पेंगुइन स्वदेश से हालिया प्रकाशित ‘साहित्य का मनोसंधान’ वरिष्ठ लेखिका मृदुला गर्ग की नवीनतम कृति है, जहां उन्होंने साहित्य और मनोजगत के परस्पर संबंधों के मद्देनज़र साहित्य पर समसामयिक दृष्टि से विचार किया है. लेखिका ने ‘निज दृष्टि से देखे परिवेश के पारंपरिक विवेचन’ के परे जाने का, उससे कुछ भिन्न देख पाने का साहस इन रचनाओं में किया है. इस शृंखला की प्रमुख विशेषता इसकी पठनीयता है जो लेखिका की मान्यताओं से हमारा सहज परिचय करवाती है. इस संग्रह के एक निबंध ‘उपन्यास का समकाल और उपन्यासकार की दृष्टि’ से प्रस्तुत है एक अंश जो उपन्यासों में प्रतिबिंबित होते राष्ट्रीय जीवन के समकाल की विवेचना करता है.
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हर उपन्यास में एक अधूरा सच रहता है. अनेक उपन्यासों को पढ़कर ही हम संपूर्ण सत्य के दर्शन कर सकते है, वह भी अपनी दृष्टि से देखे या स्वयं अर्जित सत्य के. अगर आज हमें रवींद्रनाथ ठाकुर का गोरा और हज़ारी प्रसाद द्विवेदी का बाणभट्ट की आत्मकथा प्रासंगिक लगते हैं, तो इसका मतलब यह नहीं है कि उनमें संपूर्ण सत्य है . मर्म की बात यह है कि, इन दोनों में निजी दृष्टि से देखे सच का स्वरूप, एक दूसरे का पूरक है. न होता तो उनमें से किसी एक का लिखा जाना पर्याप्त था, दूसरे की ज़रूरत नहीं थी.
अस्सी के दशक में नेमीचंद्र जैन ने अपनी आलोचना में लिखा था कि समकालीन उपन्यास की कमी यह है कि वह अधूरे सच को अभिव्यक्ति देता है, संपूर्ण सत्य को नहीं. तभी मैंने कहा था कि जितने उपन्यास अब तक लिखे गए हैं, अधूरे सच को अभिव्यक्त करते हैं. सच का एक अंश ही शाश्वत होता है, बाकी सतत परिवर्तनशील रहता है. कुछ हद तक सच के पूर्ण रूप को साहित्य में पाने के लिए, हमें एक नहीं सैंकड़ों उपन्यास पढ़ने पड़ेंगे.
उससे महत्वपूर्ण एक अन्य तथ्य है. यह कि बाणभट्ट की आत्मकथा में भट्टिनी जो क्रांतिकारी विचार व्यक्त करती है, जैसे जाति व्यवस्था या विभेद का विरोध करना; यह कहना कि हमलावर शक और हून भी इंसान हैं, हमें उनका सामूहिक निरादर नहीं करना चाहिए; वे उपन्यास के समकाल की नहीं, उपन्यासकार के समकाल की उत्पत्ति हैं. कहने का तात्पर्य यह है कि हर कृति में उपन्यासकार का समकाल, उपन्यास के समकाल पर हावी रहता है. बल्कि उसे भी लांघ कर, किसी भावी काल की पूर्व ध्वनि का रूप धारण कर लेता है. इसे ही कहते हैं उपन्यासकार की दृष्टि.
उपन्यास और उपन्यासकार का समकाल एक
गोरा में स्थिति कुछ भिन्न है. उपन्यास और उपन्यासकार का समकाल एक है. रवींद्रनाथ ठाकुर के पात्र उन्हीं के समकाल 1910 के बंगाल में स्थित हैं. बंगाल में तब हिंदू समाज के पासंग ब्राह्म समाज की स्थापना हो चुकी थी, जिसका आधार अधिक उदारवादी और प्रगतिशील था. स्वयं रवींद्रनाथ ठाकुर उसी के सदस्य थे.
उपन्यास गोरा में दोनों समाजों से पात्र हैं. उनके बीच विचार-विमर्श भी चलता है और विरोध वैमनस्य भी है. साथ ही मित्रता और प्रेम संबंध भी बनते बिगड़ते हैं. उपन्यासकार इन सब का सूक्ष्म दृष्टि से विवेचन, चित्रण करता है. पर उसमें एक पात्र ऐसा है, बाणभट्ट की भट्टिनी की तर्ज पर, गोरा की मां आनंदमयी, जो जन्म से हिंदू है और वही रह कर, उसके निर्देशों को नहीं मानती. जाति व्यवस्था में उसका विश्वास नहीं है.
ब्राह्म या अन्य कोई धर्म स्वीकार किए बिना वह हिंदू धर्म में निहित छुआछूत को पास नहीं फटकने देती. उसकी रसोई हर धर्म और जाति के सदस्य के लिए खुली है, वह सबके साथ एक जैसा व्यवहार करती है, सब का समान रूप से स्वागत सत्कार करती है. कह सकते हैं, वह उपन्यासकार के ब्राह्म समकाल से भी अधिक उदार समाज में जीने वाली महिला है.
अंत में गोरा उसी मानसिकता को समादर देते हुए कहता है, ‘जिस मां को मैं खोजता फिर रहा था, वह तो यहीं मेरे कमरे में बैठी हुई थी. तुम्हारी जात नहीं है, तुम ऊंच-नीच का विचार नहीं करतीं, घृणा नहीं करतीं. तुम केवल कल्याण की प्रतिमा हो. तुम मेरा भारतवर्ष हो. अब लछमिया (तथाकथित छोटी जाति की स्त्री) को बुलाओ कि मुझे पानी पिला दे!’
पूंजिवादी और साम्यवादी गुटों की आर्थिक मदद
यदि आज हम सब अपने भीतर वास करने वाली आनंदमयी से साक्षात्कार करने का साहस कर लें तो शायद, अपने पर थोपे जा रहे बहुत से द्वन्द्वों और दुविधाओं से छुटकारा पाने में सफल हो सकें. बहरहाल, चूंकि उपन्यास के समकाल की भाव भूमि, उपन्यासकार के अपने समकाल में आत्म व वाह्य से साक्षात्कार से तैयार होती है, इसलिए दूसरा सवाल यह उठता है कि हमारा, यानी आज के उपन्यासकार का समकाल कब शुरु हुआ.
एक तरह से हम कह सकते हैं कि हमारा समकाल 1962 में शुरु हुआ. आज़ादी के बाद के दस-पंद्रह बरस तो हमने सपने देखते बिता दिए कि अपनी गुट-निरपेक्ष नीति और मिश्रित अर्थ-व्यवस्था के सहारे, हम विश्व गुरु बन गए हैं. हमने विश्व शांति की नींव डाल दी है. पूंजीवादी और साम्यवादी गुटों की आर्थिक मदद से किए विकास की जी.एन.पी की बढ़त दर कुल ढ़ाई प्रतिशत होने पर हमें कोई एतराज़ न था. हम खुद को पिछ्ड़ा मान कर संतुष्ट थे.
चीनी हमले से हमारा मोह भंग तो हुआ पर हमारी विकास दर वही रही. व्यवस्था को बदलने के लिए आंदोलन भी हुए पर कमोबेश हम इस बात पर फ़ख्र करते रहे कि हम एक लोकतांत्रिक देश हैं.
फिर जब 1975 में आपात काल लगा तो वह सपना भी टूट गया. 1976 में वह वापस ज़रूर ले लिया गया पर तब तक सत्तासीनों ने तानाशाही का खून चख लिया था और दिनोंदिन, उसमें इज़ाफ़ा होता रहा. आपात काल में कम-से-कम हम जानते थे कि क्या-क्या हमें नहीं करना.
अब हम जानते ही नहीं कब किस पुस्तक, चित्र, फ़िल्म, वक्तव्य यहां तक कि कार्टून को राष्ट्रविरोधी करार कर दिया जाएगा. जबकि राष्ट्र को अपने तरीके से परिभाषित करने की छूट, एक स्वतंत्र देश में, कम से कम लोकतंत्र में हर नागरिक को होती है. तो कह सकते हैं हमारे समकाल का एक प्रमुख लक्षण असहिष्णुता है.
सवाल उठता है कि क्या पहले हम सहिष्णु थे और अब अचानक असहिष्णु हो गए या सदियों से असहिष्णुता हमारे सामाजिक व्यवहार और वैयक्तिक सोच का हिस्सा रही है?
असहिष्णुता और सहिष्णुता का अजीब घालमेल
मैं समझती हूं, हमेशा से हमारे समाज में असहिष्णुता और सहिष्णुता का अजीब घालमेल रहा है. दूसरे मुल्कों से जो लोग यहां आए, चाहे हमलावरों की तरह या पनाह पाने के लिए, वे रफ़्ता-रफ़्ता स्थानीय लोगों के बीच रच-बस गए. मुग़ल, शक, हून हों या यहूदी, पारसी आदि. किसी को अपने धर्म पालन से रोका नहीं गया.
देश के भीतर भी जब-जब धर्म परिवर्तन हुआ, उसके मानने वाले, जैन, ईसाई, सिख, बौद्ध आदि, समाज के अभिन्न अंग बने रहे. पर विसंगति यह रही कि रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में एक तरफ़ हम एक-दूसरे के धार्मिक त्योहारों में खुल कर भागीदारी करते रहे. दफ़्तर, कला और साहित्य कर्म में मिल कर काम करते रहे; एक दूसरे के मुरीद भी रहे. पर जैसे ही शादी-ब्याह या प्रेम संबंध का सवाल उठा हम ऐसे कतरा जाते, जैसे विधर्मी से प्रेम या विवाह जघन्य अपराध हो. यूं प्रेम से हम हमेशा आतंकित रहे हैं, क्योंकि प्रेम प्रतिरोध की निशानी है और हम हर प्रतिरोध से कन्नी काटते हैं.
सबसे कटु सत्य यह है कि कट्टर जाति व्यवस्था के कारण सदियों से हमारी संस्कृति और समाज, विषमता और उससे उत्पन्न असहिष्णुता से ग्रस्त रहा है. दलितों से हमारा व्यवहार नस्ल वाद की सबसे घिनौनी अभिव्यंजनाओं में से एक है. चूंकि योजनाबद्ध तरीके से उन्हें शिक्षा और मानवीय अधिकारों से वंचित रखा गया, इसलिए पीढ़ी-दर-पीढ़ी उनके और सवर्ण जाति के बीच विषमता बढ़ती गई. इसी तरह की असहिष्णुता स्त्रियों को ले कर भी रही है.
प्रारंभिक शिक्षा हो या बौद्धिक प्रगति; आज़ाद खयाली हो या बेबाक लेखन और सम्भाषण, हम सब से आतंकित रहे हैं और उन्हें प्रतिबंधित करने की हर मुमकिन कोशिश करते आए हैं.
(साभार: पेंगुइन स्वदेश प्रकाशन)
