श्रीनगर: किश्तवाड़ के एक सामाजिक कार्यकर्ता के संवैधानिक अधिकारों को ‘कुचलने’ के लिए प्रशासन को फटकारते हुए, जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट ने बुधवार (10 सितंबर) को जन सुरक्षा अधिनियम (पीएसए) के तहत उनकी 10 महीने से ज़्यादा लंबी ‘अवैध’ हिरासत को रद्द कर दिया और उनकी रिहाई का आदेश दिया.
अदालत के आदेश ने एक बार फिर असाधारण प्रशासनिक शक्तियों के दुरुपयोग को सुर्खियों में ला दिया है, जिसके तहत जम्मू-कश्मीर में आतंकवादियों, अलगाववादियों, वकीलों, कार्यकर्ताओं, पत्रकारों और राजनीतिक नेताओं के कथित कार्यकर्ताओं और समर्थकों को ‘राष्ट्र-विरोधी’ तत्व और राज्य के लिए ‘खतरा’ बताकर बिना किसी मुकदमे के हिरासत में लिया गया है.
कार्यकर्ताओं और विपक्षी राजनीतिक दलों ने इन तरीकों को ‘मनमाना’ और ‘अवैध’ कहा है, और इन्हें 5 अगस्त, 2019 को जम्मू-कश्मीर को दो केंद्र शासित प्रदेशों में विभाजित करने के बाद भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार द्वारा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर व्यापक कार्रवाई का हिस्सा बताया है.
हाईकोर्ट की जम्मू पीठ के न्यायाधीश एमए चौधरी ने बुधवार को दिए अपने आदेश में प्रशासन पर ‘बिना सोचे-समझे’ पुलिस के ‘पुराने’ मामलों और पीएसए फाइलों की ‘ज़ेरॉक्स प्रतियों’ का इस्तेमाल करके विवादास्पद कानून (2024 की संख्या 6/डीएम/के/पीएसए) के तहत 7 नवंबर, 2024 को किश्तवाड़ की दूल तहसील के नट्टास निवासी मोहम्मद जाफर शेख को हिरासत में लेने के लिए कड़ी फटकार लगाई.
शेख की गिरफ़्तारी
शेख को चार अन्य कार्यकर्ताओं के साथ पिछले वर्ष चेनाब घाटी में किश्तवाड़ जिले की दच्छन तहसील में 1000 मेगावाट की पाकल दुल जलविद्युत परियोजना के निर्माण में शामिल एक निजी कंपनी के खिलाफ हुए विरोध प्रदर्शन के बाद हिरासत में लिया गया था.
8 नवंबर, 2024 को परियोजना स्थल पर ड्यूटी के दौरान एक टैंकर की चपेट में आने से रोलर ऑपरेटर का काम करने वाले गुलाम हुसैन डार की मौत हो गई थी. इस घटना के बाद किश्तवाड़ जिले भर में निजी कंपनी के खिलाफ बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए थे, जिस पर अपने कर्मचारियों की सुरक्षा से समझौता करने का आरोप लगाया गया था.
उस समय जिला प्रशासन पर आरोप लगे थे कि उसने परियोजना स्थल पर हुई खामियों की जांच करने के बजाय जवाबदेही की मांग कर रहे स्थानीय लोगों पर झूठे आरोप लगाकर कार्रवाई की थी.
खबरों के अनुसार, तत्कालीन डिप्टी कमिश्नर राजेश कुमार शवन ने ‘22 लोगों’ को चेतावनी दी थी कि वे ‘राष्ट्रीय हितों को नुकसान पहुंचाने की गहरी साजिश और सांठगांठ’ के तहत किश्तवाड़ में बिजली परियोजनाओं पर काम रोकने का प्रयास करने के लिए ‘रडार पर’ हैं.
तीन पुलिस एफआईआर और चार दैनिक डायरी रिपोर्टों का हवाला देते हुए पीएसए डोजियर में शेख को उग्रवादियों का एक ‘ओवरग्राउंड वर्कर’ बताया गया है जो ‘राष्ट्र-विरोधी’ गतिविधियों में शामिल था. बिना किसी सबूत का हवाला दिए पीएसए डोजियर में आरोप लगाया गया है कि शेख पाकल दुल बिजली परियोजना पर हमले की योजना बना रहा था.
डोजियर में यह भी आरोप लगाया गया है कि शेख, जिसने डार की दुखद मौत के बाद उसके परिवार के लिए न्याय की मांग करते हुए विरोध प्रदर्शन में भाग लिया था, वह ‘युवाओं को जिहाद के नाम पर भड़का रहा था’ जो जम्मू-कश्मीर की ‘सुरक्षा के लिए बेहद हानिकारक’ था.
अदालत की टिप्पणियां
हालांकि, रिकॉर्ड देखने और शेख के वकील एवं वरिष्ठ अधिवक्ता शेख शकील अहमद की सुनवाई के बाद अदालत ने प्रशासन की आलोचना की कि उसने कार्यकर्ता को विवादास्पद कानून के तहत हिरासत में लेने के लिए उनके खिलाफ 1997, 2015 और 2019 में दर्ज ‘पुराने मामलों’ का हवाला दिया है, जिसे एमनेस्टी इंटरनेशनल ने ‘कानूनविहीन कानून’ करार दिया है.
अदालत ने पाया कि शेख को 1997 के मामले में 24 अप्रैल, 2004 को बरी कर दिया गया था, जबकि अन्य दो मामलों में उसे ज़मानत दे दी गई थी. सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का हवाला देते हुए अदालत ने कहा कि जिन मामलों का डोजियर में उल्लेखित कथित अपराधों से ‘कोई निकट और जीवंत संबंध’ नहीं है, उन्हें निवारक निरोध के आधार के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता.
एक महत्वपूर्ण टिप्पणी में अदालत ने विवादास्पद कानून के तहत शेख की हिरासत को उचित ठहराने के लिए किश्तवाड़ जिले के कुछ पुलिस थानों में शेख के खिलाफ दर्ज दैनिक डायरी रिपोर्ट (डीडीआर) का उपयोग करने के लिए राज्य को आड़े हाथों लिया.
जम्मू-कश्मीर में पीएसए के तहत संदिग्धों को हिरासत में लेने के औचित्य के तौर पर पुलिस डोजियर में अक्सर डीडीआर का हवाला दिया जाता रहा है. हालांकि, हाईकोर्ट ने इसे एक गैरकानूनी उपाय माना है.
अदालत ने कहा, ‘केवल डीडीआर दर्ज करना, जिसमें कोई विशिष्ट कृत्य न होने का आरोप लगाया गया हो, किसी व्यक्ति को हिरासत में लेने का आधार नहीं हो सकता. यह आश्चर्यजनक है कि यदि डीडीआर प्रविष्टियों में उल्लिखित कृत्य आपराधिक कृत्य हैं और संज्ञेय प्रकृति के हैं, तो राज्य ने कोई एफआईआर क्यों नहीं दर्ज की है.’
इसमें कहा गया है: ‘यदि डीडीआर में उल्लेखित कृत्य किसी भी प्रकार से आपराधिक अपराध की श्रेणी में आते हैं, तो राज्य को एफआईआर दर्ज करने से किसने रोका, यह रहस्य में छिपा है.’
जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट का यह आदेश प्रशासन द्वारा आम आदमी पार्टी के जम्मू-कश्मीर प्रमुख और डोडा पूर्व के विधायक मेहराज-उद-दीन मलिक पर पीएसए के तहत मामला दर्ज करने के लिए कथित तौर पर 16 डीडीआर लागू करने के कुछ दिनों बाद आया है.
मलिक के खिलाफ पीएसए डोजियर, जिसे उनकी कानूनी टीम हाईकोर्ट में चुनौती देने की तैयारी कर रही है, में कथित तौर पर 18 एफआईआर का भी जिक्र है. आप नेता को अभी तक इनमें से किसी में भी दोषी नहीं ठहराया गया है.
शेख के वकील अहमद ने संविधान के अनुच्छेद 22 (5) का उल्लंघन करने के लिए उनके पीएसए निरोध आदेश को भी चुनौती दी थी, जिसके तहत निवारक कानूनों के तहत हिरासत में लिए गए व्यक्ति को आधार के बारे में सूचित किया जाना चाहिए और आदेश के खिलाफ प्रतिनिधित्व करने का अवसर दिया जाना चाहिए.
अहमद ने जम्मू-कश्मीर जन सुरक्षा अधिनियम, 1978 की धारा 13 (1) का उल्लंघन करने के लिए हिरासत आदेश को भी चुनौती दी थी, जिसके तहत हिरासत में लेने वाले प्राधिकारी को हिरासत की तारीख से दस दिनों के भीतर हिरासत में लिए गए व्यक्ति को उसकी समझ में आने वाली भाषा में हिरासत के आधार के बारे में बताना होता है और उन्हें आदेश के खिलाफ अभ्यावेदन करने का अवसर देना होता है.
दोनों मामलों में अदालत ने फैसला सुनाया कि शेख को हिरासत में लेने की कानूनी प्रक्रिया का प्रशासन द्वारा पालन नहीं किया गया, जिसके कारण वह हिरासत आदेश के खिलाफ ‘प्रभावी और सार्थक प्रतिनिधित्व करने में असमर्थ’ हो गया.
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