नेपाल में राजनीतिक संकट: युवाओं का गुस्सा, भ्रष्टाचार और चरमराता लोकतंत्र

द वायर से बातचीत में काठमांडू में भारत के पूर्व राजदूत रंजीत राय ने नेपाल के मौजूदा राजनीतिक संकटों पर अपने विचार रखे. उन्होंने देश में बढ़ते असंतोष की जड़ों, लोकतंत्र पर मंडराते खतरों और इस संकट को लेकर क्षेत्रीय ताक़तों के नजरिए पर विस्तार से चर्चा की.

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काठमांडू, नेपाल में भ्रष्टाचार और सरकार द्वारा सोशल मीडिया साइटों पर प्रतिबंध लगाने के फ़ैसले के खिलाफ हुए प्रदर्शन के दौरान राष्ट्रीय ध्वज लहराते युवा प्रदर्शनकारी. (फोटो: पीटीआई.)

नई दिल्ली: नेपाल दशकों के सबसे गंभीर राजनीतिक संकट का सामना कर रहा है. सोशल मीडिया बैन के खिलाफ युवाओं के नेतृत्व में शुरू हुआ आंदोलन पूरे देश में भ्रष्टाचार और मौजूदा राजनीतिक नेतृत्व के खिलाफ बगावत में बदल गया है. सुरक्षा बलों के साथ हुई झड़पों में अब तक कम से कम 19 लोगों की मौत हो चुकी है. प्रदर्शनकारियों ने वरिष्ठ नेताओं के घरों को निशाना बनाया और देश की संसद पर भी धावा बोला. हालात बिगड़ने के बीच प्रधानमंत्री के.पी. शर्मा ओली ने इस्तीफ़ा दे दिया.

नेपाल के भविष्य पर छाए अनिश्चित हालात के बीच भारत के पूर्व राजदूत रंजीत राय ने द वायर से बातचीत में इस संकट की जड़ों, लोकतंत्र के सामने खड़े ख़तरों और क्षेत्रीय ताक़तों की भूमिका पर विस्तार से बात की.

इस समय इन विरोध प्रदर्शनों के अचानक भड़कने के पीछे क्या वजहें हैं?

नेपाल में लंबे समय से बड़े नेताओं पर भ्रष्टाचार के आरोप लगते रहे हैं लेकिन उनके ऊपर कार्रवाई बहुत कम हुई है. 

जब प्रचंड के नेतृत्व वाली पिछली सरकार ने कुछ घोटालों की जांच शुरू की, जिनमें नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी (यूएमएल) और नेपाली कांग्रेस के शीर्ष नेता शामिल थे, तो इन दोनों पार्टियों को खतरा महसूस हुआ. इसके बाद दोनों दल, जो हमेशा विरोधी रहे हैं, सत्ता साझा करने के लिए एकजुट हो गए. जनता को लगा कि यह गठजोड़ भ्रष्टाचार से खुद को बचाने के लिए हुआ है.

दूसरी बड़ी वजह नेताओं के बच्चों की ऐशोआराम भरी ज़िंदगी है. नेताओं के बच्चे अपनी संपत्ति और आरामदायक जीवन का दिखावा करते थे, जिससे युवाओं के बीच यह सवाल उठने लगा कि जब वे खुद खाड़ी देशों में कम वेतन वाली नौकरियां कर रहे हैं, ऐसे में नेताओं के बच्चे महंगी गाड़ियों में कैसे घूम रहे हैं.

तीसरी वजह यह रही कि जब यूएमएल और कांग्रेस ने हाथ मिलाया, तब राष्ट्रीय स्वतन्त्र पार्टी के करिश्माई नेता रवि लामिछाने को जेल भेजकर किनारे कर दिया गया. उनके हटने के बाद संसद में कोई असली विपक्ष बचा ही नहीं. प्रचंड तकनीकी रूप से विपक्ष में थे, लेकिन अतीत में वे दोनों दलों से मिलकर काम कर चुके थे. ऐसे में लगा कि ओली और देउबा बारी-बारी से सत्ता चलाते रहेंगे और कुछ नहीं बदलेगा.

आखिरी चिंगारी सोशल मीडिया बैन ने दी. सरकार ने सोशल मीडिया कंपनियों को स्थानीय कानून मानने के लिए मजबूर करने की बजाय सीधे प्रतिबंध लगा दिया. यह फैसला बेहद कठोर साबित हुआ और सरकार द्वारा इसके असर का अंदाज़ा ही नहीं लगाया गया. उसके बाद प्रदर्शनकारियों पर गोलीबारी के बाद हालात पूरी तरह बिगड़ गए, जिसके चलते पीएम ओली को इस्तीफा देना पड़ा. 

सोशल मीडिया बैन का असर कितना बड़ा था?

नेपाल की एक-तिहाई आबादी विदेशों में रहती है और फेसबुक एवं मैसेन्जर जैसे प्लेटफॉर्म के ज़रिए ही अपने परिवार से जुड़ी रहती है. इसके अलावा, बहुत से लोग सोशल मीडिया से ही अपनी आजीविका चलाते हैं. ऐसे में अचानक लगाए गए बैन ने लोगों की रोज़मर्रा की ज़िंदगी को अस्त-व्यस्त कर दिया. हालांकि यह कदम विरोध प्रदर्शनों का तात्कालिक कारण बना, लेकिन असली गुस्सा लंबे समय से नेताओं और व्यवस्था के खिलाफ था.

क्या यह नाराज़गी पहले भी दिखी है?

हां. यूएमएल और कांग्रेस के एकजुट होने से पहले ही चुनावों में यह नाराज़गी साफ दिखाई दे रही थी. पिछले पांच-छः वर्षों में जनता का समर्थन छोटे दलों और स्वतंत्र उम्मीदवारों के लिए बढ़ा है. उदाहरण के लिए, रवि लामिछाने की पार्टी ने अचानक 21 सीटें जीत लीं, जबकि स्वतंत्र उम्मीदवार बालेन शाह काठमांडू जैसे प्रतिष्ठित पद के लिए मेयर बन गए. यह सब इस बात का संकेत था कि लोग स्थापित दलों और नेताओं से निराश हो चुके हैं.

बड़े दलों ने इन संकेतों को क्यों नज़रअंदाज़ किया?

दरअसल, बड़े नेताओं में अहंकार और सत्ता का लालच हावी रहा. वे बारी-बारी से कुर्सी साझा करते रहे, भ्रष्टाचार के मामलों को दबाते रहे और अपार संपत्ति अर्जित करते रहे. जनता को लगने लगा कि ये सब आपस में मिले हुए हैं और किसी पर कोई जवाबदेही नहीं है.

अब सबसे बड़ा ख़तरा क्या है?

सबसे बड़ा खतरा यह है कि कहीं लोग नेताओं से ही नहीं बल्कि पूरे सिस्टम से मोहभंग न महसूस करने लगें. जनता ने संविधान और लोकतंत्र के ज़रिये शांति और समृद्धि की उम्मीद की थी, लेकिन वह पूरी नहीं हुई. अब डर यह है कि लोग इसे व्यवस्था की नाकामी मानने लग सकते हैं. नेपाल का बहुदलीय लोकतांत्रिक गणराज्य लंबे संघर्षों के बाद हासिल हुआ था, लेकिन बढ़ती निराशा यह सवाल खड़ा कर रही है कि समस्या सिर्फ नेतृत्व में है या पूरी व्यवस्था में? यह अनिश्चितता ख़तरनाक है.

क्या नई राजनीतिक ताकतें उभर सकती हैं?

हां. बालेन शाह जैसे स्वतंत्र चेहरे और राष्ट्रीय स्वतन्त्र पार्टी जैसे नए दल जनता को विकल्प के तौर पर आकर्षित कर रहे हैं. यह पार्टी तकनीक और पेशेवरों को भी साथ ला रही है. लेकिन लोकतंत्र में उन्हें अपनी ताकत चुनावों के ज़रिये ही साबित करनी होगी.

राजतंत्र का क्या असर है?

राजतंत्र पृष्ठभूमि में एक फैक्टर बना हुआ है. राजतंत्र के समर्थन में हुए पिछले प्रदर्शनों में भी युवाओं का एक हिस्सा शामिल था. हालांकि इसे राजशाही की लोकप्रियता नहीं, बल्कि मौजूदा नेताओं के खिलाफ गुस्से के रूप में देखा जाना चाहिए.

क्या नेपाली सेना की भूमिका अहम हो सकती है?

सेना के पास हालात को स्थिर करने की बड़ी भूमिका है.

इसमें भारत कहां पर खड़ा है?

भारत ने अब तक बहुत सावधानी से बयान दिया है. उसने हिंसा में हुई मौतों पर दुख जताया है और संवाद की अपील की है. भारत ने हमेशा नेपाली जनता की आकांक्षाओं का समर्थन किया है और आगे भी यही नीति जारी रहने की उम्मीद है.

और चीन का क्या रुख है?

चीन की ओर से मैं कुछ नहीं कह सकता, लेकिन ऐतिहासिक रूप से भारत और चीन दोनों ही नेपाल में स्थिरता चाहते हैं. अस्थिरता से बाहरी ताकतों को मौके मिलते हैं. चीन लंबे समय से नेपाल की लेफ्ट पार्टियों को एकजुट करने की कोशिश करता रहा है, लेकिन नाकाम रहा है. अब जब नेपाली कांग्रेस और लेफ्ट दोनों के नेता जनता की नज़र में बदनाम हो चुके हैं, तो पुराना ढांचा टूटता हुआ नज़र आ रहा है. इससे नए और कम विचारधारात्मक दलों के लिए जगह खुल रही है.