नई दिल्ली: भारत के संगठित विनिर्माण क्षेत्र (ऑर्गनाइज़्ड मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर) में अब कुल कर्मचारियों में से 42% ठेका मज़दूर हैं. यह 1997-98 के बाद का सबसे ऊंचा स्तर है. पिछले दस साल में इसमें लगभग आठ प्रतिशत अंकों की बढ़ोतरी हुई है, जो कार्यबल के लगातार बढ़ते ठेकाकरण की ओर इशारा करता है.
ये जानकारी 2023-24 के एनुअल सर्वे ऑफ इंडस्ट्रीज़ (एएसआई) में सामने आई है.
मालूम हो कि ठेका श्रमिकों की हिस्सेदारी आखिरी बार 2013-14 में घटी थी, लेकिन तब से हर साल बढ़ रही है. 1999-2000 में, संगठित विनिर्माण क्षेत्र में कुल रोजगार में ठेका श्रमिकों की हिस्सेदारी लगभग 20% थी.
अर्थशास्त्री इस वृद्धि का श्रेय आंशिक रूप से भारत के पारंपरिक श्रम नियमों, जैसे औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 को देते हैं, जो 100 से अधिक कर्मचारियों को नियुक्त करने वाली कंपनियों पर अतिरिक्त अनुपालन आवश्यकताएं और लागतें लगाते हैं.
इनमें छंटनी और बंद होने के लिए सरकार की पूर्व स्वीकृति शामिल है. कंपनियों ने अनुबंध पर अधिक कर्मचारियों को नियुक्त करके इस समस्या का समाधान किया है, जिससे कार्यबल के स्तर और वेतन लागत के प्रबंधन में लचीलापन मिलता है.
हालांकि, ठेका श्रमिकों को आमतौर पर कम वेतन मिलता है और भविष्य निधि व बीमा जैसे लाभों तक उनकी पहुंच सीमित होती है. इस प्रवृत्ति का आय सुरक्षा और घरेलू खपत पर प्रभाव पड़ता है.
उल्लेखनीय है कि सरकार ने औपचारिक रोज़गार सृजन को प्रोत्साहित करने के लिए कदम उठाए हैं, जिनमें हाल ही में स्वीकृत रोज़गार-संबंधी प्रोत्साहन (ईएलआई) योजना भी शामिल है.
इस योजना के तहत पहली बार नौकरी करने वाले कर्मचारी 15,000 रुपये तक के एक महीने के वेतन के पात्र हैं, और नियोक्ता दो साल के लिए प्रोत्साहन का दावा कर सकते हैं, जिसे दो साल के लिए और बढ़ाने का विकल्प भी है.
इस संबंध में वैश्विक तुलनाएं अनुबंध कार्य की व्यापकता में व्यापक भिन्नता दर्शाती हैं. 2023 के एक अध्ययन के अनुसार, अमेरिका में अनुबंध श्रम का प्रतिशत 10.8% है, जबकि ब्राज़ील और अर्जेंटीना जैसे लैटिन अमेरिकी देशों में यह अलग-अलग समय पर 10% से 20% के बीच रहा है.
श्रम बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि अनुबंध कार्य में वृद्धि रोजगार सृजन, श्रमिक सुरक्षा और उत्पादकता वृद्धि को एक साथ लाने की आवश्यकता को उजागर करती है.
27 अगस्त को जारी एएसआई के आंकड़े विनिर्माण क्षेत्र में औपचारिक रोजगार की एक झलक प्रस्तुत करते हैं और कार्य की प्रकृति में निरंतर संरचनात्मक परिवर्तनों का संकेत देते हैं.
