पुस्तक समीक्षा: सिर्फ़ मुसलमान-कल्याण के ज़रिये लोकतंत्र को बचाया नहीं जा सकता

हिलाल अहमद की नयी किताब के अनुसार, लोकतांत्रिक मूल्यों के संरक्षण की लड़ाई को मुसलमानों को बचाने की ‘एकमात्र’ कार्रवाई तक सीमित कर देने की लिबरल राजनीति हिंदुत्व की उस राजनीति के समान जान पड़ती है जो कहती है कि हिंदू-राष्ट्र के रास्ते में ‘एकमात्र’ रोड़ा भारत के मुसलमान हैं. 

(फोटो साभार: सोशल मीडिया)

प्रोफ़ेसर हिलाल अहमद की नई किताब, ‘ए ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ द प्रेजेंट: मुस्लिम्स इन न्यू इंडिया’, देश के हालिया दशकों की सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियों पर गहरी अंतर्दृष्टि देती है. 

नई दिल्ली स्थित सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज (सीएसडीएस), में कार्यरत हिलाल अहमद की ये किताब मात्र ढाई-सौ पन्नों में दक्षिणपंथी सरकार की मूल प्रवृत्तियों का खाका खींच देती है.

देश की वर्तमान परिस्थिति की जड़ों को बीते समय में टटोलेने की बजाय, यह किताब न्यू इंडिया से उठती हुई भाप को न्यू इंडिया में ही गढ़े गए नए संदर्भों के माध्यम से भांपने की वकालत करती है.

इस तरह यह किताब बने-बनाए अकादमिक सिद्धांतों के माध्यम से भारत में मुस्लिम समुदाय की स्थिति को समझाने की बजाय, उन सांचों को खोलती है जिन्हें दक्षिणपंथी शासन ने पिछले सालों में गढ़ा है. 

भाजपा संचालित हिंदुत्व की अवधारणा

ये किताब वर्तमान समय को ‘अमृत काल’ कहकर संबोधित करने या संविधान द्वारा अधिकार प्राप्त नागरिकों को ‘लाभार्थी’ कहने या फिर ‘सबका-साथ, सबका-विकास’ जैसे नारों तले भारत की विविधता को पाटने जैसे भाजपाई हथकंडों पर रोशनी डालती है.

इस क्रम में ये किताब न सिर्फ भगवा रणनीति को निशाने पर लेती है, बल्कि उन लिबरल राजनेताओं का भी पर्दाफाश करती है जो हाशिए पर पड़े मुस्लिम समुदाय की पैरोकारी करने की आड़ में हिंदुत्व की अवधारणा को मजबूत करते रहे हैं. 

लेखक हमें दिखाता है कि हिंदुत्व के इस दौर में, अकादमिक जगत की सोच के उलट इतिहास लेखन का काम मात्र संग्रहालय में रखे ठस पुरालेखों तक ही सीमित नहीं रह गया है.

हिंदुत्व पुरालेखों की ‘रेशनालिटी’ से आगे जाकर जनता की ‘रोमांचक’ धारणाओं को वॉट्सऐप यूनिवर्सिटी के माध्यम से साधते हुए अकादमिक इतिहास से कहीं ज्यादा बड़ा नैरेटिव गढ़ रहा है.

लेखक का दुख ये है कि इतिहास के लेखन हेतु गूढ़ पुरालेखों को संरक्षित करने का स्वप्न देखने वाले वर्ग को उन ‘रोमांचक’ धारणाओं की कोई सुध ही नहीं है जिनके सहारे हिंदुत्व की राजनीति उफ़न रही है. 

इसके साथ लेखक हिंदुत्व की समस्याओं से निजात पाने के लिए कुछ नुस्खें भी सुझाता चलता है. 

मसलन, ‘अमृत काल’ की अवधारणा. परीक्षार्थी का परीक्षा में मूल्यांकन हो जाने के बाद घोषणा की जा सकती है कि परीक्षार्थी का स्तर क्या है.

लेकिन हिंदुत्व ने भाजपा सरकार का मूल्यांकन होने के पहले ही इस समय को ‘अमृत-काल’ के रूप में प्रचलित कर दिया है.

इसके बाद प्रोफ़ेसर हिलाल प्रश्न पूछते हुए प्रतीत होते हैं कि जैसे नब्बे के दशक में सामाजिक-न्याय की राजनीति करने वाली पार्टियों ने ‘बहुजन’ अवधारणा के सहारे दलित-पिछड़ों को गोलबंद कर लिया था, क्या वैसे ही वर्तमान में दलित-पिछड़े-मुसलमान हिंदुत्व के खिलाफ गोलबंद हो पाएंगे?

हाशिए के समुदायों की ऐसी गोलबंदी तभी संभव है जब लिबरल राजनेता हिंदुत्व की मार से मुसलमानों को बचाने की गतिविधि को लोकतंत्र को बचाने की सबसे जरूरी कार्रवाई बताकर परोसना बंद कर दें.

 यह किताब कहती है कि लोकतांत्रिक मूल्यों के संरक्षण की लड़ाई को मुसलमानों को बचाने की ‘एकमात्र’ कार्रवाई तक सीमित कर देने की लिबरल राजनीति हिंदुत्व की उस राजनीति के समान जान पड़ती है जो कहती है कि हिंदू-राष्ट्र के रास्ते में ‘एकमात्र’ रोड़ा भारत के मुसलमान हैं. 

प्रोफ़ेसर हिलाल का तर्क है कि भारतीय मुसलमानों की तथाकथित भलाई के लिए उन्हें एकरूपी समुदाय बताकर परिभाषित करने की लिबरल राजनीति से हिंदुत्व की उस अवधारणा को बल मिलता है जिसके तहत भारत के मुसलमानों को झुंड बनाकर रहने वाले आक्रांता के रूप में देखा जाता रहा है.

अगर हमें भारत में लोकतंत्र के गिरते हुए स्तर को सही से नापना है तो इसे मुसलमानों पर पड़ने वाली मार या मुसलमानों को मिलने वाले पुरस्कारों की संख्या के स्केल पर नहीं नापा जा सकता. भारत के लोकतंत्र के बदलते मिजाज का आकलन भारत के लोगों की बदलती हुई धार्मिकता से किया जाना चाहिए.

न्यू इंडिया की ये नई धार्मिकता कभी हमें गांव-देहात में बढ़ते हुए बाबाओं के नेटवर्क, या कभी शहरों में स्ट्रीट डॉग्स की वकालत में गोलबंद हुए लोगों या फिर कभी किसी क्रिकेट स्टेडियम में भारत की टीम के पक्ष में नारे लगाती हुई दर्शकों की भीड़ में नजर आती है. 

(आलोक राजपूत सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज (सीएसडीएस) में शोधार्थी हैं.)