शिक्षक दिवस विशेष: पात्रता को लेकर अदालत के फैसले ने शिक्षकों को किया चिंतित

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के मुताबिक आठवीं तक की कक्षा में पढ़ाने वाले शिक्षकों को शिक्षक पात्रता की परीक्षा पास करनी होगी. अगर वे ये परीक्षा नहीं देते तो उन्हें अवकाश ग्रहण करना होगा. अगर वे फेल हो गए तो शायद उनकी नौकरी ही चली जाए. यह फैसला शिक्षकों को डरा रहा है.

(प्रतीकात्मक फोटो साभार: X/@SEILOrgIn)

सुप्रीम कोर्ट का बीते दिनों आया फैसला शिक्षकों को डरा रहा है. इस फैसले के मुताबिक आठवीं तक की कक्षा में पढ़ाने वाले शिक्षकों को टीईटी- यानी शिक्षक पात्रता परीक्षा पास करनी होगी. अगर वे ये परीक्षा नहीं देते तो उन्हें अवकाश ग्रहण करना होगा. अगर वे फेल हो गए तो शायद उनकी नौकरी ही चली जाए.

इससे बस 57 साल की दहलीज पर खड़े शिक्षकों को मामूली सी छूट दी गई है. 57 पार के शिक्षक चाहें तो ये परीक्षा दिए बिना नौकरी जारी रख सकते हैं. लेकिन तब उन्हें किसी प्रमोशन से वंचित रहना होगा.

तो बरसों से बच्चों को पढ़ा रहे और उनकी परीक्षा ले रहे शिक्षकों को अब ख़ुद पढ़ना और इम्तिहान देना होगा.

सतह पर लग सकता है कि यह फैसला सही है. आख़िर जो शिक्षक टीईटी पास न कर सके, वह किस काम का? लेकिन बात इतनी सीधी नहीं है.

‘टीईटी की डिग्री के बिना कोई शिक्षक नहीं बन सकेगा’

दरअसल 2011 में राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद ने तय किया था कि टीईटी की डिग्री के बिना कोई शिक्षक नहीं बन सकेगा. इसके ख़िलाफ़ कुछ राज्यों के शिक्षकों ने अदालत की शरण ली. वहीं से अब फैसला आया है- टीईटी दो, वरना नौकरी छोड़ो.

अब सवाल कई हैं. शिक्षकों की बाक़ी डिग्रियों का क्या होगा जो अब तक शिक्षा के लिए अनिवार्य मानी जाती रहीं? इस देश में ज़्यादातर लोग मानते हैं कि शिक्षक बनने के लिए बीएड जरूरी होता है.

इसके अलावा जेबीटी, बीटीसी, बीएड, डीएलएड या अन्य कई प्रशिक्षण वाले कोर्स होते हैं. जो शिक्षक इन अनुशासनों की डिग्रियां लेकर आए हैं, वे अब पा रहे हैं कि उन्होंने बेकार इसमें समय गंवाया.

असल में सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने सरकार को यह मौक़ा ज़रूर दिया है कि वह प्राथमिक और माध्यमिक स्तरों पर शिक्षा की स्थिति और शिक्षकों के कामकाज पर नए सिरे से विचार करे.

हमारे देश में स्कूली शिक्षा बिल्कुल दो खानों में बंटी हुई है- एक तरफ़ सरकारी स्कूल हैं जो साधनों का रोना रोते रहते हैं और जिनमें इस देश के गरीब बच्चे पढ़ते हैं. दूसरी तरफ़ वे अंग्रेज़ी स्कूल हैं जहां अमीर भारत पढ़ता है और जहां शिक्षकों के लिए डिग्रियों आदि को बहुत अहमियत नहीं दी जाती. अब सरकारी स्कूलों का मामला रह जाता है.

हालत ये है कि कुछ बड़े शहरों के बड़े स्कूलों को छोड़ दें तो इस देश में हज़ारों सरकारी स्कूल हैं जहां बस एक या दो शिक्षक सारी कक्षाएं पढ़ाने में जुटे रहते हैं. दूरदराज़ के स्कूलों में वे तमाम बाधाएं पार करके जाते हैं क्योंकि शिक्षक होना उनके लिए नौकरी नहीं, एक ज़्यादा गुरुतर दायित्व है. उन्हें मालूम है कि जिन स्कूलों में वे पढ़ाते हैं, वहां वे नहीं गए तो ये बच्चे कहीं के नहीं रह जाएंगे.

शिक्षकों से कागज़ी कामकाज़, बच्चों की पढ़ाई प्रभावित

अभी हाल ही में राजस्थान के झालावाड़ में भारी बारिश से एक स्कूल गिरा और कुछ बच्चों की मौत हो गई. ऐसे कई स्कूल हैं जहां शिक्षक और बच्चे एक सी अनिश्चितता से पढ़ते हैं. मगर शिक्षा में सुधार के नाम पर शिक्षकों से कागज़ी कामकाज़ इतने कराए जा रहे हैं कि इससे बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हो रही है.

फिर स्कूल के बाहर के जितने सारे काम हैं, वे भी शिक्षकों को निबटाने हैं. उन्हें जनगणना करनी है, उन्हें वोटर लिस्ट तैयार करना है. अभी बिहार में गहन मतदाता निरीक्षण को लेकर जो कवायद चल रही है, वह किसके भरोसे चल रही है? उसमें बड़ा हिस्सा शिक्षकों का है. यही स्थिति दूसरे राज्यों में भी है. तो आप शिक्षक को पढ़ाने का काम छुड़ा कर उससे बाक़ी सब काम ले रहे हैं और अब चाहते हैं कि वह इम्तिहान भी दे.

एक सवाल यह भी उपजता है कि क्या देश भर के शिक्षक अब तक बिना शिक्षक पात्रता के शिक्षण कार्य कर रहे थे जो अब उन्हें दस, पंद्रह, बीस साल की नौकरी कर लेने के बाद यह अग्नि परीक्षा देने की जरूरत पड़ रही है? क्या उनका वह लम्बा अनुभव कोई मायने नहीं रखता जो उन्होंने अब तक पढ़ाकर पाया है?

सच है कि दिन-ब-दिन बढ़ते छात्रों और घटते शिक्षकों के कारण शिक्षा गुणवत्ता में गिरावट आई है. लेकिन क्या उसके लिए सिर्फ और सिर्फ शिक्षक ही जिम्मेदार है जो उसे तमाम कसौटियों से गुज़रना पड़ रहा. क्या इसमें उन कार्यों की कोई भूमिका नहीं है जो उस पर आए दिन विभागीय कार्यों से इतर जबरन थोपे जा रहे हैं. जिससे शिक्षण कार्य में लगने वाला उसका समय और ऊर्जा दूसरे काम ले लेते हैं, जो न सिर्फ शिक्षा गुणवत्ता को ही बल्कि शिक्षक की पात्रता को भी प्रभावित करते है.

क्या शासन को इस पर विचार नहीं करना चाहिए? क्या भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में लोकतंत्र के उत्सव को पूरे साहस और उत्साह से मनाने वाला शिक्षक सचमुच अपनी जिम्मेदारी उठाने में कहीं पीछे है? अदालत का यह फैसला सोचने पर विवश करता है कि शिक्षा की गिरावट में असली जिम्मेदार कौन है, शिक्षक या व्यवस्था?

बेहतर होता कि यह NCTE की अधिसूचना जारी होने के बाद होने वाली नियुक्ति पर ही लागू होता, इससे पूर्व नियुक्त शिक्षकों को इससे मुक्त रखा जाता. उनके लिए सरकार कोई ऐसा नियम लागू करती कि वे परीक्षा की बजाय अपनी कार्य पद्धति को बदलकर शिक्षा को बेहतर बनाने या कि गुणवत्ता लाने की तैयारी करते, न कि परीक्षा की.

आज शिक्षक के सामने एक चुनौती सामने है, परीक्षा को पास कर लेने की. उम्र के अवसान पर यह काम असंभव नहीं तो कुछ कठिन जरूर हो जाता है.

क्या किसी नौकरी की तैयारी करने वाला कोई अभ्यर्थी नौकरी पाने के दस, बीस, तीस बरस बाद उस परीक्षा को उतने ही सफलतापूर्ण ढंग से पास कर पाता है जितना कि नौकरी पाने के लिए? अदालत के इस फैसले ने कुछ शिक्षकों को झटका दे दिया है. इनमें अधिकतर पचास से पचपन वर्ष की आयु वाले वे शिक्षक हैं जो तमाम शारीरिक व्याधियों के बाद भी अपने काम को पूरी लगन और निष्ठा के साथ करने के लिए संघर्षरत हैं.

वे विभागीय कार्यों से इतर दूसरी जिम्मेदारियों को भी बख़ूबी निभा रहे हैं. इस उम्र में किसी सेवाकर्मी के पास कुछ हो न हो, किए गए कार्य का अनुभव तो होता ही है. क्या उसके आधार पर उसे प्रोन्नति नहीं दी जा सकती? क्या सेवानिवृत्ति की दहलीज़ पर खड़े किसी शिक्षक को परीक्षा के लिए बाध्य करना या उससे प्रोन्नति का अधिकार छीनना उसके किए गए कार्य का अपमान नहीं है?

ऐसे उम्रदराज शिक्षक अगर अपनी बीमारी, उम्र के असर या किसी विशेष परिस्थिति के कारण परीक्षा पास नहीं कर पाए और नौकरी से हाथ धो बैठे तो क्या इस उम्र में वे कहीं और रोज़गार पाने की स्थिति में रह जाएँगे? क्या अब प्राइवेट स्कूल उन्हें नौकरी देंगे? क्या होगा उनके जीवनयापन का जरिया इसका फैसला कौन‌ करेगा?

शिक्षक की पात्रता पर संदेह

यदि सचमुच हमारी व्यवस्था को शिक्षक की पात्रता पर संदेह है तो शैक्षिक कार्यों से अलग जनगणना, बालगणना या निर्वाचन जैसे दूसरे कार्य आखिर संविदा कर्मियों से क्यों नहीं करवा लिए जाते? यह शिक्षक की गुणवत्ता पर भरोसा नहीं तो क्या है, कि न उसे आपदा में भुलाया जाता है, न अवसर में और वह अपनी क्रांति और भ्रांति के साथ हर स्थिति में तत्पर मिलता है.

इसके लिए संक्रमण काल की ताज़ा मिसाल हमारे सामने है, जब बीमार समय में मरीजों के इलाज से मृतकों के हिसाब तक का ब्यौरा शिक्षक देता रहा है.

अदालत को उन उम्रदराज सेवाकर्मियों पर पुनर्विचार करना चाहिए जो न अब नई नौकरी पाने की स्थिति में हैं और न पुरानी छोड़ने की.

(ममता जयंत शिक्षिका हैं.)