हिंदी पत्रकारिता को लेकर अपने लंबे सार्वजनिक जीवन में मुझे जो अनुभव हुए, उनमें से अधिकांश निराश करने वाले, बहुत सारे बहुत कटु रहे हैं. उसमें सच्चे-ईमानदार-साहसी पत्रकार और संपादक कम ही मिले. राम जन्मभूमि आंदोलन से तो हिंदी मीडिया का जो पतन हुआ, उसने जो सांप्रदायिक, धर्मांध आदि होना शुरू किया, वह इन दिनों तो अपने चरम पर है.
इस बीच उसने झूठ और घृणा फैलाने, अफ़वाहें और झांसों को प्रोत्साहित करने, हर तरह की सम्यकता और वस्तुनिष्ठता को तजकर सत्ता और बाज़ार का पूंछहिलाऊ पालतू स्वामिभक्त बनने में सारी मर्यादाएं पार कर ली हैं. स्वयं हिंदी भाषा को विकृत कर, उसका दुरूपयोग कर, उसे झूठ-घृणा-हिंसा-गालीगलौज-झगड़े की राजभाषा तक बना दिया है.
लोकतंत्र और पत्रकारिता के इस अंधेरे समय में, फिर भी, पत्रकारिता में जो कुछ ईमान, साहस, निडरता और प्रतिरोध बचा हुआ है उसके प्रहरी और अग्रदूत कुछ पत्रकार हैं: वे थोड़े हैं और सच और सचाई वही बोल-लिख-दिखा रहे हैं. उन्हें सत्ता तरह-तरह से तंग कर रही है पर वे अपनी आलोचकवृत्ति से डिगे या दूर नहीं हटे हैं. उनको देखने-पढ़ने वाले नागरिकों की संख्या कुल मिलाकर करोड़ों तक पहुंच चुकी है.
इसका आशय यह भी है कि सच और सचाई को, तथ्यों को जानने की सहज नागरिक इच्छा बिल्कुल ग़ायब नहीं हो गई है. हमारे लोकतंत्र के इतिहास में जब इस अंधेरे समय का लेखा-जोखा किया जाएगा तो उनका साक्ष्य बहुत मूल्यवान् होगा. उनकी भूमिका के महत्व का समुचित आकलन भी होगा, इसका भी कि कैसे अनेक कष्टों और दबावों के बावजूद उन्होंने निडर रहकर पत्रकारिता को सच का पक्षधर, लोकतंत्र का प्रहरी और अंतःकरण का प्रवक्ता बनाए रखा.
ऐसे कुछ लोगों के रहते बड़े-बड़े चैनलों पर आने वाले चिकने-चुपड़े झूठे और चापलूस एंकर और अनेक दलों के प्रवक्ता हास्यास्पद और दयनीय लगते हैं. उनके बरक़्स जो निडर पत्रकार हैं, वे दुर्घर्ष योद्धा और नैतिक क़द में बहुत ऊंचे नज़र आते हैं. उनकी ऊंचाई इन बिके पत्रकारों को, बिना कोई कोशिश किए, बेहद बौना बना और साबित कर रही है.
हिंदी में ऐसे लेखक थोड़े ही हैं जो इन दिनों सार्वजनिक मंचों पर झूठ-घृणा-हिंसा-हत्या की राजनीति के विरुद्ध लिख-बोल रहे हैं. भले अधिकांश हिंदी लेखकों ने सांप्रदायिकत धर्मांध शक्तियों के पक्ष में पाला नहीं बदला है पर दुर्भाग्य से वे अधिकतर चुप रहते हैं- वे भी, जो पहले राजनीति और साहित्य के संबंध और संवाद की अनिवार्यता को लेकर बहुत वाचाल होते थे.
अभी पिछले हफ़्ते लेखिका अरुंधति रॉय ने कहा है कि ‘ऐतिहासिक रूप से लेखकों को सत्ताओं के लिए संभावित ख़तरे की तरह देखा गया है और अब भी देखा जाता है. फिर भी, लेखकों का अधिकांश ऐसा ख़तरा नहीं होते. वे सुरक्षित, सफल और किसी रूप में कमोडीफाई होने के लिए तैयार रहते हैं. जब वे ऐसे नहीं होते तब वे ‘ख़तरनाक’ हो जाते हैं.’
ज़ाहिर है कि ज़्यादातर लेखक, जिस भी कारण से, परिवार-नौकरी आदि के दबाव में सही, कोई जोखिम उठाना नहीं चाहते. ऐसी स्थिति में हिंदी के कुछ पत्रकारों ने अपनी सक्षम मुखरता, यथार्थ पर अपनी पकड़, अपनी प्रखर-निडर आलोचना से, हिंदी लेखकों को, लगता है, पीछे छोड़ दिया है.
पहले लेखक अग्रदूत होते थे, आज पत्रकार अग्रदूत हैं- वे आज सचाई के क़िस्सागोई सच के चौकीदार, हिंदी भाषा के नैतिक विवेक के प्रहरी हैं.
वैचारिक उलझन
हमने ही यह कई बार कहा है कि इस समय संसार विचार-शून्य हो गया लगता है: कोई बड़ा विचार नहीं है जो विश्वव्यापी हो. जो चीज़ें विश्वव्यापी हो गई लगती हैं वे कौशल, हुनर, टेक्नोलॉजी से संबंधित हैं और सीधे उनका विचार से संबंध नहीं है. इससे उलट, इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि बड़ी संख्या में कई बुद्धिजीवी और विशेषज्ञ, शिक्षक और शोधकर्ता, विद्वान, लेखक, पत्रकार, ज़मीनी कार्यकर्ता अपने-अपने ढंग से वैचारिक उद्यम में लगे हैं. इसलिए शायद अभाव विचारों का नहीं, उनकी व्याप्ति का है.
बहुत सारे विचार एक तरह जटिल और विशेषीकृत शब्दावली में ही होते और व्यक्त होते हैं, उन्हें उस शब्दावली को जानने वाले ही समझ सकते हैं. अक्सर उनका साधारणीकरण नहीं हो पाता जिसे उस क्षेत्र के बारह के लोग समझ सकें. विशेषीकरण का औचित्य तो यह है कि उसी के कारण कई तरह की जटिलताओं का विश्लेषण और सुलझाव हो पाते हैं. लेकिन ठीक उसी कारण, यानी विशेषीकरण के कारण संप्रेषण छिक जाता है. इसकी कुछ भरपाई इन दिनों टेक्नोलॉजी द्वारा संभव और सुलभ की गई तेज़ और व्यापक संप्रेषण की सुविधाओं से हो सकना चाहिए. पर ऐसा व्यापक रूप से हुआ नहीं दीख पड़ता. खगभाषा खगों तक की सिमट जाती है.
हमारे समय की एक विडंबना यह भी है कि हमें बहुत कुछ ब्योरों में जाकर-समझकर करना पड़ता है पर अपने क्षेत्र से बाहर के ब्योरों को जानने या उन्हें बरतने के लिए ज़रूरी धीरज हममें नहीं होता. विचार का क्षेत्र विश्लेषण और ब्यौरों का होता है और बिना उनसे गुज़रे किसी सार्थक निष्कर्ष पर नहीं पहुंचा जा सकता. पर हमारी आदत इधर तेज़ी से हर चीज़ को, विचार को भी, सार-संक्षेप से समझने की हो गई है.
अक्सर विचार की ऊष्मा और सत्व, उसका बौद्धिक उद्वेलन, सार-संक्षेप में नहीं आ पाते. सार-संक्षेप की यह कुटैव कमी इस हद तक पहुंच सकती है कि हम साहित्य का रसास्वादन करने से अपने को बचाकर कविता-कहानी-उपन्यास-निबंध आदि को पूरा पढ़ने के बजाय उसके सारसंक्षेप से ही संतुष्ट होने लगे.
यह भी याद रखना चाहिए इसके साथ-साथ हम राजनेताओं, धर्मनेताओं, समाचार-एंकर आदि के भाषण, अभिव्यक्तियां बहुत विस्तार से मगन मन देर तक सुनते-गुनते रहते हैं जबकि उनमें सार्थक बहुत कम होता है और हम वहां सार-संक्षेप का अपना आग्रह स्थगित कर देते हैं.
इस समय जितनी नई पुस्तकें प्रकाशित हो रही हैं, जितने व्याख्यान, सेमिनार, संवाद, पॉडकास्ट, ब्राॅडकास्ट, टेलीविज़न कार्यक्रम, समारोह आदि संसार भर में हो रहे हैं, उनमें विषयों की इतनी विविधता है कि यह कहा ही नहीं जा सकता कि हम एक विचार-शिथिल या विचार-शून्य परिवेश में रह रहे हैं. अलबत्ता, इनमें से अधिकांश विचार अपनी टेक्नोलॉजी में ही उलझ कर रह जाते हैं और हम तक नहीं पहुंचते.
दूसरी ओर, हमारी विचारों में रुचि घट रही है. हम सूचनाओं से इस क़दर आक्रांत होते रहते हैं कि हमारे पास विचार के लिए फुरसत और समय नहीं बच पा रहे.
अपव्यय का भूगोल
सरकार में, सरकारी संस्थाओं और सरकार द्वारा पोषित संस्थानों, शैक्षणिक संस्थाओं, नगर-पालिकाओं आदि में अपव्यय दशकों से होता आया है. यह अपव्यय कुछ तो भ्रष्टाचार के कारण होता है और कुछ ऐसी प्रथाओं के कारण जो बेहद उबाऊ और अनावश्यक हैं. यह अपव्यय सिर्फ़ धन का नहीं, समय और ऊर्जा का भी होता है. यह सारा अपव्यय अधिकृत होता है और इसलिए उसे ऑडिट आदि भी अपव्यय नहीं मानते.
चूंकि इस समय जो निज़ाम है वह बेहद दिखाऊ है, इस दिखाऊपन को संभव करने के लिए विज्ञापनों से लेकर कई और एसेी चीज़ों पर अपव्यय होता रहता है, बेरोकटोक.
नए निज़ाम ने लगभग सारी संस्कृति को बड़े चमकते-दमकते तमाशों में बदल दिया है और वे अब अक्सर और ज़्यादातर धर्मविशेष के त्यौहारों के अवसर पर होते हैं उनमें कला और कलाकारों पर कम व्यवस्था पर, शामियानों आदि पर बहुत अधिक ख़र्च किया जाता है. किसी को इस पर शोध कर पता करना चाहिए कि पिछले एक दशक में शामियाने-मंच-कुर्सियां-प्रकाश-ध्वनि आदि के ठेकेदार कितने बढ़े हैं और उन पर सरकार की, संस्थाओं की कितनी राशि ख़र्च होती है.
पिछले दिनों किसी ने बताया कि खुजराहो नृत्य समारोह का बजट इन दिनों कई करोड़ों में है और उसका अधिकांश इसी सब पर ख़र्च होता है. यह अपव्यय हर स्तर पर हो रहा है. शिक्षा संस्थाओं के आयोजनों में, सेमिनारों, वार्षिक समारोहों आदि सभी में. पोस्टरों पर, हिंदी सप्ताह पर, स्टैंडीज़ पर, मालाओं पर, दीपप्रज्वलन पर बेवज़ह खर्च होता है; स्मृतिचिह्नों पर.
इन सबमें शब्दों का भी बहुत अपव्यय होता रहता है. हर स्तर पर क़ायदे का कम होता है, दिखाऊपन बहुत अधिक.
अपने लंबे प्रशासनिक अनुभव से जानता हूं कि अगर इस अपव्यय का आधा भी कम हो जाए तो इससे अधिक आयोजन किए जा सकते हैं, प्रतिभागियों को बेहतर मानदेय दिए जा सकते हैं और साफ़-सुथरापन बढ़ सकता है और कुछ समय बचाकर विचार-विमर्श के लिए मिल सकता है.
(लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं.)
