दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ (डूसू) चुनाव के परिणाम हाल ही में आए हैं. छात्रसंघ के नवनिर्वाचित उपाध्यक्ष राहुल झांसला के समर्थकों और उनके साथियों को चुनाव के दौरान ही दिल्ली पुलिस द्वारा जबरदस्ती उठाकर तिहाड़ जेल भेज दिया गया.
संदीप यादव और भूपिंदर यादव को तिहाड़ जेल में अपनी रातें बितानी पड़ीं. विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश की राष्ट्रीय राजधानी में हो रहे देश के सबसे बड़े छात्रसंघ चुनाव की यह स्थिति है. यह दर्शाता है कि हुकूमत डरती है कि भारत के छात्र युवा नेपाल के ज़ेन-ज़ी की राह पर ना बढ़ जाएं.
इतिहासकार एरिक होब्सबाम ने ‘रेवोल्यूशनरीज’ में टिप्पणी की है कि छात्र, एक समुदाय के रूप में, अक्सर उग्र विचारों के प्रति खुले होते हैं और परिवर्तन के लिए संगठन बना सकते हैं. विश्वविद्यालय शिक्षा और आलोचनात्मक चिंतन के केंद्र के रूप में काम करते हैं.
ये संस्थान युवाओं को नए विचारों से परिचित कराते हैं, उन्हें वर्तमान स्थिति पर सवाल उठाने के लिए प्रेरित करते हैं और सामाजिक न्याय, समानता और राजनीतिक परिवर्तन पर चर्चा को बढ़ावा देते हैं. अगर दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रसंघ चुनाव की यह स्थिति है, तो इलाहाबाद विश्वविद्यालय, पटना विश्वविद्यालय और पंजाब विश्वविद्यालय चंडीगढ़ की क्या स्थिति होगी, यह आसानी से समझा जा सकता है.
हाल ही में हुए छात्र संघ चुनावों में पंजाब यूनिवर्सिटी और पटना यूनिवर्सिटी दोनों में महत्वपूर्ण परिणाम देखने को मिले. पंजाब यूनिवर्सिटी में एबीवीपी ने पहली बार अध्यक्ष पद जीता. वहीं, पटना यूनिवर्सिटी में पहली बार कोई महिला उम्मीदवार छात्र संघ अध्यक्ष (वो भी एबीवीपी से) बनीं.
यह स्थिति लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी है और छात्रों के अधिकारों के हनन का उदाहरण है.
दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ का निर्माण
दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ का निर्माण सन 1947 में देश की आज़ादी के समय ही हुआ था, जब समस्त कॉलेजों को एक किया गया. उसके बाद से डूसू ने छात्रों के मसलों पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई, देश के बड़े छात्र आंदोलनों का नेतृत्व किया और देश को बड़े नेता दिए.
दिल्ली की वर्तमान मौजूदा मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता डूसू की अध्यक्ष रही हैं, इसलिए भी उन्होंने इस चुनाव को अपनी नाक का सवाल बना लिया था.
डूसू चुनाव से पहले इलाहाबाद विश्वविद्यालय पर भी निगाह डालें, जहां से मैं अंतिम छात्रसंघ उपाध्यक्ष बनकर आया हूं. 2019 में छात्र संघ की जगह जब छात्र परिषद लागू किया गया तब वहां के छात्रों ने नामांकन न भर कर पूरी छात्र परिषद का बहिष्कार किया और अपने आंदोलन की मौजूदगी दर्ज कराई.
अलग रहा छात्र संघ का चुनाव
दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ का चुनाव इस बार भिन्न था. दिल्ली उच्च न्यायालय के द्वारा लगी रोक के बाद आपको बैनर, पोस्टर, उड़ती हुई पर्चियां नॉर्थ कैंपस में देखने को नहीं मिलीं. हर जगह बैरिकेड्स लगे थे. इस चुनाव में उम्मीदवारों की जाति, क्षेत्र और छात्रों से जुड़े मसले भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे थे.
इंडिया गठबंधन के छात्र संगठन और एनएसयूआई सिर्फ एबीवीपी से ही नहीं लड़ रहे थे, बल्कि एक शक्तिशाली तंत्र से भी लड़ रहे थे, जिसमें देश के संवैधानिक संस्थाओं के प्रमुख लोग, दिल्ली के मुख्यमंत्री, मंत्री, पुलिस प्रशासन और डीयू का प्रशासन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद को चुनाव जिताने में लगे हुए थे.
क्या यही तंत्र चुनावों के परिणाम प्रभावित करता है, या छात्रों के असल मुद्दे, जैसे बढ़ती फीस, चार सालों का स्नातक प्रोग्राम (एफवाईयूपी), पेपर लीक, महिला सुरक्षा और कैंपस इंफ्रास्ट्रक्चर?
छात्रों के मुद्दे उठाने में जो छात्र संगठन सक्रिय थे, उनकी पहुंच क्यों कमजोर हो रही है?
डूसू चुनावों में मतदान प्रतिशत:
| वर्ष | प्रतिशत (%) | विजयी प्रत्याशी (अध्यक्ष) | संगठन |
| 2011 | 32 | अजय छिकारा (जाट) | NSUI |
| 2012 | 40 | अरुन हुड्डा (जाट) | NSUI |
| 2013 | 43.3 | अमन अवाना (गुर्जर) | एबीवीपी |
| 2014 | 44.4 | मोहित नागर (गुर्जर) | एबीवीपी |
| 2015 | 43 | सतेंदर अवाना (गुर्जर) | एबीवीपी |
| 2016 | 37 | अमित तंवर (गुर्जर) | एबीवीपी |
| 2017 | 42.8 | रॉकी तुसीद (जाट) | NSUI |
| 2018 | 44.5 | अंकिव बासोया (गुर्जर) | एबीवीपी |
| 2019 | 40 | अक्षित दाहिया (जाट) | एबीवीपी |
| 2023 | 42 | तुषार डेढ़ा (गुर्जर) | एबीवीपी |
| 2024 | 35 | रौनक खत्री (जाट) | NSUI |
| 2025 | 39.5 | आर्यन मान (जाट) | एबीवीपी |
इस बार प्रत्याशियों को विभिन्न पदों पर पड़े मत:
| पद | उम्मीदवार | पार्टी | वोट्स |
| अध्यक्ष | आर्यन | अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) | 28,841 |
| जोशलिन | एनएसयूआई (NSUI) | 12,645 | |
| उमांशी लांबा | स्वतंत्र (IND) | 5,522 | |
| अंजलि | AISA-SFI | 5,385 | |
| नोटा | – | 3,175 | |
| उपाध्यक्ष | राहुल यादव | एनएसयूआई (NSUI) | 29,339 |
| गोविंद तंवर | अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) | 20,547 | |
| सोहन यादव | AISA-SFI | 4,163 | |
| नोटा | – | 5,820 | |
| सचिव | कुणाल चौधरी | अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) | 23,779 |
| कबीर गिरसा | एनएसयूआई (NSUI) | 16,117 | |
| अभिनंदना प्रत्याशी | AISA-SFI | 9,538 | |
| नोटा | – | 7,365 | |
| संयुक्त सचिव | दीपिका झा | अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) | 21,825 |
| लवकुश भड़ाना | एनएसयूआई (NSUI) | 17,380 | |
| अभिषेक कुमार | AISA-SFI | 8,425 | |
| नोटा | – | 7,314 |
आंकड़े दिल्ली विश्वविद्यालय की वेबसाइट से हैं.
दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ का चुनाव एक ऐसे दौर में संपन्न हुआ है जहां एक तरफ नेपाल में छात्र (ज़ेन-ज़ी) आंदोलित होकर सड़कों पर उतरे और केपी शर्मा ओली की सरकार को गिरा दिया, तो वहीं दूसरी तरफ पंजाब विश्वविद्यालय छात्रसंघ के चुनाव में एबीवीपी पहली बार अध्यक्ष पद का चुनाव जीत जाती है.
इसलिए दिल्ली में एनएसयूआई को उपाध्यक्ष पद पर मिली जीत के मायने तभी हैं, जब वह छात्रों के मुद्दों को लेकर छात्रों के बीच पूरे वर्ष रहती है और उनकी आवाज़ उठाती है. तभी इसकी संगठन की सार्थकता सिद्ध होगी.
(लेखक जेएनयू के सेंटर फॉर हिस्टॉरिकल स्टडीज के शोधार्थी हैं और एनएसयूआई से जुड़े हैं.)
