.
उमर ख़ालिद की दलीलें: सुनवाई के दौरान, उमर ख़ालिद के वकील वरिष्ठ अधिवक्ता त्रिदीप पैस ने कहा था कि सिर्फ़ वॉट्सऐप ग्रुप्स में होना, लेकिन कोई संदेश न भेजना, किसी अपराध के दायरे में नहीं आता. उन्होंने यह भी दलील दी थी कि ख़ालिद से न तो कोई पैसे की बरामदगी हुई है और न ही कुछ और. अभियोजन पक्ष जिस कथित गुप्त बैठक की बात कर रहा है (23-24 फरवरी 2020 की रात), वह बिल्कुल भी ‘गुप्त’ नहीं थी, जैसा पुलिस दावा कर रही है.
ख़ालिद सैफ़ी की दलीलें: वरिष्ठ अधिवक्ता रेबेका जॉन ने कहा, ‘क्या सामान्य संदेशों के आधार पर, या फिर अभियोजन की कहानियां गढ़ने की कोशिशों के आधार पर यूएपीए लगाया जा सकता है? क्या यह ज़मानत न देने का आधार हो सकता है, या यूएपीए के तहत मुक़दमा चलाने का?’ उन्होंने यह भी कहा कि सैफ़ी को ज़मानत दी जानी चाहिए क्योंकि तीन सह-आरोपियों को जून 2021 में ज़मानत मिल चुकी है.
शरजील इमाम की दलीलें: शरजील ने कहा कि उनका बाक़ी सभी सह-आरोपियों से कोई संपर्क नहीं है और न ही वे किसी साज़िश या साज़िशी बैठकों का हिस्सा रहे हैं. उनके वकील अधिवक्ता तालिब मुस्तफ़ा ने कोर्ट में कहा कि दिल्ली पुलिस ने जो आरोप लगाया है, उसके मुताबिक इमाम की भूमिका 23 जनवरी, 2020 तक सीमित है. दिल्ली पुलिस ने इमाम के ख़िलाफ़ जो सबसे ‘सबूत’ पेश किया है, वो बिहार में दिया गया उनका भाषण है.
सरकार की दलीलें: सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता, जो दिल्ली पुलिस की ओर से पेश हुए थे, उन्होंने ज़मानत याचिकाओं का विरोध करते हुए कहा, ‘अगर आप देश के ख़िलाफ़ कुछ कर रहे हैं तो फिर बेहतर है कि आप जेल में रहें, जब तक कि या तो बरी न हो जाएं या सज़ा न पा लें.’
उन्होंने यह भी कहा कि आरोपियों का मक़सद था कि एक ख़ास दिन को दंगे-आगज़नी कराकर देश को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बदनाम किया जाए.
इस केस में आरोपी हैं: ताहिर हुसैन, उमर ख़ालिद, ख़ालिद सैफ़ी, इशरत जहां, मीरान हैदर, गुलफ़िशा फ़ातिमा, शिफ़ा-उर-रहमान, आसिफ़ इक़बाल तनहा, शादाब अहमद, तस्लीम अहमद, सलीम मलिक, मोहम्मद सलीम ख़ान, आतहर ख़ान, सैफ़ूरा ज़रगर, शरजील इमाम, फ़ैज़ान ख़ान और नताशा नरवाल.
दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल का क्या दावा है?
इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल, जो दंगों के पीछे की कथित साज़िश की जांच कर रही है, ने इन 18 लोगों को कठोर गैरकानूनी गतिविधियां (निवारण) अधिनियम (यूएपीए) और भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की प्रासंगिक धाराओं के तहत गिरफ्तार किया था.
फिलहाल, यह मामला आरोप तय करने की प्रक्रिया में है. फरवरी 2020 के दिल्ली दंगों में 53 लोगों की मौत हो गई थी और 700 से ज़्यादा लोग घायल हुए थे.
दिल्ली दंगों से जुड़े मामलों में 6 मार्च, 2020 को एफआईआर दर्ज की गई थी. 16 सितंबर 2020 से 7 जून 2023 के बीच पांच चार्जशीट दाखिल की गईं है.
स्पेशल सेल के मुताबिक, दंगे कई महीनों तक चली एक ‘गहरी साज़िश’ का नतीजा थे, जो कथित तौर पर दिसंबर 2019 में नागरिकता संशोधन विधेयक को कैबिनेट से मंजूरी मिलने के बाद रची गई थी. इस ‘साज़िश’ में 23 प्रदर्शन स्थलों की स्थापना शामिल थी, जो ‘मुस्लिम-बहुल इलाकों’ में मस्जिदों और मुख्य सड़कों के पास बनाए गए और 24 घंटे चलाए गए.
स्पेशल सेल का दावा है कि आरोपियों का इरादा था कि ‘जब पर्याप्त संख्या में लोग जुट जाएं, तो प्रदर्शन को चक्का जाम में बदला जाए’, और यह सब उस समय की योजना का हिस्सा था जब तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप 2020 में दिल्ली आए थे. उनका लक्ष्य, स्पेशल सेल के अनुसार, साम्प्रदायिक हिंसा फैलाना था.
अपने केस को साबित करने के लिए, एंटी-टेरर यूनिट ने मुख्य रूप से उन वॉट्सऐप चैट्स पर भरोसा किया, जिनमें कथित तौर पर प्रदर्शन की योजना बनाई जा रही थी; सीसीटीवी फुटेज, जिसमें कुछ आरोपियों को संपत्ति नष्ट करते देखा जा सकता है; और संरक्षित गवाहों के बयान, जिन्होंने आरोपियों की इस ‘साज़िश’ में भूमिका बताई.
वॉट्सऐप ग्रुप्स Muslim Students of JNU (MSJ), Jamia Coordination Committee (JCC) और Delhi Protest Support Group (DPSG) से हुई बातचीत का ज़िक्र चार्जशीट में कई बार आया है.
