नई दिल्ली: जम्मू-कश्मीर में इस साल 5 अगस्त को 25 किताबों पर आधिकारिक प्रतिबंध लगा दिया गया था, जिसे चुनौती देने वाली एक याचिका मंगलवार (30 सितंबर) को जम्मू-कश्मीर और लद्दाख उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के समक्ष प्रस्तुत की गई.
रिपोर्ट के अनुसार, जम्मू-कश्मीर प्रशासन ने केंद्र शासित प्रदेश में ‘अलगाववाद को बढ़ावा देने’ और ‘भारतीय राज्य के खिलाफ हिंसा भड़काने’ के आरोप में इन किताबों पर प्रतिबंध लगा दिया था, जिनमें से कुछ किताबें शीर्ष देशी-विदेशी लेखकों और इतिहासकारों द्वारा लिखी गई हैं.
इस संबंध में वरिष्ठ अधिवक्ता वृंदा ग्रोवर ने पूर्व एयर वाइस मार्शल कपिल काक, नेताजी सुभाष चंद्र बोस के परपोते सुमंत्र बोस (प्रतिबंधित किताबों में से दो पुस्तकों के लेखक), लेखिका एवं जम्मू-कश्मीर की पूर्व वार्ताकार राधा कुमार और भारत के पूर्व मुख्य सूचना आयुक्त वजाहत हबीबुल्लाह द्वारा दायर याचिका का उल्लेख किया.
‘किताबों पर बैन मौलिक अधिकार को प्रतिबंधित करना है’
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यह आदेश अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और ‘जानने के अधिकार’ के मौलिक अधिकार को प्रतिबंधित करता है.
याचिकाकर्ताओं ने कहा है, ‘प्रशासन का विवादित आदेश इस निष्कर्ष पर पहुंचने का कोई ठोस आधार प्रदान नहीं करता है कि … जिन 25 पुस्तकों की पहचान की गई है वो जम्मू-कश्मीर में ‘झूठे नैरेटिव’ और अलगाववाद का का प्रचार-प्रसार करती हैं, और उन्हें ज़ब्त घोषित किया जाना चाहिए. यह आदेश संबंधित पुस्तकों के ऐसे किसी भी अंश का उल्लेख नहीं करता है.
इसमें आगे कहा गया है कि केवल वैधानिक प्रावधानों को पुन: प्रस्तुत करने या वैधानिक प्रावधानों की सामग्री का संदर्भ देने वाले व्यापक बयान, बिना यह दर्शाए कि पुस्तक(ओं) की सामग्री से उनका अनुमान कैसे लगाया गया है, धारा 98 बीएनएसएस में परिकल्पित ‘तर्कसंगत आदेश’ के अनुरूप नहीं है.’
याचिकाकर्ताओं ने यह भी कहा कि ‘उक्त पुस्तकों की पहचान कैसे और किस प्रकार की गई, यह भी विवादित आदेश में नहीं बताया गया है. यह स्थापित कानून है कि किसी भी प्रशासनिक या अर्ध-न्यायिक आदेश, जिससे नागरिक जीवन प्रभावित हो, में ऐसे कारणों का खुलासा होना चाहिए जो उस आदेश का ही हिस्सा हों, और ये कारण बाद में नहीं बताए जा सकते.’
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि बीएनएसएस की धारा 98 के ज़ब्ती प्रावधान का इस्तेमाल ‘जीवित वास्तविकताओं और लोगों के इतिहास को मिटाने के लिए नहीं किया जा सकता, क्योंकि यह राष्ट्र के इतिहास को मिटाने के समान होगा जो लोगों के जानने के अधिकार का हिंसक रूप से उल्लंघन करता है.’
इसमें आगे कहा गया है कि ‘इतिहास के ऐसे कार्य, जो अकादमिक तौर पर उच्च मानकों, सटीकता, गहरी प्रतिबद्धता, शोध और गहनता के माध्यम से प्रकाशित होते हैं, बहस के लिए खुले हैं, लेकिन क्षणिक संवेदनशीलता के आधार पर उन्हें मिटाया नहीं जा सकता, जो असहमति या वैकल्पिक विचारों से जुड़ने में असमर्थ लोगों को आहत कर सकती हैं.’
इस मामले पर मुख्य न्यायाधीश अरुण पल्ली ने कहा कि वह इन दस्तावेज़ों पर गौर करेंगे और फिर भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 99(2) के अनुसार, जल्द ही तीन न्यायाधीशों की एक विशेष पीठ के गठन के आदेश पारित करेंगे.
जम्मू-कश्मीर का गृह विभाग उपराज्यपाल मनोज सिन्हा को रिपोर्ट करता है
मालूम हो कि किताबों के संबंध में यह प्रतिबंध आदेश जम्मू-कश्मीर के गृह विभाग द्वारा जारी किया गया था, जो सीधे उपराज्यपाल मनोज सिन्हा को रिपोर्ट करता है.
गौरतलब है कि बीएनएसएस की धारा 99 में ज़ब्ती की घोषणा को रद्द करने के लिए अपनाई जाने वाली प्रक्रिया का उल्लेख है. उप-धारा 2 के अनुसार, ऐसे आवेदन पर उच्च न्यायालय की तीन या अधिक न्यायाधीशों वाली पीठ द्वारा सुनवाई की जानी चाहिए.
ज्ञात हो कि इससे पहले जम्मू-कश्मीर प्रशासन द्वारा 25 किताबों पर प्रतिबंध लगाए जाने के एक दिन बाद प्रमुख नागरिक समाज कार्यकर्ताओं, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए आवाज़ उठाने वाले लोगों और राजनीतिक दलों समेत अन्य ने इस फैसले का विरोध किया था और केंद्र शासित प्रदेश के प्रशासन से इस प्रतिबंध को हटाने का आग्रह किया था.
किताबों को प्रतिबंधित करने के प्रशासनिक कदम को ‘असहमति का दमन’, ‘तानाशाही’ और ‘लोकतांत्रिक आवाज़ों का गला घोंटना’ करार देते हुए विरोध करने वाले तमाम लोगों ने भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार से राज्य का दर्जा बहाल कर ‘जम्मू-कश्मीर में मानवाधिकारों के हनन को रोकने’ का भी आह्वान किया था.
उल्लेखनीय है कि जिन पुस्तकोंं को प्रतिबंधित किया गया है, उनमें से कुछ प्रकाशन उद्योग के प्रमुख नामों जैसे पेंगुइन, ब्लूम्सबरी, हार्पर कॉलिन्स, पैन मैकमिलन इंडिया, रूटलेज और वर्सो बुक्स द्वारा प्रकाशित की गई हैं.
इन पुस्तकों की सूची में भारतीय संवैधानिक विशेषज्ञ और बुद्धिजीवी एजी नूरानी की बहुप्रशंसित पुस्तक ‘द कश्मीर डिस्प्यूट’, ब्रिटिश लेखिका और इतिहासकार विक्टोरिया स्कोफील्ड की ‘कश्मीर इन कॉन्फ्लिक्ट – इंडिया, पाकिस्तान एंड द अनएंडिंग वॉर’, बुकर पुरस्कार विजेता अरुंधति रॉय की ‘आज़ादी’ और लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के प्रोफेसर सुमंत्र बोस की ‘कंटेस्टेड लैंड्स’ शामिल हैं.
