नेपाल: जेन-ज़ी आंदोलन क्या कोई राजनीतिक दिशा तय कर पाएगा?

इतिहास बताता है कि हर आंदोलन और संघर्ष के बाद नेपाल आगे ही बढ़ा है. भले ही क्रांतियां अधूरी रही लेकिन उनकी उपलब्धिों ने समाज को गति ही दी. उम्मीद की जानी चाहिए कि मौजूदा आंदोलन भी गतिरोध को तोड़ते हुए देश को एक नई राह दिखाएगा.

जेन-ज़ी आंदोलन आंदोलन से मची उथल-पुथल और और नेपाल के आगे की दिशा को लेकर विश्लेषण का सिलसिला जारी है. सबसे अहम सवाल है कि आखिर जेन-ज़ी आंदोलन कैसे फूट पड़ा और इसके पीछे कौन-कौन ताकतें थीं? (फोटो: पीटीआई)

जेन-ज़ी आंदोलन, व्यापक हिंसा, तोड़फोड़, लूट-पाट और केपी ओली सरकार के पतन के बाद नेपाल के हालात धीरे-धीरे सामान्य हो रहे हैं. पूर्व मुख्य न्यायाधीश सुशीला कार्की की अगुवाई में अंतरिम सरकार का गठन हो चुका है. मंत्रीपरिषद में तीन मंत्री बन चुके हैं और कुछ और मंत्रियों को मंत्रिपरिषद में शामिल होने पर विचार-विमर्श चल रहा है.

जेन-ज़ी आंदोलन आंदोलन से मची उथल-पुथल और और नेपाल के आगे की दिशा को लेकर विश्लेषण का सिलसिला जारी है. सबसे अहम सवाल है कि आखिर जेन-ज़ी आंदोलन कैसे फूट पड़ा और इसके पीछे कौन-कौन ताकतें थीं? अंतरिम सरकार क्या छह महीने में चुनाव करा पाएगी? आंदोलन के दौरान बड़े पैमाने पर हुए विध्वंस से नेपाल कैसे उबरेगा?

आंदोलन के निशाने पर रहे राजनीतिक दल और उनके शीर्ष नेता क्या फिर से जनता में पैठ बना पाएंगे या हाशिए पर चले जाएंगे? जेन-ज़ी आंदोलन से निकल रहे चेहरे क्या कोई राजनीतिक दिशा तय कर पाएंगे?

सरकारी भ्रष्टाचार पर सवाल

ओली सरकार ने चार सितंबर को राजस्व, साइबर सुरक्षा, कंटेंट मॉडरेशन का हवाला देते हुए फेसबुक, एक्स सहित 26 सोशल मीडिया प्लेटफार्म को बंद करने का आदेश दिया था. सरकार के निर्णय पर तुरंत सवाल उठने लगे. इसे भ्रष्टाचार के खिलाफ उठ रही आवाजों को रोकने का प्रयास माना गया.

सोशल मीडिया प्लेटफार्म टिकटॉक पर युवाओं के कई समूहों द्वारा इंडोनेशिया और फिलीपींस से प्रेरित होकर नेताओं सहित कुछ धनाढ्य लोगों की संतानों के ऐशोआराम और आम नेपालियों की अभावग्रस्त जिंदगी पर रील-वीडियो बनाते हुए सरकारी भ्रष्टाचार पर सवाल उठाए जा रहे थे.

‘नेपो बेबी’ नाम से यह ट्रेंड कर रहा था. यह अभियान बाद में टिकटॉक से रेडिट और फिर डिस्कार्ड पर चलने लगा. एकाएक सोशल मीडिया को प्रतिबंधित किए जाने से युवाओं को लगा कि उनके द्वारा छेड़ी जा रही भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम को विफल करने के लिए ही सरकार द्वारा यह कार्यवाही की गई है. बड़ी संख्या में विदेश रह रहे नेपाली और उनके परिजन भी सोशल मीडिया के जरिए होने वाले संपर्क-संवाद दूट जाने से नाराज हुए.

युवाओं के कई समूहों द्वारा सोशल मीडिया पर प्रतिबंध और भ्रष्टाचार के खिलाफ आठ सितंबर को माइती मंडला घर पर प्रदर्शन का ऐलान किया गया.

प्रदर्शन का ऐलान जेन-ज़ी आंदोलन में सबसे अधिक चर्चा में आए सुदन गुरुंग के एनजीओ ‘हामी नेपाल’ द्वारा भी किया गया. ‘हामी नेपाल’ द्वारा सात सितंबर को प्रदर्शन की घोषणा करते हुए सोशल मीडिया प्लेटफार्म डिस्कार्ड पर युवाओं से कहा गया:

‘बहुत लंबे समय से भ्रष्टाचार ने हमारा भविष्य, हमारे सपने और हमारे राष्ट्र की गरिमा को छीन लिया है. हम नेताओं को अमीर बनते देखते हैं जबकि आम लोग जिंदा रहने के लिए संघर्ष करते हैं. हम अन्याय को आम होते हुए देखते हैं लेकिन अब यह और स्वीकार्य नहीं.’

‘हमी नेपाल ’ एक दशक पहले भूकंप की त्रासदी के समय अस्तित्व में आया था. आठ सितंबर के पहले यह एनजीओ ‘ मानवता, करुणा और सेवा ’ को अपना ध्येय मानते हुए भूकंप, बाढ़ के प्रभावितों के बीच देशी-विदेशी अनुदान के जरिए सेवा कार्य कर रहा था. राहत वितरण के कई कार्य उसने सेना के साथ किया. जेन-ज़ी प्रदर्शन के पहले उसे  राजनीतिक मुद्दों पर कभी बोलते या हस्तक्षेप करते नहीं सुना गया था.

ओडीसा आईआईटी में नेपाली छात्रा प्रकृति लम्साल की मौत पर हामी नेपाल ने जरूर सक्रियता दिखायी थी और तत्कालीन विदेश मंत्री आरजू राना देउबा को ज्ञापन दिया था.

आरजू राना देउबा पांच बार प्रधानमंत्री रहे और वर्तमान में नेपाली कांग्रेस के अध्यक्ष शेरबहादुर देउबा की पत्नी हैं. जेन-ज़ी आंदोलन के दूसरे दिन नौ सितंबंर को उग्र भीड़ ने शेरबहादुर देउबा और आरजू देउबा के साथ मारपीट की थी और उनके घर को जला दिया था. सेना के जवानों ने उन्हें किसी तरह बचाया और सुरक्षित स्थान पर ले गए थे.

अंतरिम सरकार को लेकर अलग-अलग राय

‘हामी नेपाल’ के साथ-साथ जेन-ज़ी के कई और समूह आठ सितंबर को प्रदर्शन का आह्वान किया था जिसमें रक्षा बम, युजन राज भंडारी, अर्जुन शाही, टंका धामी, सिराज धुंगाना, तनुजा पांडेय आदि के नाम उभर कर सामने आए हैं. कुछ युवाओं ने सात सितंबर की शाम माइतीघर के पास बैठक भी की.

ये समूह देश में भ्रष्टाचार, पलायन, राजनीतिक दलों की विफलता, सरकार की निरंकुशता पर एक राय रखते हैं लेकिन आंदोलन के बाद राष्ट्रपति व सेनाध्यक्ष के साथ बातचीत में संसद के विघटन, लोकतंत्र, संविधान में संशोधन, अंतरिम सरकार को लेकर अलग-अलग राय सामने आई.

रक्षा बम, युजन राज भंडारी सहित कई युवाओं ने सेनाध्यक्ष द्वारा राजशाही की वापसी और हिंदू राष्ट्र की स्थापना के लिए अभियान चलाने वाले विवादास्पद व्यवसायी दुर्गा प्रसाई, राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी को बातचीत में शामिल होने का विरोध किया था.

दुर्गा प्रसाई ने 10 सितंबर को नेपाली सेनाध्यक्ष के साथ वार्ता की तस्वीर साझा करते हुए लिखा था कि ‘उन्हें पूर्व प्रधान न्यायाधीश सुशीला कार्की, काठमांडू के मेयर बालेन शाह का नेतृत्व स्वीकार है. यदि कोई आगे नहीं आता है तो मैं भी तैयार हूं. ’

जेन-ज़ी आंदोलन का समर्थन दुर्गा प्रसाई ने भी किया था. उन्होंने सोशल मीडिया अकाउंट पर सात सितंबर की शाम जेन-ज़ी आंदोलन के एक समूह के युवाओं के साथ तस्वीर साझा की थी.

दुर्गा प्रसाई पर अवैध हथियार रखने, बैंकों का पैसा गबन करने सहित कई आरोप हैं. इसी साल के शुरुआत में राजशाही की वापसी के लिए शुरू किए गए प्रयास के तहत ‘ राज संस्था पुनर्स्थापना के लिए संयुक्त जन आंदोलन समिति’ का गठन हुआ था और दुर्गा प्रसाई इसके कमांडर बने.

राजशाही के समर्थन में 28 मार्च को काठमांडू के तिनकुने में हुए हिंसक प्रदर्शन का इन्होंने नेतृत्व किया था जिसमें एक टीवी पत्रकार सहित दो लोगों की जान चली गई और 100 से अधिक पुलिसकर्मी व प्रदर्शनकारी घायल हो गए थे.

उस समय भी निजी संपत्ति, अस्पताल, व्यापारिक केंद्र और तीन मीडिया केंद्रों पर आगजनी, तोड़फोड़ व लूटपाट की गई थी. नेपाल समाजवादी पार्टी के कार्यालय को आग लगाया गया था. एक पखवारे बाद उन्हें गिरफ्तार किया गया.

वे अगस्त के पहले सप्ताह जेल से बाहर आए और राजशाही के प्रति भावुक उद्गार व्यक्त करते हुए कहा था, ‘राजा राष्ट्र का सर्वोच्च प्रतीक होता है. वह केवल एक दल, जाति या समूह नहीं, बल्कि सभी नागरिकों का एक साझा आधार है. राजा में कोई विवाद नहीं होता, क्योंकि उसका स्थान राजनीति या स्वार्थ से ऊपर होता है.’

आंदोलन में हुआ बेहिसाब नुकसान

नेपाल बीमा प्राधिकरण का कहना है कि आंदोलन के दौरान निजी संपत्ति के नुकसान के दावों की राशि 30 अरब तक पहुंच गई है. राष्ट्रीय वाणिज्य बैंक के नया बानेश्वर शाखा से 18 किलो सोना और पांच करोड़ नगदी लूट लिए गए. नेपाल बैंकर्स एसोसिएशन के अनुसार, देश भर में 61 बैंक कार्यालयों को नुकसान पहुंचा है. होटल सेक्टर 25 अरब के नुकसान का अनुमान लगा रहा है.

इस हिंसा में अब तक 74 लोगों के मारे जाने की पुष्टि हो चुकी है. आगजनी, तोड़फोड़, लूटपाट का मुल्यांकन होना शेष है. विशालकाय सुपर मार्केट की श्रृंखला भाट भेटनी की 30 में से 21 शाखाएं जलकर कर खाक हो चुके हैं. भैरहवां सहित कई स्थानों पर नेपाली कस्टम आफिस जला दिए गए. मालपोत कार्यालय, जिला न्यायालय भी जलाए गए. दर्जनों जेल से 14 हजार से अधिक कैदी भाग गए. अब भी करीब दस हजार कैदी गायब हैं.

धोखाधड़ी और मनी लॉन्ड्रिंग के केस में जेल में बंद राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी के अध्यक्ष रवि लामिछाने भी काठमांडू के नक्खू जेल से निकलकर घर आ गए जहां सैकड़ों लोगों ने उनका स्वागत किया. उनका कहना था कि सरकारी आदेश पर वह छूट कर आए है लेकिन चार दिन बाद वह खुद जेल वापस चले गए.

आक्रोश की अभिव्यक्ति

नौ सितंबर को हिंसा, आगजनी और लूटपाट के पैटर्न को देखें, तो यह लोगों को आक्रोश की अभिव्यक्ति से कहीं बहुत अधिक नजर आता है. चुन-चुनकर नेपाल में स्थापित दलों के नेताओं के घरों, कार्यालयों को तो निशाना बनाया ही गया है. उन प्रतिष्ठानों को भी आग के हवाले किया गया जिसके बारे में आम तौर पर चर्चा रहती है कि इसमें कुछ शीर्ष नेताओं की अवैध कमाई लगी है.

नौ सितंबर को दोपहर में लोगों ने पोखरा के मुख्य चौक पर स्थापित शहीद लखन थापा की प्रतिमा को तोड़कर गोरखा राजशाही की स्थापना करने वाले पृथ्वीनारायण शाह की प्रतिमा स्थापित कर दी. शहीद लखन थापा नेपाल में राणाशाही के खिलाफ जन विद्रोह की अगुवाई करते हुए शहीद हुए थे.

राजवादी समर्थकों और संविधान-लोकतंत्र-गणराज्य समर्थकों के बीच चल रहा निरतंर संघर्ष

उनकी प्रतिमा तोड़े जाने पर आदिवासी जनजाति महासंघ ने तीव्र आक्रोश प्रकट किया और पांच दिन बाद फिर शहीद लखन थापा की मूर्ति स्थापित कर दी. इस स्थान पर पांच दशक में कई बार शहीद लखन थापा की प्रतिमा हटायी गई है. तीन वर्ष पहले राजा समर्थक दल राप्रपा की ओर से यहां पर पृथ्वी नारायण शाह की प्रतिमा स्थापित की गई थी जिसे एक वर्ष वाद ही आदिवासी संगठनों ने हटा कर फिर शहीद लखन थापा की प्रतिमा स्थापित की थी.

पोखरा का यह घटनाक्रम पूरे देश में राजवादी समर्थकों और संविधान-लोकतंत्र-गणराज्य समर्थकों के बीच चल रहे निरतंर संघर्ष का प्रतीक है. एक वर्ष से अधिक समय से राजशाही ताकतें फिर से संगठित हुई हैं. नेपाल में स्थापित राजनीतिक दलों के खिलाफ बढ़ रहे असंतोष को उन्होंने ठीक से पढ़ा और अपनी सक्रियता बढाई.

नेपाल में लगातार पांव पसार रहे हिंदू संगठनों-हिंदू स्वंयसेवक संघ आदि का भी उनका परोक्ष-अपरोक्ष समर्थन भी मिल रहा था. जेन-ज़ी आंदोलन में इन ताकतों ने भी घुसपैठ की और अवसर को अपनी ओर मोड़ने की कोशिश भी की गई. नेपाली सेनाध्यक्ष के साथ बातचीत में दुर्गा प्रसाई, राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी का शामिल होना और उनके द्वारा संविधान, लोकतंत्र, संघवाद के प्रति सवाल उठान इसी प्रयास को दर्शाता है.

यहां यह भी उल्लेख कर देना जरूरी होगा कि एक तरफ राजा और उनके समर्थक राजतंत्र की वापसी, देश को हिंदू राष्ट्र बनाने के लिए शक्ति प्रदर्शन की भूमिका बना रहे थे तो दूसरी तरफ पूर्व राजा ज्ञानेंद्र शाह के पौत्र 23 वर्षीय हृदयेंद्र विक्रम शाह के लिए सोशल मीडिया अभियान भी चलाया जा रहा था.

राजावादी उन्हें नेपाल के ‘नए भविष्य’ को तौर पर प्रस्तुत कर रहे हैं. एक समय बेहद बदनाम हुए ज्ञानेंद्र शाह के पुत्र पारस शाह ने अंतरिम सरकार के गठन के लिए हो रही वार्ता के दौरान अपने फेसबुक पर 10 सितंबर को एक पोस्ट लिखकर वार्ता के अनिवार्य शर्तों का उल्लेख किया. इ

न शर्तों में ‘प्रतिनिधि सभा, राष्ट्रीय सभा सहित प्रादेशिक सभाओं के विघटन, नई संसद द्वारा संविधान संशोधन, कार्यकारी प्रमुख का प्रत्यक्ष निर्वाचन, सभी तरह के आरक्षणों का खात्मा, सांसदों, मंत्रियों के लिए योग्यता निर्धारण आदि बताते हुए आखिर में राष्ट्र प्रमुख के रूप में राजा या बेबी किंग को स्वीकार करने की बात कही.’

जेन-ज़ी आंदोलन में शामिल समूह के साथ लेखक-पत्रकार भी कह रहे हैं कि इस आंदोलन में दूसरे दिन तमाम हित समूहों ने घुसपैठ बना ली थी. इस बारे में कान्तिपुर समाचार पत्र ने एक रिपोर्ट भी प्रकाशित की है.

इन हित समूहों में कुछ का उद्देश्य सरकार को अपदस्थ करने के साथ-साथ नेपाल को राजनीतिक शून्य की तरफ धकेल देने की योजना थी ताकि वे आगे अपने को इस अवसर का लाभार्थी बन सकें.

माओवादी आंदोलन और उसके बाद सात राजनीतिक दलों का गठबंधन

अब आगे क्या होगा? यह सबसे बड़ा प्रश्न है जिसका जवाब ढूंढा जा रहा है. दस वर्ष के माओवादी आंदोलन और उसके बाद सात राजनीतिक दलों के गठबंधन के साथ माओवादियों के जनआंदोलन-दो ने मई 2008 में नेपाल में 240 वर्ष के राजतंत्र का खात्मा कर नेपाल विश्व का सबसे नया गणराज्य बना दिया. उसके बाद 17 वर्ष में संविधान सभा और आम चुनाव में किसी भी दल को पूर्ण बहुमत नहीं मिला.

संविधान निर्माण की प्रक्रिया लंबी चली. संविधान बनाने में काफी समय लगने से ही लोगों की उम्मीदें टूटने लगी थी. जब 20 सितंबर 2015 को संविधान लागू हुआ तब तराई और मधेश के लोग असंतुष्ट होकर आंदोलन पर उतर आए.

भारत ने इस आंदोलन की आड़ में नेपाल में ‘नियंत्रित नाकाबंदी’ कर दी. नाकाबंदी के दौरान नेपाली नागरिकों को भारी मुसीबतों का सामना करना पड़ा. इन चुनौतियों से नेपाल सामना कर ही रहा था कि उसे बड़े भूकम्प की त्रासदी का सामना करना पड़ा. फिर कोरोना महामारी ने अर्थव्यवस्था को बड़ा झटका दिया.

राजशाही की समाप्ति, नया संविधान बनने के बाद नेपाल में स्थिरता, विकास की जबर्दस्त जन आकांक्षा बनी थी. नेपाल में बदलाव की उम्मीदों के पंख लग गए थे. ‘नया नेपाल’ का नारा गूंजने लगा था. यह सबसे ज्यादा सुना जाने वाला शब्द था.

लोगों को उम्मीद थी नए संविधान के अनुरूप संघीय ढांचा अस्तित्व में आएगा, सभी क्षेत्रों, वर्गों और वंचितों को लोकतंत्र में हिस्सेदारी होगी. नेपाल से बड़े पैमाने पर होने वाला पलायन रूकेगा.

लेकिन यह उम्मीदें धराशायी हो गईं. राजशाही की समाप्ति के बाद पिछले 17 वर्षों में 14 सरकारें अस्तित्व में आईं. सभी सरकारें अल्पजीवी रहीं. इस दौरान केपी ओली चार बार, पुष्प कमल दहल प्रचंड तीन बार, शेर बहादुर देउबा दो बार, माधव नेपाल, झलनाथ खनाल, बाबूराम भट्टराई और सुशील कोईराला प्रधानमंत्री बने. पूर्व न्यायाधीश खिलराज रेग्मी 14 मार्च 2013 से 11 फरवरी 2014 तक कार्यवाहक प्रधानमंत्री रहे.

सत्ता का केंद्रीकरण सभी सरकारों की केंद्रीय प्रवृत्ति रही

भ्रष्टाचार, अपारदर्शिता, भाई-भतीजावाद, सत्ता का केंद्रीकरण सभी सरकारों की केंद्रीय प्रवृत्ति रही. सिद्धांतहीन अवसरवादी गठजोड़ों ने सभी रिकॉर्ड ध्वस्त कर दिए. इन कारणों से जनता में पैदा हुई निराशा आक्रोश में बदलने लगी. लेकिन स्थापित दलों का नेतृत्व बेपरवाह बना रहा.

जेन-ज़ी आंदोलन के कुछ समय पहले ही दस वर्ष से पार्टी का नेतृत्व कर रहे केपी ओली ने दूसरे नेताओं के लिए रास्ता खाली करने से इनकार कर दिया और विधान अधिवेशन में दो टर्म और 70 वर्ष की आयु सीमा का प्रतिबंध हटाकर उन्हें फिर से नेकपा अध्यक्ष बनाने की राह बना दी गई. पार्टी के भीतर से उठी आवाजों को अनसुना कर दिया गया. नेपाली कांग्रेस, माओवादी केंद्र में भी नेतृत्व के खिलाफ आवाज उठीं लेकिन उसका कोई असर नहीं हुआ.

आखिरकार जब जेन-ज़ी आंदोलन के जरिए जन असंतोष फूट पड़ा तो अब एमाले, माओवादी केंद्र, नेपाली कांग्रेस सहित कई दलों में पुनर्गठन, अपनी रीत-नीति बदलने, पार्टी प्रमुख की पाद पूजा बंद करने और युवाओं को आगे लाने की बात होने लगी है. पूर्व शिक्षा मंत्री और राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी की नेता सुमना श्रेष्ठ ने अपनी पार्टी से इस्तीफा देते कहा कि अपने नेताओं को पूजना बंद कर करो. या तो उन्हें हटा दो या उन्हें छोड़ दो.

जेन-ज़ी आंदोलन के बाद नेपाल की राजनीति में बना लंबे समय से ठहराव अब टूटता दिख रहा है. नेपाल के इतिहास में यह पहला ऐसा आंदोलन था जिसमें कोई राजनीतिक दल या संगठन नेतृत्व में नहीं था. यह आंदोलन भी कोई संगठन या नेतृत्व देता हुए नहीं दिख रहा है.

राजनीतिक दलों ने संसद के विघटन से असहमति जताते हुए हुए सुशीला कार्की की अंतरिम सरकार को मान लिया है और चुनाव की तैयारी में जाते दिख रहे हैं. दुर्गा प्रसाई पार्टी बनाने की बात कह रहे हैं. अभी तक पर्दे के पीछे रह रहे बालेन शाह और उनके जैसे अन्य नेता भी अपनी नई भूमिकाओं की तलाश कर रहे हैं.

इतिहास बताता है कि हर आंदोलन और संघर्ष के बाद नेपाल आगे ही बढ़ा है. भले ही क्रांतियां अधूरी रही लेकिन उनकी उपलब्धिों ने देश-समाज को अग्रगति ही दी. उम्मीद की जानी चाहिए कि मौजूदा आंदोलन भी गतिरोध को तोड़ते हुए देश को एक नई राह दिखाएगा.

(लेखक गोरखपुर न्यूज़लाइन वेबसाइट के संपादक हैं.)