नई दिल्ली: नेपाल में इस सप्ताह की शुरुआत में हुए हिंसक विरोध प्रदर्शनों और केपी शर्मा ओली के प्रधानमंत्री पद से इस्तीफ़ा देने के बाद अब नेपाल की पहली महिला मुख्य न्यायाधीश रहीं सुशीला कार्की नेपाल की पहली अंतरिम महिला प्रधानमंत्री बन गई हैं.
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, नेपाल में ज़ेन-ज़ी आंदोलन से पैदा हुए राजनीतिक अस्थिरता के बीच सुशीला कार्की को राष्ट्रपति राम चंद्र पौडेल ने शुक्रवार (12 सितंबर) रात पद और गोपनीयता की शपथ दिलाई. इससे पहले राष्ट्रपति ने प्रतिनिधि सभा को भंग कर दिया था.
बीबीसी के अनुसार, नेपाल में अंतरिम प्रधानमंत्री बनने के कुछ ही घंटे बाद चुनाव की तारीख़ का ऐलान भी कर दिया गया. एक बयान के कहा गया है कि 5 मार्च 2026 को नेपाल में आम चुनाव कराए जाएंगे.
मंत्रिमंडल का विस्तार
अखबार ने बताया है कि कार्की शनिवार को मंत्रिमंडल का विस्तार कर सकती हैं और कुल मान घीसिंग को नया ऊर्जा मंत्री बनाया जा सकता है. नेपाल विद्युत प्राधिकरण के मुख्य कार्यकारी अधिकारी के रूप में इंजीनियर घीसिंग को प्रभावी विद्युत प्रबंधन और वितरण का श्रेय दिया जाता था. हालांकि, पूर्व पीएम ओली ने उन्हें बर्खास्त कर दिया था.
वकील ओम प्रकाश आर्यल के भी मंत्री पद ग्रहण करने की संभावना है. नए मंत्रिमंडल में मुख्यधारा के राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि शामिल नहीं होंगे.
पीएम मोदी ने दी शुभकामनाएं
भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नेपाल की अंतरिम सरकार की प्रधानमंत्री सुशीला कार्की को शुभकामनाएं दी हैं.
पीएम मोदी ने सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म एक्स पर लिखा, ‘मैं सुशीला कार्की को नेपाल की अंतरिम सरकार की प्रधानमंत्री के रूप में पद ग्रहण करने पर शुभकामनाएं देता हूं.’
उन्होंने कहा, ‘भारत नेपाल के लोगों की शांति, तरक्की और समृद्धि के लिए प्रतिबद्ध बना हुआ है.’
I extend my best wishes to Right Hon. Mrs. Sushila Karki on assuming office as the Prime Minister of the Interim Government of Nepal. India remains firmly committed to the peace, progress and prosperity of the people of Nepal.
— Narendra Modi (@narendramodi) September 13, 2025
इससे पहले कार्की के शपथ ग्रहण के कुछ ही घंटों बाद भारत ने अंतरिम सरकार के गठन का स्वागत करते हुए कहा था कि उसे उम्मीद है कि इससे नेपाल में शांति और स्थिरता को बढ़ावा मिलेगा.
भारतीय विदेश मंत्रालय ने एक बयान में कहा, ‘हम नेपाल में माननीय श्रीमती सुशीला कार्की के नेतृत्व में नई अंतरिम सरकार के गठन का स्वागत करते हैं. हमें उम्मीद है कि इससे शांति और स्थिरता को बढ़ावा मिलेगा.’
विदेश मंत्रालय के बयान में कहा गया है, ‘एक करीबी पड़ोसी, एक लोकतांत्रिक देश और दीर्घकालिक विकास साझेदार के रूप में, भारत अपने दोनों देशों और लोगों की भलाई और समृद्धि के लिए नेपाल के साथ मिलकर काम करना जारी रखेगा.’
ज्ञात हो कि इससे पहले 9 सितंबर को काठमांडू में ओली सरकार के पतन के कुछ ही घंटों बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नेपाल की स्थिति पर चर्चा के लिए सुरक्षा मामलों की कैबिनेट समिति की बैठक की अध्यक्षता की थी और कहा था कि वहां हुई हिंसा ‘हृदय विदारक’ है.
उन्होंने इस बात पर भी ‘दुख’ व्यक्त किया था कि विरोध प्रदर्शनों में ‘कई युवाओं’ की जान चली गई. नेपाल की ‘स्थिरता, शांति और समृद्धि’ को अत्यंत महत्वपूर्ण बताते हुए उन्होंने लोगों से ‘शांति का समर्थन’ करने की अपील की थी.
पूर्व प्रधानमंत्री शपथ ग्रहण समारोह में नहीं आए
उल्लेखनीय है कि पहली बार काठमांडू में बाबूराम भट्टाराई को छोड़कर सभी पूर्व प्रधानमंत्री – जिनमें से कुछ अभी भी नेपाल सेना की सुरक्षात्मक हिरासत में हैं – कार्की के शपथ ग्रहण समारोह में उपस्थित नहीं हुए.
पुष्प कमल दहल ‘प्रचंड’ के नेतृत्व वाली माओइस्ट सेंटर (Maoist Centre), शेर बहादुर देउबा के नेतृत्व वाली नेपाली कांग्रेस और ओली की सीपीएन (यूएमएल) सहित प्रमुख राजनीतिक दलों ने राष्ट्रपति पौडेल के फैसले के प्रति अपने विरोध का संकेत देते हुए समारोह से दूरी बनाए रखी.
राष्ट्रपति कार्यालय ने कहा कि नए राजनीतिक फैसले राष्ट्रपति में निहित शक्ति का प्रयोग करने वाले युवाओं की इच्छाओं के सम्मान में लिए गए हैं.
हालांकि पौडेल संसद भंग करने के लिए अनिच्छुक थे, लेकिन कार्की ने ज़ोर दिया. उनका पहला काम सड़कों पर हुई हिंसा के बाद राजनीतिक नेताओं, उनके घरों और संपत्तियों पर हुए हमलों के बाद व्यवस्था बहाल करना होगा.
इससे पहले, कार्की ने स्पष्ट किया कि वह अंतरिम सरकार का नेतृत्व तभी करेंगी जब उन्हें उच्च पदों पर बैठे भ्रष्टाचार और पुलिस द्वारा अत्यधिक बल प्रयोग की निष्पक्ष जांच की अनुमति दी जाएगी.
पुलिस के मुताबिक, प्रदर्शन और उससे जुड़ी अलग-अलग घटनाओं में अब तक 51 लोगों की जान जा चुकी है.
एक सूत्र ने अखबार को बताया कि तीनों शीर्ष नेता भ्रष्टाचार और पुलिस द्वारा अत्यधिक बल प्रयोग की उच्चस्तरीय जांच की कार्की की पूर्व शर्त का समर्थन करने के लिए बहुत इच्छुक नहीं थे क्योंकि इससे उनकी पार्टियों की बदनामी हो सकती थी.
ज़ेन ज़ी विरोधी समूहों के नेताओं और काठमांडू के मेयर बालेंद्र शाह ने पहले ही अंतरिम सरकार के प्रमुख के रूप में कार्की का समर्थन कर दिया था. ज़ेन-ज़ी नेताओं ने तीनों प्रमुख राजनीतिक दलों के रुख को अस्वीकार कर दिया और राष्ट्रपति को चेतावनी दी कि वे उन्हें या उनके आंदोलन के संदेश को कमज़ोर न करें.
इसके तुरंत बाद पौडेल और कार्की ने बातचीत का एक और दौर शुरू किया ताकि आगे की रणनीति बनाई जा सके और देर रात उन्हें पद की शपथ दिलाई जा सके.
नेपाल सेना प्रमुख जनरल अशोक राज सिग्देल ने कई ज़ेन-ज़ी समूहों और अन्य नेताओं को एक साथ लाने में प्रमुख भूमिका निभाई, ताकि किसी मुख्यधारा की पार्टी के नेता के नेतृत्व वाली सरकार के गठन को सुगम बनाया जा सके.
कौन हैं सुशील कार्की ?
नेपाल के सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर दी गई जानकारी के अनुसार, सुशीला कार्की का जन्म 7 जून 1952 को नेपाल के बिराटनगर में हुआ था.
इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, उन्होंने 1972 में बिराटनगर से स्नातक किया. 1975 में उन्होंने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) से राजनीति विज्ञान में स्नातकोत्तर डिग्री हासिल की और 1978 में त्रिभुवन विश्वविद्यालय से क़ानून की पढ़ाई पूरी की.
अखबार के मुताबिक, 1979 में उन्होंने बिराटनगर में वकालत की शुरुआत की. इसी दौरान 1985 में धरान के महेंद्र मल्टीपल कैंपस में वे सहायक अध्यापिका के रूप में भी कार्यरत रहीं.
बिराटनगर और धरान में तीन दशकों से ज़्यादा समय तक वकालत करने के बाद उन्होंने सीधे सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीश के रूप में प्रवेश किया. उनकी न्यायिक यात्रा का अहम पड़ाव 2009 में आया, जब उन्हें सुप्रीम कोर्ट में अस्थायी न्यायाधीश नियुक्त किया गया.
2010 में वे स्थायी न्यायाधीश बनीं. 2016 में कुछ समय के लिए वे कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश रहीं और 11 जुलाई 2016 से 6 जून 2017 तक नेपाल की पहली महिला मुख्य न्यायाधीश के रूप में पद संभाला.
सुशीला कार्की के सख़्त रवैए के कारण उन्हें विरोध का सामना करना भी करना पड़ा. सुशीला कार्की तब सुर्खियों में आईं जब उन्होंने कांग्रेस नेता जेपी गुप्ता को संचार मंत्री के पद पर रहते हुए भ्रष्टाचार के एक मामले में दोषी ठहराया.
बीबीसी के अनुसार, मुख्य न्यायाधीश के रूप में अपने लगभग 11 महीने के कार्यकाल के दौरान उन्हें महाभियोग का सामना करना पड़ा और उन्हें निलंबित कर दिया गया.
अप्रैल 2017 में उस समय की सरकार ने संसद में उनके ख़िलाफ़ महाभियोग प्रस्ताव रखा. आरोप लगाया गया कि उन्होंने पक्षपात किया और सरकार के काम में दखल दिया. प्रस्ताव आने के बाद जांच पूरी होने तक उन्हें मुख्य न्यायाधीश के पद से निलंबित कर दिया गया.
इस दौरान जनता ने न्यायपालिका की स्वतंत्रता के समर्थन में आवाज़ उठाई और सुप्रीम कोर्ट ने संसद को आगे की कार्रवाई से रोक दिया. लेकि बढ़ते दबाव के बीच कुछ ही हफ़्तों में संसद को प्रस्ताव वापस लेना पड़ा. इस घटना से सुशीला कार्की की पहचान एक ऐसी न्यायाधीश के रूप में बनी, जो सत्ता के दबाव में नहीं झुकतीं. और यही उनकी ज़ेन-ज़ी प्रदर्शनकारियों के बीच लोकप्रियता की वजह भी है.
