श्रीनगर: उत्तरी कश्मीर में वरिष्ठ हुर्रियत नेता अब्दुल गनी भट के निधन के बाद गुरुवार (18 सितंबर) को अधिकारियों ने घाटी में कुछ राजनीतिक नेताओं को नज़रबंद कर, उन्हें कथित तौर पर दिवंगत नेता के घर जाने पर प्रतिबंध लगा दिए.
मालूम हो कि अलगाववादी राजनीति के दिग्गज और ऑल पार्टीज हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के पूर्व अध्यक्ष भट का बुधवार को 94 वर्ष की आयु में उत्तरी कश्मीर के सोपोर के बोटिंगो गांव स्थित उनके आवास पर लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया.
कथित तौर पर उनके परिवार की इच्छा के खिलाफ उन्हें बुधवार को ही कुछ घंटों बाद उनके पैतृक कब्रिस्तान में दफ़ना दिया गया. जबकि परिवार द्वारा गुरुवार को उनके जनाज़े की योजना बनाई गई थी.
इस संबंध में परिवार के एक सूत्र ने कहा, ‘आज सुबह 10 बजे जनाज़े की नमाज़ तय की गई थी, जिससे उनके दोस्त, प्रशंसक और शुभचिंतक उनके अंतिम दर्शन कर सकें. हालांकि, अधिकारियों ने हमें कल रात उन्हें तुरंत दफ़नाने के लिए कहा. हम आदेश का पालन करने के अलावा और कुछ नहीं कर सकते थे.’
उन्होंने आगे कहा कि उन्हें इन प्रतिबंधों के बारे में कोई लिखित आदेश नहीं दिया गया था.
ज्ञात हो कि भट के परिवार में उनकी पत्नी और तीन बेटे हैं, जिनमें से दो विवाहित हैं. प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया कि रात 11:30 बजे हुई जनाज़े की नमाज़ में लगभग 1,300-1,500 लोग शामिल हुए थे.
सुरक्षा बलों ने अंतिम संस्कार में शामिल होने से रोकने के लिए गांव को सील किया
हुर्रियत नेता के परिवार ने आरोप लगाया कि उनके निधन के बाद सुरक्षा बलों ने शोक मनाने वालों को अंतिम संस्कार में शामिल होने से रोकने के लिए गांव को सील कर दिया था.
सोपोर के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक इफ्तखार तालिब ने हालांकि, इस आरोप का खंडन किया. उन्होंने द वायर को बताया, ‘कोई प्रतिबंध नहीं थे.’
उन्होंने परिवार के इस दावे का भी खंडन किया कि अधिकारियों ने उनकी इच्छा के विरुद्ध हुर्रियत नेता को दफनाने के लिए मजबूर किया.
उल्लेखनीय है कि भट ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से फ़ारसी में स्नातकोत्तर और कानून में स्नातक की डिग्री प्राप्त की थी. वह मुस्लिम यूनाइटेड फ्रंट (एमयूएफ) के सह-संस्थापक थे, जिसने 1987 में जम्मू-कश्मीर में हुए विवादास्पद विधानसभा चुनाव में भाग लिया था. ऐसा माना जाता है कि इसी चुनाव ने 1990 के दशक की शुरुआत में कश्मीर में सशस्त्र विद्रोह की चिंगारी भड़काई थी.
कश्मीर की अलगाववादी राजनीति के एक दिग्गज और कश्मीर पर भारत और पाकिस्तान के बीच बातचीत के पैरोकार, भट मुस्लिम कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष भी थे, जो हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के उदारवादी धड़े से संबद्ध थी. 2019 में अनुच्छेद 370 को हटाए जाने के बाद इस संगठन पर प्रतिबंध लगा दिया गया था.
पूर्व हुर्रियत प्रमुख उन कई अलगाववादी नेताओं में शामिल थे, जिन्होंने 2000 के दशक की शुरुआत में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाले भाजपा-नीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के सत्ता में रहने के दौरान कश्मीर मुद्दे पर नई दिल्ली और इस्लामाबाद के बीच ट्रैक-2 वार्ता में भाग लिया था.
ऐसा माना जाता है कि 2020 में उनकी तबीयत बिगड़ने लगी, जिसके बाद वे सार्वजनिक जीवन से दूर हो गए.
इस संबंध में परिवार के एक सदस्य ने बताया कि भट को पिछले साल दिसंबर में किडनी की बीमारी हो गई थी, जिससे वे उबर नहीं पाए.
कई नेताओं ने उनके निधन पर शोक व्यक्त किया
जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला, पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी की अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती, घाटी के प्रमुख मौलवी मीरवाइज उमर फारूक, पीपुल्स कॉन्फ्रेंस के प्रमुख सज्जाद लोन और अपनी पार्टी के अध्यक्ष अल्ताफ बुखारी सहित कई अन्य लोगों ने उनके निधन पर शोक व्यक्त किया.
भट को एक ‘वरिष्ठ कश्मीरी राजनीतिक नेता’ बताते हुए, अब्दुल्ला ने कहा कि उनमें ‘बातचीत का समर्थन करने का साहस था, जब कई लोग मानते थे कि हिंसा ही आगे बढ़ने का एकमात्र रास्ता है और इसी के परिणामस्वरूप उनकी मुलाक़ात तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जी और उप-प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी जी से हुई.’
उन्होंने आगे कहा, ‘हमारी राजनीतिक विचारधाराएं बिल्कुल अलग थीं, लेकिन मैं उन्हें हमेशा एक बेहद शालीन व्यक्ति के रूप में याद रखूंगा. प्रोफ़ेसर भट साहब को जन्नत में जगह मिले. उनके परिवार और प्रियजनों के प्रति मेरी संवेदनाएं.’
मुफ़्ती और मीरवाइज़ समेत अन्य राजनीतिक नेताओं ने आरोप लगाया कि अधिकारियों ने उन्हें सोपोर जाने और भट के परिवार के प्रति संवेदना व्यक्त करने से रोकने के लिए नज़रबंद कर दिया.
द वायर से बात करते हुए, मीरवाइज़ ने कहा कि उन्होंने अपने ‘दोस्त और मार्गदर्शक’ के निधन की खबर सुनने के बाद उनके घर जाने की कोशिश की.
उदारवादी हुर्रियत प्रमुख एनडीए सरकार के तहत ट्रैक-2 कूटनीति का भी हिस्सा थे, जिसने कश्मीर मुद्दे के समाधान की उम्मीद जगाई थी.
उन्होंने बुधवार शाम एक्स पर एक पोस्ट में कहा, ‘मुझे अपने घर में बंद कर दिया गया है और उनकी अंतिम यात्रा में जाने का अधिकार नहीं दिया गया है. उनके साथ मेरा जुड़ाव 35 सालों की दोस्ती और मार्गदर्शन का था. कई अन्य लोग भी उन्हें अंतिम श्रद्धांजलि देने के लिए तरस रहे थे. उनके जनाज़े में शामिल होने और उन्हें अंतिम विदाई देने के सुकून से भी वंचित रहना एक असहनीय क्रूरता है.’
पीडीपी प्रमुख, जिन्हें कथित तौर पर श्रीनगर में नज़रबंद भी किया गया था और गुरुवार को भट के घर जाने से रोक दिया गया था, ने इस मुद्दे पर भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि ये प्रतिबंध ‘जम्मू-कश्मीर की कठोर और अलोकतांत्रिक सच्चाई को उजागर करती हैं.’
भाजपा जानबूझकर सच्चाई से अनजान बनी हुई है
पीडीपी प्रमुख ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर एक पोस्ट में कहा, ‘हज़रतबल दरगाह में जो कुछ हुआ, वह स्वतःस्फूर्त, अपरिपक्व जनाक्रोश का विस्फोट मात्र एक अकेली घटना नहीं थी. यह हाशिए पर धकेले गए लोगों का एक साफ और स्पष्ट संदेश था. हालांकि, भाजपा जानबूझकर इस सच्चाई से अनजान बनी हुई है. वह वर्षों से पनप रही गहरी पीड़ा और दबी हुई भावनाओं से कुछ भी सीखने से इनकार कर रही है,’
गौरतलब है कि 5 सितंबर को राजधानी श्रीनगर स्थित हज़रतबल दरगाह में भाजपा के नेतृत्व वाले वक्फ बोर्ड द्वारा स्थापित आधारशिला पर उत्कीर्ण राष्ट्रीय प्रतीक को पुरुष और महिला श्रद्धालुओं के एक समूह ने तोड़ दिया, जिसके बाद जम्मू-कश्मीर पुलिस ने मामला दर्ज किया और लगभग 30 लोगों को हिरासत में लिया गया.
मुफ़्ती ने कहा, ‘यह तेज़ी से स्पष्ट होता जा रहा है कि भाजपा को कश्मीर में शांति या सुधार में कोई दिलचस्पी नहीं है. इसके बजाय वे देश के बाकी हिस्सों में राजनीतिक लाभ के लिए दर्द और अशांति को हथियार बनाकर इस क्षेत्र को लगातार अशांति की स्थिति में रखने पर तुले हुए हैं. यह सनकी रवैया न केवल गैर-ज़िम्मेदाराना है. यह ख़तरनाक और पूरी तरह से निंदनीय है.’
पीपुल्स कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष सज्जाद लोन ने भी कहा कि उन्हें नज़रबंद कर दिया गया है.
उन्होंने एक्स पर कहा, ‘मुझे समझ नहीं आ रहा कि इसकी क्या ज़रूरत है. प्रोफ़ेसर साहब एक शांतिवादी थे और सचमुच बहुत पहले सेवानिवृत्त हो चुके थे. एक अंतिम विदाई ऐसी चीज़ है जिसके हम सभी हक़दार थे.’
(इस खबर को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)
