‘बुलडोज़र’ जस्टिस: कैसे भाजपा सरकारों ने निर्माण में इस्तेमाल होने वाली मशीन को सामूहिक दंड के प्रतीक में बदला

बीते कुछ सालों में भाजपा शासित राज्यों ने जेसीबी बुलडोज़र को बदले की कार्रवाई के एक साधन में बदल दिया है. इसकी शुरुआत 2020 में उत्तर प्रदेश से की गई और जल्द ही यह बीमारी अन्य भाजपा के नेतृत्व वाली राज्य सरकारों तक तेज़ी से फैल गई. जेसीबी हिंदू राष्ट्रवाद का प्रतीक बन गई, जिसका इस्तेमाल भाजपा और उसके समर्थक मुसलमानों को डराने और ख़ुद को विजेता साबित करने के लिए करते हैं.

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खरगोन में हुई बुलडोज़र कार्रवाई. (फोटो साभार: ट्विटर)

पिछले पांच सालों में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) शासित राज्यों ने जेसीबी बुलडोज़र को बदले की कार्रवाई के एक टूल में बदल दिया है. बिना किसी नोटिस या सुनवाई के मुसलमानों के घरों, दुकानों और धार्मिक जगहों को तोड़ दिया जाता है. यही तरीक़ा 2023 में हरियाणा के नूंह में भी अपनाया गया, मगर इस बार थोड़ा और भयावह ढंग से. पक्षपातपूर्ण पुलिसिंग और सामूहिक दंड के प्रमाणों के बीच उचित प्रक्रिया को दरकिनार करते हुए पूरे देश में ऐसी कार्रवाई की जा रही है. नवंबर 2024 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा लगए गए प्रतिबंध के बावजूद भाजपा सरकारें संवैधानिक सुरक्षा उपायों को दरकिनार करते हुए इस ‘बुलडोज़र न्याय’ को जारी रखे हुए है.

छह लेखों की श्रृंखला का यह चौथा लेख यह बताता है कि कैसे निर्माण के एक औजार को सामूहिक दंड के प्रतीक में बदल दिया है . इस श्रृंखला का पहला, दूसरा और तीसरा लेख यहां पढ़ सकते हैं.

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नई दिल्ली: यूं तो बदले की कार्रवाई और राजनीतिक हथियार के तौर पर 2020 में उत्तर प्रदेश में बुलडोज़र का इस्तेमाल शुरू हुआ, जल्द ही यह बीमारी भारतीय जनता पार्टी (भापजा) की सरकार वाले राज्यों में तेज़ी से फैल गई. अगस्त 2023 में यह कार्रवाई अपने चरम पर पहुंच गई, जब हरियाणा के नूंह में चार दिनों में बुलडोज़र ने 50 किलोमीटर के इलाक़े में 500 से 1,250 मकान-दुकान गिरा दिए, जिनमें से लगभग सभी मसलमानों के थे.

उस दौरान जब मैं नूंह गया, और कई बार गया, तो मुझे वहां का नज़ारा किसी जंग के मैदान जैसा लगता था. जम्मू-कश्मीर के बाहर भारत के सबसे अधिक मुसलमान आबादी वाले ज़िलों में से एक, नूंह के लोगों में बहुत ज़्यादा ग़ुस्सा और निराशा थी. सरकार के थिंक टैंक नीति आयोग ने 2017 में इसे देश का सबसे पिछड़ा ज़िला बताया था.

गौ रक्षक समूहों ने दो अलग-अलग घटनाओं (यहां और यहां) में गोहत्या के शक में तीन लोगों को मार डाला, जिसके बाद तनाव बढ़ गया. घटना के वीडियो में साफ था कि बजरंग दल के कई जाने-माने कार्यकर्ता इसमें शामिल थे, लेकिन इसके बाद कुछ ही गिरफ़्तारियां हुईं. बजरंग दल के नेता मोनू मानेसर ने मुसलमानों के ख़िलाफ़ भद्दी गालियों से भरा वीडियो पोस्ट करके नूंह आने का ऐलान किया, जिसके बाद हथियारबंद हिंदू कट्टरपंथियों से भरी बसें वहां पहुंच गईं.

31 जुलाई 2023 को दोपहर के आस-पास भड़की हिंसा में छह लोग मारे गए, जिनमें तीन हिंदू, दो मुस्लिम और एक सिख थे. यह हिंसा एक हिंदू उग्रवादी संगठन, विश्व हिंदू परिषद के धार्मिक जुलूस के बाद हुई थी जो नूंह से गुज़रा था. जिस जुलूस में तलवारें और बंदूक़ें लिए हिंदू कट्टरपंथी घुस आए थे. हिंसा दिल्ली तक पहुंच गई थी. दोनों समुदायों के दंगाइयों ने गाड़ियां और दुकानें जला दीं. 2 अगस्त को नूंह में एक मस्जिद में आग लगा दी गई.

फिर सरकार ने दख़ल दिया, नाबालिगों समेत लगभग 150 मुसलमानों को हिरासत में लिया और मुसलमानों के मकानों-दुकानों को गिरा दिया.

नूंह शहर में, चार मंज़िला होटल समेत कम से कम 30 पक्की इमारतों के साथ-साथ मेडिकल स्टोर, स्वचालित बिक्री मशीन और रिपेयर की दुकानें भी गिरा दी गईं. स्क्रोस के रिपोर्टर्स ने 50 किलोमीटर दूर टौरू, नल्हर, नगीना और फ़िरोज़पुर झिरका जैसे गांवों में मुसलमानों के घरों, गैरेज, फ़ार्मेसी, लैब, स्टोर, खाने की जगहों और बेकरी को निशाना बनाकर की गई तोड़-फोड़ को डॉक्यूमेंट किया है- जिनमें से कई सरकारी स्कीम के तहत बनी थीं.

कुछ मामलों में तो लोगों को सिर्फ़ 10 मिनट का नोटिस मिला.

जुलाई 2023 में हरियाणा के नूंह में हुई सांप्रदायिक हिंसा के बाद क्षेत्र में हुई ध्वस्तीकरण कार्रवाई. (फोटो: सबा गुरमत)

दंगाइयों के ख़िलाफ़ कार्रवाई- और हाईकोर्ट

जैसे ही हरियाणा में भाजपा सरकार ने कथित दंगाइयों को गिरफ़्तार करना शुरू किया और उनकी दुकानों को ‘अवैध निर्माण’ बताकर गिराना शुरू किया, तब पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने स्वत: संज्ञान लेते हुए तोड़-फोड़ पर रोक लगा दी, और सवाल किया कि क्या ‘क़ानून-व्यवस्था की समस्या की आड़ में किसी ख़ास समुदाय की इमारतों को गिराया जा रहा है’ और क्या राज्य ‘जातीय सफ़ाए की कोशिश’ कर रहा है.

हाईकोर्ट द्वारा संज्ञान लेने के तीन दिन बाद 11 अगस्त को अगली सुनवाई से पहले जस्टिस जीएस संधावालिया और जस्टिस हरप्रीत कौर जीवन की बेंच को बदल दिया गया और उनकी जगह जस्टिस अरुण पल्ली और जस्टिस जगमोहन बंसल की बेंच को इस मामले की सुनवाई का ज़िम्मा दे दिया गया.

आर्टिकल 14 की रिपोर्ट के मुताबिक़, गिरफ़्तार किए गए लोगों में मुसलमानों की संख्या बहुत अधिक थी इसलिए बदले की कार्रवाई या झूठे मामलों में फंसाए जाने के डर से कई मुसलमानों ने शिकायत दर्ज नहीं कराई.

देश भर में इस तरह की तोड़-फोड़ उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के पैटर्न पर ही की गई, जहां राज्यों ने अतिक्रमण विरोधी क़ानूनों का हवाला दिया, लेकिन 2020 में भारत के नए नागरिकता क़ानून के ख़िलाफ़ हुए विरोध प्रदर्शनों के बाद मुसलमानों की संपत्तियों को ज़्यादा नुक़सान पहुंचाया गया. इस प्रकार की कार्रवाइयों की विशेष रूप से इसलिए आलोचना की गई क्योंकि मुसलमानों को चुन-चनकर निशाना बनाया गया था.

आर्टिकल 14 की रिपोर्ट के अनुसार, तोड़-फोड़ की असली वजह 2022 में बनी, जब चार भाजपा शासित राज्यों में कई महीनों तक हिंदू कट्टरपंथियों द्वारा भड़काए गए सांप्रदायिक दंगों के बाद बहुत संपत्तियों को तोड़ दिया गया जिनमें से लगभग सभी मुसलमानों की थीं.

इस तरह की तोड़-फोड़ की कार्रवाई जेसीबी बुलडोज़र द्वारा की जाती हैं. जोसेफ़ सिरिल बैमफ़ोर्ड एक्सकेवेटर्स लिमिटेड नाम की कंपनी ये बुलडोज़र बनाती है इसीलिए कंपनी के नाम पर इसका नाम जेसीबी रखा गया है. बुलडोज़र नागरिकों को कई अधिकारों से वंचित करता है, जिसमें सुनवाई का बुनियादी अधिकार भी शामिल है. ज़्यादातर मामलों में कोई नोटिस नहीं दिया गया, जैसा कि कई क़ानूनों में ज़रूरी है और कई कोर्ट के फ़ैसलों से भी इसकी पुष्टि होती है.

पुलिस द्वारा दर्ज किए गए केस में एकतरफ़ा जांच और क़ानूनी कार्रवाई का एक ही तरीक़ा अपनाया जाता है, जिसमें अक्सर ऐसे सबूत पेश किए जात हैं जो प्रमाणिक नहीं होते हैं.

नूंह में तोड़-फोड़ के एक साल बाद भी बजरंग दल के कार्यकर्ता की हत्या के आरोपी एक अंडरग्रेजुएट स्टूडेंट और नौ दूसरे मुस्लिम लोग भारत के आतंकवाद-विरोधी क़ानून के तहत जेल में बंद हैं, जबकि उनके ख़िलाफ़ दिए गवाहों के बयान आपस में मेल नहीं खाते हैं. दो महीने तक आर्टिकल 14 द्वारा की गई जांच में पता चला कि गवाहों ने अलग-अलग बयान दिए हैं, उनके क़बूलनामे जैसे कॉपी-पेस्ट हों और आतंकी समूह अल क़ायदा के साथ संबंधों के बेबुनियाद दावे किए गए.

प्रतीकात्मक तस्वीर.

सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की अवहेलना

बार-बार और बड़े पैमाने पर होने वाले तोड़फोड़ के बाद सुप्रीम कोर्ट ने 9 नवंबर 2024 को पहले से नोटिस और बिना सुनवाई के तोड़फोड़ पर रोक लगा दी, और इसे ग़ैर-क़ानूनी माना. फिर भी तोड़फोड़ जारी रही, जिसके कारण अवमानना नोटिस (यहां, यहां और यहां) जारी किए गए.

उदाहरण के लिए, महाराष्ट्र में पुलिस ने एक मुस्लिम परिवार की कबाड़ की दुकान को इस शिकायत के बाद तोड़ दिया कि किशोर उम्र के उनके बेटे ने क्रिकेट मैच के दौरान पाकिस्तान के समर्थन में जश्न मनाया.

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद जो तोड़फोड़ हुई वह सिर्फ़ भाजपा शासित राज्यों तक ही सीमित नहीं थी. आम आदमी पार्टी शासित पंजाब में सरकार ने ड्रग बेचने वाले संदिग्धों का घर तोड़ दिया. सरकार का यह दावा था कि ड्रग के पैसे से ही ये घर बनाए गए थे.

उत्तर प्रदेश के हाटा में प्रबंधन की बात सुने बिना एक मस्जिद का एक हिस्सा तोड़ दिया गया. संभल में बिना नोटिस दिए ही एक मुसलमान परिवार की फ़ैक्ट्री पर ऐसी ही कार्रवाई की गई.

सन 2025 के जनवरी महीने में गुजरात के बेयत द्वारका में 250 से ज़्यादा मुस्लिम घरों, मस्जिदों और दरगाहों को तोड़ दिया गया, जिससे बहुते मछुआरे बेघर हो गए, जबकि उनके हिंदू पड़ोसियों के घरों को छोड़ दिया गया. एक महीने बाद कुशीनगर की दशकों पुरानी मस्जिद को गिरा दिया गया.

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के पांच महीने बाद, अहमदाबाद की चंदोला झील में बड़े पैमाने पर लोगों को बेघर किया गया. अधिकारियों ने सुबह 3 बजे 4,000 कच्चे मकानों को गिरा दिए और 219 महिलाओं तथा 214 बच्चों सहित 890 लोगों को हिरासत में लिया.

अधिकारियों ने इस अभियान को 22 अप्रैल को पहलगाम में हुए आतंकी हमले से जोड़ा. जिस हमले में 26 पर्यटक मारे गए थे, जिनमें से कुछ गुजरात के रहने वाले थे. पुलिस डिप्टी कमिश्नर ने दावा किया कि झील में ‘बांग्लादेशी एलियंस और देश विरोधी तत्व’ पनाह लेते हैं, जिसमें अल-क़ायदा मॉड्यूल भी शामिल है.

गुजरात हाईकोर्ट ने झील को एक नोटिफ़ाइड जल क्षेत्र बताते हुए तोड़फोड़ पर रोक लगाने से इनकार कर दिया और नोटिस या पुनर्वास से सरकार को छूट दे दी.

उत्तर प्रदेश में 2025 में पीलीभीत, श्रावस्ती, बलरामपुर, बहराइच, लखीमपुर खीरी, सिद्धार्थनगर और महाराजगंज जैसे नेपाल-बॉर्डर से लगे ज़िलों में 250 से ज़्यादा संरचनाओं को गिरा दिया गया, जिनमें मस्जिदें, मदरसे और मज़ार या दरगाह शामिल थे. अकेले श्रावस्ती में सरकारी और निजी ज़मीन पर बने 149 इमारतें ध्वस्त कर दी गईं. लखनऊ में एक मदरसे और दूसरी संपत्ति को निशाना बनाया गया.

उत्तराखंड के काशीपुर में कुंडेश्वरी स्थित पांच मज़ारों को भारी पुलिस सुरक्षा के बीच ढहा दिया गया. अधिकारियों का दावा था कि ये मज़ार सरकारी ज़मीन पर ग़ैर-क़ानूनी तरीक़े से बनाए गए थे.

क्लेरियन इंडिया ने वहां रहने वाले मोहम्मद रिज़वान के हवाले से लिखा है, ‘ये मज़ारें दशकों से यहां हैं… वे हमारी पहचान का हिस्सा थीं.’ सोशल वर्कर परवीन अहमद ने कहा, ‘यह इंसाफ़ नहीं है, यह मुसलमान होने की सज़ा है.’

सरकारी रिकॉर्ड से पता चला कि 2024-25 में उत्तराखंड में 537 मुस्लिम धार्मिक इमारतों को गिरा दिया गया.

उत्तराखंड के रामनगर में एक कॉलेज ग्राउंड में स्थित मज़ार को इसलिए हटा दिया क्योंकि उससे छात्रों का ध्यान बंटता था.

छत्तीसगढ़ में, अधिकारियों ने जंगल में रहने वाले 60 मुस्लिम परिवारों को वहां निकाल दिया जबकि उनके हिंदू पड़ोसियों को छोड़ दिया. बरेली में, ‘आई लव मोहम्मद’ पोस्टरों पर हुई झड़प के बाद एक मुस्लिम शादी हॉल पर बुलडोज़र चला दिया गया.

हुजूर भाजपा विधायक रामेश्वर शर्मा द्वारा लगवाया गया एक होर्डिंग. (फोटो साभार: ट्विटर/@Krashanpal4BJP)

तोड़-फोड़ के ज़रिए तुरंत न्याय

दूसरे राज्यों ने भी सुप्रीम कोर्ट के आदेश को खुलेआम नज़रअंदाज़ किया, और 2025 में मुसलमानों द्वारा कथित अपराधों के लिए उनके मकानों-दुकानों को तोड़-फोड़कर तुरंत सज़ा दी गई.

राजस्थान के जैसलमेर में तस्करी का विरोध करने वाले एक हिंदू किसान की हत्या के आरोपी लोगों की पांच दुकानें गिरा दी गईं. ब्यावर में, यौन उत्पीड़न के आरोपों के बाद एक मस्जिद और क़ब्रिस्तान सहित पूरे मुस्लिम मोहल्ले को नोटिस जारी किए गए.

उत्तर प्रदेश के मेरठ में एक हाउसिंग प्रोजेक्ट को आंशिक रूप से इसलिए गिरा दिया गया क्योंकि वहां सिर्फ़ मुसलमानों को घर बेचने और अंदर एक मस्जिद होने का दावा किया गया था. मध्य प्रदेश के सीहोर में ईसाई धर्म अपनाने के आरोप में एक व्यक्ति के घर को गिरा दिया गया.

भोपाल में तथाकथित लव जिहाद के एक मामले में तीन मुसलमान व्यक्तियों के घरों को निशाना बनाया गया. उज्जैन में एक गर्भवती गाय को कथित तौर पर मारने के आरोप में सात मुसलमान लोगों को सबके सामने पीटा गया और उनके घरों को गिरा दिया गया.

ये सभी मामले एक राष्ट्रीय पैटर्न को दर्शाते हैं जहां ट्रायल को नज़रअंदाज़ करके घरों को गिराया गया. ‘बुलडोज़र न्याय’ के तहत योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली उत्तर प्रदेश सरकार में 2024 से पहले से ऐसा किया जा रहा है. अब कोर्ट के द्वारा लगाए गए प्रतिबंध के बावजूद दूसरी जगहों पर भी ऐसी ही कार्रवाई होने लगी है.

(प्रतीकात्मक फोटो: पीटीआई)

जेसीबी की भूमिका

मुसलमानों को सज़ा देने के लिए खुदाई करने वाली कई मशीनें और बुलडोज़र इस्तेमाल किए गए हैं, लेकिन सबसे बड़ा हथियार वह ब्रांड रहा है जिसे अब जेसीबी के नाम से जाना जाता है. यह एक ब्रिटिश कंपनी है जो दुनिया के कई देशों में अपना कारोबार करती है. जेसीबी हिंदू राष्ट्रवाद का प्रतीक बन गया है, जिसका इस्तेमाल भाजपा और उसके समर्थक मुसलमानों को डराने और ख़ुद को विजेता साबित करने के लिए करते हैं.

2022 में, दिल्ली की जहांगीराबाद झुग्गी में बंगाली मुसलमानों के घर गिराए जाने के बाद भाजपा प्रवक्ता जीवीएल नरसिम्हा राव ने ट्वीट किया- फिर डिलीट कर दिया- कि जेसीबी का मतलब ‘जिहाद कंट्रोल बोर्ड’ है.

2024 में, 120 से ज़्यादा लेखकों ने जेसीबी से अपील की कि वो एक साहित्य पुरस्कार के लिए वो अपनी स्पॉन्सरशिप ख़त्म करे, और कंपनी पर मुसलमानों के ख़िलाफ़ ‘बुलडोज़र न्याय’ से जुड़े होने का दिखावा करने का आरोप लगाया.

साउथ एशिया सॉलिडेरिटी ग्रुप की जनवरी 2025 की रिपोर्ट, ‘स्टॉप JCB’s बुलडोज़र जेनोसाइड’, में मुस्लिम घरों पर हमले में जेसीबी की मिलीभगत के बारे में विस्तार से बताया गया है. इसमें जेसीबी चेयरपर्सन एंथनी बैमफ़ोर्ड यूके की कंज़र्वेटिव पार्टी से संबंध और जहांगीरपुरी की घटना के कुछ दिनों बाद बोरिस जॉनसन द्वारा 2022 में जेसीबी पर खड़े होकर कराया फ़ोटोशूट चर्चा में रहा था.

एमनेस्टी इंटरनेशनल की फरवरी 2024 की रिपोर्ट ने 63 में से 33 तोड़-फोड़ में जेसीबी मशीनों के इस्तेमाल की पुष्टि की. ग्रुप ने तर्क दिया कि हिंदुत्व की ताक़त दिखाने के बाद मुसलमानों को निशाना बनाकर न्यायिक प्रक्रिया को परे रखकर सज़ा देने में अपनी भूमिका के कारण जेसीबी ने ह्यूमन राइट्स ड्यू डिलिजेंस क़ानूनों का उल्लंघन किया. देश भर में, ऐसे कामों का दूसरा नाम जेसीबी बन गया, जिसका इस्तेमाल 2017 से दो दर्जन से ज़्यादा राज्यों में किया गया है.

एमनेस्टी ने बताया कि जेसीबी मशीनों के बड़े पैमाने पर इस्तेमाल से पता चलता है कि इन उद्देश्यों के लिए जेसीबी ‘पसंदीदा ब्रांड’ है, और यह भी बताया कि पीड़ितों के लिए जेसीबी ख़ुद में बुलडोज़र का पर्याय बन गया है.

(हर्ष मंदर सामाजिक कार्यकर्ता और लेखक है. लेख के लिए उमैर ख़ान ने शोध सहायता की है. इस लेख के लिए डायसपोरा इन एक्शन फॉर डेमोक्रेसी एंड ह्यूमन राइट्स से सहयोग मिला है.)

(मूल अंग्रेज़ी से ज़फ़र इक़बाल द्वारा अनूदित. ज़फ़र भागलपुर में हैंडलूम बुनकरों की ‘कोलिका’ नामक संस्था से जुड़े हैं.)