नई दिल्ली: ‘लद्दाख के लोगों ने अपना ख़ून देकर सीमाओं की रक्षा की है. अभी जो मरे हैं, उनमें से कुछ लोगों ने करगिल की जंग लड़ी थी. आप सोच भी कैसे सकते हैं कि लद्दाख के लोग इस तरह की चीजें कर सकते हैं. कश्मीर में 40 साल क्राइसिस रहा, लेकिन क्या आपने लद्दाख के बारे में ऐसा सुना कि कोई गतिविधि हुई. तो यह सवाल ही पैदा नहीं होता.’
शिक्षाविद और पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (रासुका) लगाए जाने और उन्हें पाकिस्तान से जोड़े जाने की कड़ी मुखालफत करते हुए, ये बातें करगिल डेमोक्रेटिक अलायंस (लद्दाख) के सज्जाद करगिल ने द वायर हिंदी से कही.
सज्जाद के अनुराग ठाकुर नाम लिए बिना कहा कि जिस आधार पर सोनम वांगचुक पर एनएसए लगाया गया है, उस आधार पर तो एक पूर्व केंद्रीय मंत्री पर भी लगाया जाना चाहिए, ‘सोनम वांगचुक जी पाकिस्तान गए थे. इस देश के बहुत से लोग पाकिस्तान गए हैं, और जाकर आते रहते हैं. अभी हमारी टीम ने पाकिस्तान के साथ क्रिकेट भी खेला. हमारे एक पूर्व मंत्री शाहिद अफरीदी के साथ, जो पाकिस्तानी आर्मी का करीबी है, उसके साथ बैठकर मैच देखते हैं, फिर तो उन पर भी एनएसए लगा दीजिए. उनको क्यों छोड़ा जा रहा है?’

सोमवार, 29 सितंबर को नई दिल्ली के प्रेस क्लब में एक प्रेस वार्ता का आयोजन किया गया था, जिसमें सज्जाद के साथ-साथ जोशीमठ बचाओ संघर्ष समिति के अतुल सती, हिमधारा कलेक्टिव की मानसी अशर और क्लाइमेट फ़्रंट जम्मू के अनमोल ओहरी शामिल हुए.
द वायर हिंदी से बातचीत में अतुल सती ने कहा, ‘पिछले 10-11 सालों से हम देख रहे हैं कि जो लोग भी आंदोलन कर रहे हैं, सरकार उन पर कोई न कोई ठप्पा लगा दे रही है. हम लोग जब जोशीमठ में आंदोलन कर रहे थे, तो सरकार ने हमें चीन का एजेंट और माओवादी कह दिया, क्योंकि हम चीन के बॉर्डर के नज़दीक हैं. किसानों ने विरोध प्रदर्शन किया तो उन्हें खालिस्तान बोल दिया गया. अभी पाकिस्तानी एजेंट कहा जा रहा है. लेकिन इस खतरे के बावजूद धरती और पर्यावरण को बचाने के लिए हमारा संघर्ष है और रहेगा.’

‘पीपल फॉर हिमालया’ द्वारा आयोजित इस प्रेस वार्ता में सोनम वांगचुक की गिरफ्तारी की कड़ी निंदा करते हुए तत्काल रिहाई की मांग की. इस गिरफ्तारी को लोकतांत्रिक अधिकारों और विरोध की आज़ादी पर हमला बताते हुए, वक्ताओं ने दावा किया कि ऐसे कार्य लद्दाख के लोगों की आवाज़ को दबाने का एक स्पष्ट प्रयास हैं, जो अपने संवैधानिक अधिकारों, आजीविका और पर्यावरण को लेकर वैध चिंताएं उठाते रहे हैं.
क्या हैं मांगें?
द वायर हिंदी से बातचीत में वांगचुक के आंदोलन के साथी सज्जाद ने कहा कि ‘हमारी मांग है कि लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा मिले और इसे छठवीं अनुसूची में शामिल किया जाए.’
ध्यान रहे कि इसी मांग को लेकर वांगचुक ने भी 35 दिन की भूख हड़ताल शुरू की थी, जिसके 15वें दिन यानी 25 सितंबर को लेह में हिंसा भड़क गई, और चार लोगों की जान चली गई.
हिंसा भड़कने का आरोप वांगचुक पर लगाया गया, लेकिन उनकी पत्नी गीतांजलि जे. आंगमो ने द वायर से बातचीत में कहा कि वांगचुक गांधीवादी तरीके से आंदोलन का नेतृत्व कर रहे थे, ‘25 सितंबर को भी हिंसा युवाओं ने नहीं, बल्कि केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल ने शुरू की थी. लद्दाखी युवा सबसे शांत और सज्जन होते हैं.’
प्रेस वार्ता के दौरान सज्जाद से पूछा गया कि जब केंद्र सरकार से बातचीत चल रही थी तो आंदोलन की क्या ज़रूरत थी?
इस पर उन्होंने जवाब दिया, ‘आंदोलन बहुत पहले से चल रहा था. तब सरकार ने तारीखों का ऐलान भी नहीं किया था. आंदोलन के बीच उन्होंने तारीखों का ऐलान किया. सरकार के साथ आज तक जो भी मीटिंग हुई है, वह तब ही हुई है जब आंदोलन किया गया है. आंदोलन के बाद भी सरकार मीटिंग के लिए बुलाती है. जब-जब हम ख़ामोश रहे हैं, कोई पूछने वाला नहीं आया है. इस बार भी जब सोनम वांगचुक जी भूख हड़ताल पर थे और 13 दिन बीत गए थे, तब सरकार की तरफ़ से ऐलान हुआ कि हम आपको बातचीत के लिए बुला रहे हैं.’
सरकार पर आरोप
प्रेस वार्ता के दौरान वक्ताओं ने सरकार पर आरोप लगाया कि सरकार चाहती है कि उनके नियुक्त किए गए अधिकारी शासन करें और लद्दाख के लोग फेस्टिवल में व्यस्त रहें, खेल खेलें और नीति निर्माण से दूर रहें.
एक वक्ता ने कहा, ‘हम चाहते हैं कि हमारी पहचान को सुरक्षा मिले. भारत के जिस लोकतंत्र की तारीफ प्रधानमंत्री दुनिया भर में करते है, लद्दाख को भी वह लोकतंत्र मिले.’
सज्जाद ने स्पष्ट किया कि वे सिर्फ छठी अनुसूची की मांग नहीं कर रहे, बल्कि पूर्ण राज्य की मांग कर रहे हैं. उन्होंने कहा, ‘आइडिया ऑफ यूनियन टेरिटरी बुरी तरह फेल हो गया है. यह लोगों की आशाओं और आकांक्षाओं पर खड़ा नहीं उतरा हैं.’
