हमारे छह मौलिक अधिकारों में से स्वतंत्रता का अधिकार आज सबसे ज़्यादा मायने रखने लगा है, क्योंकि आज उसकी हर धारा का उल्लंघन हो रहा है. सत्ता के ख़िलाफ़ मत या विचार को अभिव्यक्ति देने पर आजकल प्रोफेसर, छात्र, पत्रकार, रंगकर्मी तक गिरफ़्तार कर लिए जाते हैं. राज्य की आलोचना करने को देशद्रोह क़रार दिया जाता है.
पुस्तक-अंश: वरिष्ठ लेखिका मृदुला गर्ग की नवीनतम कृति 'साहित्य का मनोसंधान' साहित्य और मनोजगत के संबंधों को केंद्र में रखते हुए साहित्य पर समसामयिक दृष्टि से विचार करती है. वे यह भी जोड़ती हैं कि राष्ट्र को अपने तरीके से परिभाषित करने की छूट, एक स्वतंत्र देश में, कम से कम लोकतंत्र में हर नागरिक को होती है. लेकिन आज हम नहीं जानते कि कब किस पुस्तक, चित्र, फ़िल्म, वक्तव्य यहां तक कि कार्टून को राष्ट्रविरोधी घोषित कर दिया जाएगा.
साठेक बरस पहले तक, नफ़रत, दंगे और हिंसा काफ़ी हद तक रोज़मर्रा की जिंदगी को महफ़ूज़ रहने देते थे. अब तो धार्मिक और वैचारिक भेदभाव, तमाम तबकों और धर्मों के बीच स्थायी नफ़रत और वैमनस्य जगा चुके हैं. महात्मा गांधी के प्रार्थना प्रवचनों से लेकर फेक ख़बरों और बढ़ते प्रदूषण के उदाहरण देते हुए वरिष्ठ कथाकार मृदुला गर्ग एक लम्बे दौर का बड़े आत्मीय स्वर में स्मरण करती हैं.