नई दिल्ली: केरल के राज्यपाल राजेंद्र आर्लेकर ने मंगलवार (2 सितंबर) को सुप्रीम कोर्ट से आग्रह किया कि एपीजे अब्दुल कलाम प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय और केरल डिजिटल विश्वविद्यालय के लिए कुलपतियों (वीसी) के चयन की प्रक्रिया से राज्य के मुख्यमंत्री को बाहर रखा जाए.
द हिंदू की खबर के मुताबिक, राज्यपाल जो इन दोनों राज्य संचालित विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति भी हैं, ने कहा कि न तो एपीजे अब्दुल कलाम प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय अधिनियम और न ही केरल डिजिटल विश्वविद्यालय अधिनियम में कुलपतियों के चयन में मुख्यमंत्री की भूमिका की परिकल्पना की गई है.
उन्होंने आगे संकेत दिया कि इस प्रक्रिया में मुख्यमंत्री की भागीदारी एक व्यक्ति द्वारा स्वयं अपना मामला तय करने के समान होगी, जो विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) विनियमों के खिलाफ है.
राज्यपाल ने कुलाधिपति के रूप में दायर एक आवेदन में कहा, ‘राज्य के कार्यकारी प्रमुख होने के नाते मुख्यमंत्री सरकार द्वारा प्रबंधित और विश्वविद्यालय से संबद्ध कई सरकारी कॉलेजों से जुड़े हैं. इसलिए यूजीसी विनियमों के अनुसार कुलपतियों की नियुक्ति में उनकी कोई भूमिका नहीं हो सकती.’
इस आवेदन में सुप्रीम कोर्ट के 18 अगस्त के आदेश के कुछ हिस्सों में संशोधन की मांग की गई थी, जिसमें शीर्ष अदालत के पूर्व न्यायाधीश, जस्टिस सुधांशु धूलिया को नियुक्तियों के लिए खोज और चयन (search cum selection) के लिए बनाई गई समितियों का अध्यक्ष नियुक्त किया गया था. इस आदेश का उद्देश्य इस मुद्दे पर राज्य सरकार और राज्यपाल के बीच गतिरोध को तोड़ना था.
18 अगस्त के आदेश में सर्च पैनल के सदस्यों को केरल सरकार और कुलाधिपति दोनों द्वारा सुझाए गए नामों में से चुनने की अनुमति भी दी गई थी.
जस्टिस धूलिया पर कोई आपत्ति न होने की बात स्पष्ट करते हुए राज्यपाल ने पैनल में राज्य के नामांकित व्यक्तियों को शामिल करने का विरोध किया.
राज्यपाल के आवेदन में कहा गया है कि यूजीसी विनियमों के अनुसार, सर्च समिति के सदस्यों का ‘उच्च शिक्षा के क्षेत्र में प्रतिष्ठित व्यक्ति होना आवश्यक है और उनका संबंधित विश्वविद्यालय या उसके कॉलेजों से किसी भी तरह से कोई संबंध नहीं होना चाहिए.’
राज्यपाल ने तर्क दिया, ‘यूजीसी विनियम राज्य सरकार की किसी भी भूमिका को छोड़कर विश्वविद्यालयों की स्वतंत्रता और स्वायत्तता पर प्रकाश डालते हैं. वर्तमान मामले में राज्य विश्वविद्यालय अधिनियम भी दोनों विश्वविद्यालयों की स्वतंत्रता और स्वायत्तता पर विचार करता है. दोनों विश्वविद्यालय अधिनियम कुलपतियों के चयन और नियुक्ति के मामले में मंत्री या मुख्यमंत्री की कोई भूमिका प्रदान नहीं करते हैं.’
राज्यपाल ने इस मामले में यूजीसी को पक्षकार बनाने के लिए न्यायिक निर्देश देने हेतु एक अलग आवेदन भी दायर किया.
उन्होंने कहा कि सर्च पैनल में यूजीसी अध्यक्ष के एक नामित व्यक्ति को शामिल करना अनिवार्य है. सर्वोच्च न्यायालय ने स्वयं कहा था कि कुलपति की नियुक्तियों में यूजीसी के 2018 के नियमों का कड़ाई से पालन किया जाना चाहिए.
नियमों के अनुसार, संभावित कुलपति उम्मीदवारों के नामों की सूची सर्च कमेटी द्वारा कुलाधिपति के समक्ष प्रस्तुत की जानी चाहिए.
आवेदन में कहा गया है कि नाम तय करने में न तो राज्य और न ही मुख्यमंत्री की कोई भूमिका थी. इसमें कहा गया है, ‘यूजीसी के नियमों के अनुसार, सर्च कमेटी द्वारा प्रस्तुत सूची में से कुलपति का चयन करने का विशेषाधिकार कुलाधिपति के पास है.’
राज्यपाल ने तर्क दिया कि समिति द्वारा दी गई सूची उम्मीदवारों की ‘रैंक सूची’ नहीं होनी चाहिए, क्योंकि इससे कुलाधिपति को दिए गए विवेकाधिकार का उल्लंघन होगा. इसके बजाय पैनल को तीन से पांच नाम प्रदान करने चाहिए, जिनमें से सभी उपयुक्त माने जाएं और अंतिम निर्णय कुलाधिपति पर छोड़ देना चाहिए.
आवेदन में आगे तर्क दिया गया कि कुलाधिपति राज्य के राज्यपाल भी हैं, लेकिन उनसे कुलपति नियुक्तियों में मंत्रिमंडल की सलाह पर कार्य करने की अपेक्षा नहीं की जाती है.
सर्वोच्च न्यायालय के पिछले निर्णयों का हवाला देते हुए इसमें कहा गया है कि ‘किसी ऐसे प्राधिकारी के इशारे पर लिया गया ऐसा कोई भी निर्णय, जिसकी क़ानून के अनुसार कोई भूमिका नहीं है, गलत माना जाएगा और उस निर्णय को अमान्य घोषित करने के लिए पर्याप्त होगा.’
