11 वर्षों में सातवीं बार बिना प्रमुख के काम कर रहा केंद्रीय सूचना आयोग

पारदर्शिता को लेकर काम करने वाले कार्यकर्ताओं ने बताया है कि पिछले 11 वर्षों में सातवीं बार केंद्रीय सूचना आयोग बिना प्रमुख के काम कर रहा है. 9 सितंबर को तत्कालीन प्रमुख हीरालाल सामरिया के सेवानिवृत्त हो जाने के बाद से यह पद खाली है. कार्यकर्ताओं का आरोप है कि ‘हर बार यह पद नियमित सेवानिवृत्ति की वजह से ही खाली हुआ है. इसके बावजूद सरकार समय पर नियुक्तियां करने में नाकाम रही है.’

केंद्रीय सूचना आयोग. (फोटो: cic.gov.in)

नई दिल्ली: पारदर्शिता कार्यकर्ताओं ने रेखांकित किया है कि पिछले 11 वर्षों में सातवीं बार केंद्रीय सूचना आयोग (सीआईसी) बिना प्रमुख के काम कर रहा है. बीते 9 सितंबर को तत्कालीन प्रमुख हीरालाल सामरिया 65 वर्ष की आयु पूरी करने पर सेवानिवृत्त हो गए हैं, और किसी अन्य प्रमुख के नाम की घोषणा न होने के चलते अब यह पद खाली है.

नेशनल कैंपेन फॉर पीपुल्स राइट टू इंफॉर्मेशन और सतर्क नागरिक संगठन से जुड़ी कार्यकर्ता अंजलि भारद्वाज और अमृता जौहरी ने बताया, ‘हर बार आयोग के प्रमुख का पद नियमित सेवानिवृत्ति की वजह से ही खाली हुआ है. यानी हर बार पद खाली होने की तारीख पहले से तय थी, इसके बावजूद सरकार समय पर नियुक्तियां करने में नाकाम रही है.’

इन दोनों कार्यकर्ताओं के साथ रिटायर्ड कमोडोर लोकेश बत्रा भी सुप्रीम कोर्ट में लंबित उस मामले के याचिकाकर्ता हैं, जो देशभर में सूचना आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़ा है. उनका कहना है कि इस समय केंद्रीय सूचना आयोग में केवल दो आयुक्त काम कर रहे हैं जबकि मुख्य आयुक्त और आठ अन्य आयुक्तों के नौ पद खाली पड़े हैं.

कार्यकर्ताओं ने बताया, ‘सीआईसी में लंबित मामलों की संख्या पहले से ही 26,000 से अधिक है और किसी मामले की सुनवाई के लिए एक साल से ज्यादा इंतजार करना पड़ता है. आठ पद तो नवंबर 2023 से ही खाली पड़े हैं,’

बयान में कहा गया कि अगस्त 2024 में केंद्र सरकार ने सूचना आयुक्तों के रिक्त पदों के लिए विज्ञापन जारी किया था. जनवरी 2025 में सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में शपथपत्र देकर कहा था कि चयन प्रक्रिया अगले तीन महीने यानी अप्रैल 2025 तक पूरी हो जाएगी. लेकिन अब तक कोई नियुक्ति नहीं हुई. 

इसके बाद 21 मई को केंद्र सरकार ने मुख्य सूचना आयुक्त के लिए आवेदन आमंत्रित किए थे, जिसकी अंतिम तिथि 30 जून 2025 रखी गई थी.

कार्यकर्ताओं ने कहा, ‘नियुक्तियां न करना 2019 के सुप्रीम कोर्ट के उस आदेश का भी उल्लंघन है, जिसमें अदालत ने समयबद्ध और पारदर्शी तरीके से रिक्त पदों को भरने का निर्देश दिया था.’ 

अक्टूबर 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा था कि अगर सूचना आयोगों में रिक्तियां नहीं भरी गईं तो सूचना का अधिकार कानून महज़ एक ‘मृत दस्तावेज’ बनकर रह जाएगा.

कार्यकर्ताओं ने यह भी आरोप लगाया कि नवंबर 2023 में हुई पिछली नियुक्तियां मनमाने तरीके से की गई थीं. उस समय चयन समिति में विपक्ष के नेता की मौजूदगी के बिना ही नियुक्तियां की गईं, जबकि आरटीआई कानून कहीं भी ऐसी अपूर्ण समिति को निर्णय लेने की अनुमति नहीं देता है. 

ज्ञात हो कि आरटीआई कानून के तहत सीआईसी प्रमुख और आयुक्तों की नियुक्ति के लिए बनी चयन समिति में प्रधानमंत्री (अध्यक्ष), विपक्ष के नेता और प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक केंद्रीय मंत्री शामिल होते हैं.

बयान में कहा गया, ‘सरकार समय पर और उचित तरीके से नियुक्तियां न करके लोगों के सूचना के मौलिक अधिकार को कमजोर कर रही है और इसे खत्म करने पर उतारू है. रिक्तियां बढ़ने से आयोग में अपील और शिकायतें लंबित रहती हैं और लोगों को अपने मामले की सुनवाई के लिए सालों इंतजार करना पड़ता है. देर से मिली सूचना, असल में सूचना न मिलने के बराबर है.’