छात्र गतिविधियों पर लगते अंकुश, सिसक रहा इलाहाबाद विश्वविद्यालय  

पिछले वर्षों में इलाहाबाद विश्वविद्यालय में छात्र गतिविधियों और बहस-विमर्श की जगह सिकुड़ रही है. प्रशासनिक शिकंजा कसता गया है. इस संस्थान की आत्मा को मार दिया गया है.

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इलाहाबाद यूनिवर्सिटी. (फोटो: अरेंजमेंट)

आठ सितंबर को इलाहाबाद विश्वविद्यालय ने एक नोटिस जारी किया कि विश्वविद्यालय परिसर में किसी भी प्रकार की सभा, रैली, चेतना प्रसार या सांस्कृतिक गतिविधि के आयोजन के लिए ‘पूर्व अनुमति’ आवश्यक होगी. प्रथमदृष्टया यह व्यवस्था अनुशासन बनाए रखने, अव्यवस्था और हिंसा को रोकने और शैक्षणिक वातावरण को सुरक्षित रखने के लिए उचित प्रतीत होता है.

आलोचनात्मक दृष्टि से देखें तो यह कदम विश्वविद्यालय के खुलेपन और स्वतंत्र वातावरण को खत्म कर देगा. विश्वविद्यालयों का असली आकर्षण यही रहा है कि वहां विभिन्न छात्र संगठन, सांस्कृतिक समूह और शैक्षणिक मंच अपने विचार स्वतंत्र रूप से व्यक्त करते हैं. जब भी इस स्वतंत्रता पर प्रशासनिक शिकंजा बढ़ता है, तो विश्वविद्यालय ज्ञान और बहस के बजाय नियंत्रण के प्रतीक में बदलने लगते हैं.

इसका एक ज्वलंत उदाहरण यह विश्वविद्यालय स्वयं है. हाल में देश के उच्च शिक्षण संस्थानों की सूची जारी हुई है, जिसमें इलाहाबाद विश्वविद्यालय शीर्ष 200 संस्थानों से भी बाहर हो गया. एक समय यह विश्वविद्यालय ‘पूर्व के ऑक्सफोर्ड’ के नाम से जाना जाता था.

ऐसा क्यों हो रहा है? मैं इलाहाबाद विश्वविद्यालय में 2013 में स्नातक करने आया. तब यहां छात्रसंघ चुनाव हुआ करते थे. इस चुनाव के कारण विश्वविद्यालय परिसर में हमेशा बहसें और परिचर्चाएं होती रहती थीं, जो विभिन्न छात्र संगठनों की तरफ़ से आयोजित होती थीं. हिंदी विभाग और उर्दू विभाग के सामने वाली खाली पर परिचर्चा या सांस्कृतिक गतिविधियां हुआ करती थीं.

आठ सितंबर को विश्वविद्यालय द्वारा जारी नोटिस.

मैं अपनी कक्षाओं के बाद अक्सर इस लॉन में आकर बैठता और बहसों और परिचर्चाओं को सुना करता था. इस लॉन का नामकरण छात्र संगठनों ने अपने वैचारिक रुझान के हिसाब से तय किया था. प्रगतिशील छात्र संगठन इसे शर्मिला इरोम के नाम पर ‘इरोम लॉन’ कहा करते थे तो अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) इसे ‘विवेकानंद लॉन’ के नाम से पुकारती थी. यहां होने वाली गतिविधियां तब बिना किसी प्रशासनिक अनुमति के हुआ करती थीं. विश्वविद्यालय प्रशासन इसमें न के बराबर हस्तक्षेप करता था. इसलिए यह जगह कक्षा के पाठ्यक्रम से इतर छात्रों के लिए देश-दुनिया के विचारों को आलोचनात्मक रूप से सुनने और समझने की जगह हो जाता था.

जब मैं यहां आया था, तब कई छात्र संगठन सक्रिय थे जिसमें आइसा, एसएफआई, एआईडीएसो, एबीवीपी, समाजवादी छात्र सभा, प्रतियोगी छात्र मोर्चा, सामाजिक न्याय मोर्चा जैसे प्रमुख छात्र संगठन हुआ करते थे.

मैं इनकी परिचर्चाओं में अक्सर भाग लिया करता था. यहां ऐसा माहौल था कि मैं एक दिन किसी विमर्श के समर्थन में किसी को बोलते हुए सुनता तो उसके अगले दिन उसी के विरोध पर आधारित बहसों को सुनता. यह अनुभव बहुत अनोखा था.

छात्रसंघ के चुनाव के दौरान छात्र नेता विभिन्न जगहों पर अपना भाषण देते जो विश्वविद्यालय की समस्यायों के साथ देश के वैचारिक आयामों से भी टकराता था.

बदलने लगी तस्वीर

2019 में विश्वविद्यालय प्रशासन ने छात्रसंघ की जगह छात्र परिषद का गठन करके इस प्रक्रिया पर पहला प्रहार किया. इसके बाद कोरोना काल के बाद विश्वविद्यालय धीरे-धीरे एक ऐसे परिसर के रूप में बदलने लगा जो विश्वविद्यालय की मूल संकल्पना के खिलाफ था. धीरे-धीरे कैंपस के भीतर होने वाली छात्र गतिविधियों को नियंत्रित किया जाने लगा.

यह नियंत्रण इस हद तक बढ़ गया कि शाम पांच बजे के बाद लड़कियों के कैंपस में प्रवेश प्रतिबंधित करने के बाद, छात्रों को भी शाम के बाद परिसर में प्रवेश पर प्रतिबंध लगाकर इसकी पहुंच को और सीमित कर दिया गया. फिर गैर-अकादमिक गतिविधियों को रोका जाने लगा. विरोध करने पर छात्रों के ऊपर लाठियों के साथ गालियां भी दी गई.

छात्रों का निलंबन आम बात हो गई. पोस्टर लगाने पर पाबंदी लगा दी गई. एक बार एसएफआई की तरफ़ से विश्वविद्यालय परिसर की दीवारों पर कुछ स्लोगन लिखे गए. तब मैं एसएफआई का विश्वविद्यालय इकाई का अध्यक्ष था. कुलानुशासक ने मुझे बुलाया और कहा कि या तो आप दीवार साफ़ करें— नहीं तो हम कानूनी कार्रवाई करेंगे.

आज अगर दस छात्र घेरा बनाकर मैदान में बैठ जाएं तो प्रशासन के जैसे हाथ-पांव फूलने लगते हैं. गार्ड आकर धमकाते हैं कि आप लोग इस तरह न बैठें. शाम को दो गार्ड हाथ में डंडा लिए छात्रों को ढूंढ-ढूंढकर परिसर से बाहर निकालते हैं. इलाहाबाद नागरिक समाज का विश्वविद्यालय परिसर में प्रवेश प्रतिबंधित है. बिना प्रशासनिक अनुमति के वह परिसर में प्रवेश नहीं कर सकते हैं. इस तरह आंदोलित रहने वाला यह परिसर शांत और सुशुप्त अवस्था वाले परिसर में बदल गया.

पिछले दिनों जब ऑल इंडिया स्टूडेंट एसोसिएशन से जुड़े छात्र इलाहाबाद विश्वविद्यालय के कैंपस में सदस्यता अभियान चला रहे थे, गार्ड आए और रोकने लगे कि आप बिना प्रशासनिक अनुमति के यहां कुछ भी नहीं कर सकते हैं. कुछ दिन पहले स्वतंत्रता दिवस की पूर्वसंध्या पर आयोजित कविता पाठ को भी इसी के तहत रोकने की कोशिश की गई कि पहले आप विश्वविद्यालय प्रशासन से अनुमति लेकर आइए. इसके बाद आठ सितंबर वाली नोटिस जारी हुआ.

पिछले सालों में ऐसा कुछ भी नहीं बचा है जो छात्रों को महसूस होने दे कि वे किसी विश्वविद्यालय परिसर के भीतर हैं.‌ इलाहाबाद विश्वविद्यालय की आत्मा को मार दिया गया है. जहां छात्र गतिविधियां या बहस-विमर्श की जगह न के बराबर बची हो, उसको गर्त में जाना ही था.‌

यह तो नहीं थी विश्वविद्यालय की परिकल्पना

गौरतलब है कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दौर में विश्वविद्यालयों की भूमिका केवल शिक्षा तक सीमित नहीं थी, बल्कि वे सामाजिक चेतना, आलोचनात्मक विचार और राजनीतिक बहसों के महत्वपूर्ण केंद्र बने. नेहरू ने विश्वविद्यालय की जो परिकल्पना प्रस्तुत की, वह इसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि से उपजी थी.

उनके अनुसार, विश्वविद्यालय मात्र नौकरी प्राप्त करने का माध्यम या डिग्री बांटने वाली संस्था नहीं है, बल्कि यह ऐसा बौद्धिक और सांस्कृतिक केंद्र होना चाहिए जहां नए विचार जन्म लें, आलोचनात्मक चेतना विकसित हो और स्वतंत्रता का वातावरण पनपे.

नेहरू ने कहा था कि विश्वविद्यालयों को केवल डिग्री प्रदान करने का स्थल नहीं बल्कि ‘नवीन ज्ञान का सृजन और आलोचनात्मक चेतना का केंद्र’ होना चाहिए. उनका मानना था कि विश्वविद्यालयों को राजनीतिक या प्रशासनिक नियंत्रण से मुक्त रहना चाहिए ताकि वहां स्वतंत्र विचार और असहमति का माहौल पनप सके.

नेहरू ने विश्वविद्यालयों को आलोचनात्मक बहस का केंद्र बनाने पर बल दिया. उनके अनुसार, विश्वविद्यालयों को इस बात से डरना नहीं चाहिए कि वहां असहमति पनपेगी. असहमति ही लोकतंत्र का आधार है. उन्होंने संसद और विश्वविद्यालयों में अपने संबोधनों के दौरान कहा था कि विश्वविद्यालयों में स्वतंत्रता का वातावरण होना चाहिए, ताकि विद्यार्थी तर्कसंगत प्रश्न कर सकें और प्रचलित धारणाओं को चुनौती दे सकें.

इलाहाबाद विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा जारी नोटिस को देखते हुए यह सोचने का विषय है कि क्या स्वतंत्र विचार और रचनात्मक कार्यक्रमों के लिए प्रशासनिक स्वीकृति आवश्यक है? और क्या लोकतांत्रिक संवाद ‘पूर्व अनुमति’ की शर्त पर आधारित होना चाहिए?

नेहरू का मानना था कि विश्वविद्यालय राष्ट्र निर्माण की बौद्धिक प्रयोगशालाएं हैं. यहां से वैज्ञानिक दृष्टिकोण, लोकतांत्रिक चेतना और सांस्कृतिक संवेदनशीलता का निर्माण होता है. इलाहाबाद विश्वविद्यालय जैसे ऐतिहासिक संस्थान, जिसने स्वतंत्रता संग्राम में भी सक्रिय भूमिका निभाई, यदि आज मात्र ‘अनुमति आधारित गतिविधियों’ का स्थल बन जाए, तो यह राष्ट्र निर्माण को कमजोर करेगा.

(लेखक इलाहाबाद स्थित जीबी पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान में शोध छात्र हैं.)