उत्तर भारत में एक कहावत है, ‘सब धाम बार बार, गंगासागर एक बार.’ इसकी दो व्याख्या हैं. पहली, यह कहावत सुदूर, दुर्गम गंगासागर पहुंचने की कठिनाई का द्योतक है. दूसरी, यह कहावत इच्छा व्यक्त करती है कि मृत्यु के उपरांत गंगा के माध्यम गंगासागर पहुंच कर मोक्ष प्राप्त हो.
सितंबर 2025 का तीसरा दिन, खंडित नीले आकाश में घुमड़ते ऊंचे काले बादलों के तले हमारी नाव लॉट 8 को छोड़ मुड़ी-गंगा नदी के मटमैले बहाव के पार सागर द्वीप की ओर बढ़ चली. नाव के एक कर्मी ने कहा, ‘देरी होय जाच्चे. भाटा आरंभो होय जाबे (देर हो रही है. अब नदी में भाटा आ जाएगा (और नाव नहीं चल सकेगी)).’
अगर गंगासागर मोक्ष का द्वार है तो काकद्वीप स्थित लॉट 8 गंगासागर का दरवाज़ा. कलकत्ता से चलकर करीब 80 किलोमीटर रास्ता तय करने के उपरांत पहले आप यहां पहुंचते हैं और फिर नदी के विस्तीर्ण पाट को नाव से पार कर कोचूबेरिया घाट पर सागर द्वीप का स्पर्श करते हैं. वहां से फिर दक्षिणमुखी रास्ते पर सीधा चलते हुए आप द्वीप के अंतिम छोर पर स्थित गंगासागर गांव पहुंचते हैं. इसी जगह पर गंगा का समुद्र में विलय हो जाता है तथा यहीं स्थित है कपिल मुनि का मंदिर जो किसी युग में उनका आश्रम था. अब उस मंदिर में देवी-देवताओं के मध्य तीन प्रतिमाएं हैं— बीच में कपिल मुनि, उनकी दाहिनी ओर मां गंगा और बायीं ओर राजा सागर.

हल्की बूंदा-बांदी होने लगी थी. हमारी लांच मझधार पहुंची ही होगी कि विपरीत दिशा से आती हुई लोगों से खचाखच भरी एक फेरी हमारे करीब से गुज़र गई. फेरी में निश्चय ही स्थानीय लोगों की संख्या अधिक रही होगी, लेकिन इस मौसम में भी उसमें मुझे बाहर से आए बहुत सारे तीर्थयात्री दिखे.
पहली बार मैं गंगासागर उस वक्त गया था जब अधिकतर लोग वहां जाते हैं— मकर संक्रांति के समय. हर वर्ष 14 जनवरी से कुछ दिन पहले से लेकर फरवरी के अंत तक गंगासागर भारत के विभिन्न प्रांतों से लाखों की संख्या में आए हर तबके के भिन्न-भाषी तीर्थयात्रियों का मिलन स्थान बन जाता है.
भागीरथी-हुगली नदी के मुहाने पर अवस्थित सागर द्वीप की रचना लगभग 5,000 वर्ष पूर्व हो गई थी. चूंकि रामायण तथा महाभारत में भी इस टापू का उल्लेख मिलता है, यह माना जाता है कि लगभग दो हज़ार साल पहले यहां मानव वास करने लगे थे. सदियों से चला आ रहा गंगासागर का यह मेला कुंभ के बाद भारत का सबसे बड़ा मेला है और कपिल मुनि का आश्रम इस महा-समागम का केंद्र.
कपिल मुनि की कहानी है तो बहुत लंबी और रोचक परंतु यहां मैं उसका सार ही साझा कर पाऊंगा. कपिल मुनि, जिन्हें विष्णु का रूप माना जाता है, ने अपना आश्रम गंगासागर में बनाया था. राजा सागर के अश्वमेध यज्ञ के घोड़े को इंद्र देव ने चुराकर उस आश्रम के पास छुपा दिया था. जब राजा सागर के 60,000 पुत्र अश्व को खोजते हुए आए तो उसे आश्रम के निकट पाकर कपिल मुनि पर चोरी का मिथ्यारोपण कर बैठे. आग-बबूला होकर कपिल मुनि ने उन सभी को भस्म तो कर ही दिया, उन्हें नरक में भी भेज दिया.
राजा सागर तथा उनके परिवार के सदस्यों की अनेक प्रार्थनाओं के पश्चात कपिल मुनि उन 60,000 राजपुत्रों को क्षमा करने के लिए मान गए परंतु उनकी एक शर्त थी— यह संभव तभी हो पाएगा जब गंगा देवलोक से पृथ्वी पर अवतरित होंगी और उनके जल से मृतकों का तर्पण किया जाएगा. राजा भगीरथ की अथक तपस्या के कारण महादेव ने गंगा को इहलोक पर आने की अनुमति दी तथा सागर पुत्रों ने मोक्ष प्राप्त किया. यही कारण है कि देश के विभिन्न प्रांतों से लाखों की संख्या में लोग अपने पूर्वजों को तर्पण देने, मृत प्रियजनों का श्राद्ध संपन्न करने तथा अस्थि विसर्जन करने गंगासागर आते हैं.
मेरी छोटी बहन और मैं भी अपनी दिवंगत मां की अस्थियों को गंगासागर में विसर्जित करने आए थे. इस यात्रा के दौरान हमारे बीच खामोशी ठहरी हुई थी. हमारी व्यथा साझा थी— मां को खोने की व्यथा. मैं जानता था कि मेरी बहन के विक्षुब्ध मन में कैसी भावनाएं, कैसे विचार तथा स्मृतियां उमड़ रही होंगी, क्योंकि मेरे मस्तिष्क में भी वैसी ही अशांति अनवरत चल रही थी. उसे भी पता था. किसी अपने के जाने के पश्चात मन में प्रलय-सम कोलाहल मचता है और फिर मां और बच्चों का संबंध तो अप्रतिम है, जिसका बुनियादी जुड़ाव भौतिक होता है मानसिक और भावनात्मक ही नहीं.
इस असीम व्यथा के शोर में केवल खोने का आर्तनाद नहीं होता और भी स्वर मिले होते हैं— एक संसार के टूटने की निष्ठुर प्रतिध्वनि, एक अंग के विच्छिन्न हो जाने की अनंत चीख, सैकड़ों अधूरी मुरादों और अफ़सोस से भीगे निःश्वास, बीसियों टूटे वायदों की झनझनाहट, और कुछ अन्य अपरिचित विरूप आवाज़. हमारी नाव इस आंधी के बीच अविचलित, नदी के पार पहुंच गई.
कोचूबेरिया पहुंच कर मैंने देखा कि वहां घाट का विस्तार किया गया है ताकि एक साथ कई नावों से यात्रियों को उतारा या चढ़ाया जा सके. आगे का सफ़र गाड़ी से था. पिछली बार मेले के समय वाहनों की भीड़ के कारण गंगासागर तक का 30 किमी लंबाा रास्ता पार करने में हमें लगभग डेढ़ घंटे लग गए थे. इस बार गाड़ी में बैठकर आगे बढ़ते ही मुझे एक ख़ालीपन दिखा.
मेरे सामने संक्रांति के समय इसी पथ का एक दारुण दृश्य तैर आया— गाड़ियों से भरी सड़क के दोनों किनारों पर दोनों दिशाओं में चलती दो अनटूटी क़तारें, क़तारों में कंधे से झोले लटकाए या सिर पर गठरी संभाले, कई तो लाठी के सहारे एक के बाद दूसरा पग रखते अपने गंतव्य की ओर अग्रसर होते वृद्ध पुरुष और महिलाएं. वे सभी दरिद्र दिखते थे परंतु उनमें अक्षम कोई नहीं था.
उनकी आस्था बहुत बलवान थी. जो आस्था उन्हें अपने घरों से कई सौ किमी दूर यहां तक लाई थी वही उन्हें अंतिम 30 किमी चलने की ऊर्जा भी दे रही थी. पैदल जा रहे ज़्यादातर तीर्थ यात्री दूसरे दिन ही गंगासागर पहुंच पाते थे. उनकी पूस-माघ की सर्द रात रास्ते के पास ही किसी रेतीले खेत, पोखर या दलदल की धार पर वृक्षों या खुले आसमान के तले बीतती थी.
हमारा रास्ता गांवों तथा हरे धान से भरे, जल प्लावित खेतों के बीच से जा रहा था वर्षा ऋतु के समय बंगाल में घास-पात भी दुगने-तिगुने गति से बढती हैं, इसलिए हर तरफ़ हरियाली छायी हुई थी. मेरी मां को भी फूल-पौधों से बेहद प्यार था. अपने बगीचे को वह भांति-भांति के फूलों और पौधों से सजाये रखती थी जिनके रंगभरे फ़ोटो फेसबुक पर अक्सर लगाती रहती थी. परंतु मां सबसे अधिक पुलकित होती थी अपने बागान में चिड़ियों को देखकर, चहकता सुनकर. ऐसे समय में मैंने मां को जाने कितनी बार कहते सुना था, ‘मुझे अगले जन्म में चिड़िया बनना है. भगवान, मुझे अगले जन्म में छोटी सी चिड़िया बनाना. तब मैं फुर्र से इधर से उधर, उधर से इधर, जिधर मन चाहे जा सकूंगी.’ और यह सुनकर मैं हर बार सोचता था कि मेरी मां महज़ एक व्यक्तिगत अभिलाषा को नहीं वरन् समूचे नारी समाज की चाहत को व्यक्त कर रही है.
सही मायने में सागर द्वीप सुंदरबन डेल्टा का ही एक अंश है परंतु अंश होते हुए भी इस टापू की भौतिक आकृति अलग है. न तो आपको यहां सघन जंगल मिलेंगे न ही बाघ, हरिण, मगरमच्छ जैसे जंतु और न ही विविध रंग-रूप की चिड़ियों की चार सौ से अधिक प्रजातियां. हां, मटमैले समुद्र से घिरे सागर द्वीप की तटीय परिधि पर कई जगहों में दलदल मिलते हैं और कहीं-कहीं मैंग्रोव वन.
त्रिकोणीय सुंदरबन क्षेत्र का निर्माण हज़ारों वर्षों से उत्तर भारत के मैदानी इलाक़ों तथा उत्तर पूर्व की पहाड़ियों से गंगा, मेघना तथा ब्रह्मपुत्र में बहकर आए तलछटों, मूलतः मिट्टी और रेत, से शनैः शनैः, कण कण जुड़कर होता जा रहा है. हर साल गंगा तथा उसकी उपनदियों में प्रवाहित लाखों मृतकों की अस्थियां भी गंगा-भागिरथी-हूगली में बहती हुई आकर गंगासागर में इस निर्माण में सम्मिलित हो जाती हैं. फिर धीरे-धीरे बनती जाती है पहले मिट्टी और उस मिट्टी से फिर बनते हैं जल, थल और नभ के जीव.
गंगासागर पहुंच कर मैं और मेरी बहन समुद्र तट पर गए. आसमान में छाए काले बादलों की धमकियों के बावजूद तट पर कई लोग मौजूद थे जिनमें पीतल की पूजा की डलिया लिए और गाय या बछिया के साथ कुछ पुरोहित भी थे. कुछ परिवार भी रेत पर पंक्ति लगाकर बैठे हुए थे जिन्हें पंडित उनके मृत प्रियजनों का श्राद्ध करवा रहे थे.
समुद्र किनारे स्नान करते लोगों से कुछ हटकर, लहरों में आगे बढ़कर हम दोनों ने अपनी मां के अंतिम मूर्तांश को गंगासागर में समर्पित कर दिया. शायद अंततः मोक्ष एक आस्था है, आशा है, परंतु सुंदरबन को देखकर विश्वास हो जाता है कि भौतिक पुनर्जन्म यथार्थ है. क्या पता…
(चन्दन सिन्हा पूर्व भारतीय प्रशासनिक सेवा अधिकारी, लेखक और अनुवादक हैं.)
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