सोनम वांगचुक को राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (रासुका) के तहत गिरफ़्तार किए हुए दस दिन बीतने को हैं. इन दिनों में सोनम वांगचुक के बारे में इतनी अफ़वाहें फैलाई जा चुकी हैं कि बहुतेरे लोग जो उन्हें वर्षों से मिलते रहे हैं, चकित भी हैं और व्यथित भी.
उनकी पत्नी और हिमालयन इंस्टिट्यूट ऑफ अल्टरनेटिव लर्निंग की सह-संस्थापक गितांजली जे अंगमो ने प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति और गृहमंत्री को पत्र लिखकर सोनम को रिहा करने की अपील की है.
सोनम की गिरफ़्तारी के बाद आम लोगों में उनकी पहचान ‘थ्री इ़डियट्स’ फ़िल्म के फुंशुक वांगडू के इतर बनी है. समाज और सेना को उनके योगदान का मालूम पड़ा है. ये भी मालूम चला है कि अगर आईटी सेल किसी भी व्यक्ति के पीछे लगा दी जाए तो किसी को भी ‘एंटी-नेशनल‘ घोषित करने में ज्यादा समय नहीं लगेगा, भले ही वह व्यक्ति कुछ वर्षों पहले तक सरकार के गुड बुक्स में रहा हो, भारत सरकार के मंत्रालय उसे सम्मानित करते रहे हों, वह देश के शीर्ष राजनेताओं से मिलता रहा हो.
जिस तरह से पिछले कुछ दिनों में लेह के राजनीतिक हालात बदले हैं, चर्चाओं का सिरा सोनम वांगुचक और हिंसा की ओर मुड़ गया है. लद्दाख को स्टेटहुड (राज्य का दर्जा) और छठी अनुसूची की सुरक्षा की आलोचना हो रही है. गौरतलब हो कि इसी भारत में कई आदिवासी क्षेत्रों के पास संविधान की छठी अनुसूची के अधिकार प्राप्त हैं.
लद्दाख में जहां बहुसंख्यक आबादी अनुसूचित जनजाति है, भाजपा कई दफ़ा वादा भी कर चुकी है, फिर ऐसी क्या दुविधा आन पड़ी है कि लद्दाख को सड़कों पर उतरकर संघर्ष करना पड़ रहा है?
तारीख पर तारीख
6 मार्च 2024 को जब सोनम पहली बार जलवायु उपवस) पर बैठे थे, उन्होंने मुझसे फोन पर कहा था, ‘क्लाइमेट फास्ट के जरिए हमारी कोशिश है कि दिल्ली की सरकार और नीति बनाने वाले लद्दाख के लोगों की तकलीफ को समझें. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह लद्दाख की ओर ध्यान दें. वे समझें कि लद्दाख के हिमालयी पर्वत प्राकृतिक रूप से काफी संवेदनशील (फ्रेजाइल) हैं. लद्दाख के जनजातियों को उनकी भूमि और रोजगार का अधिकार मिलने चाहिए. इस उपवास से हम दिल्ली से दूरदर्शिता दिखाने की अपील करते हैं.’
केंद्र सरकार ने दिसंबर 2023 में एक उच्चस्तरीय समिति बनाई थी. तब से कई बैठकें हो सकी हैं. लेकिन अब तक कोई कोई ठोस नतीजा नहीं निकल सका है. हर बैठक एक दूसरी बैठक की तारीख मुकर्रर करवा देती है. लिहाजा लद्दाख में प्रदर्शनों का सिलसिला जारी रहा है.
इस बार भी, जब सोनम और उनके साथी शांतिपूर्ण प्रदर्शन पर बैठे थे तो सरकार ने 6 अक्टूबर को बातचीत की तारीख तय की थी. उनका कहना था कि सरकार जानबूझकर ऐसी तारीख देती है ताकि मामला टलता जाए. बाद में, सोनम की गिरफ्तारी और चार प्रदर्शनकारियों की कथित हत्या के बाद लेह की एपेक्स बॉडी ने सरकार से बातचीत रद्द कर दी. उनका कहना था कि गोली और बातचीत एक साथ नहीं चल सकती.

लद्दाख की दो प्रमुख मांगें हैं. पहली, लद्दाख को संविधान की छठी अनुसूची में शामिल किया जाए. चूंकि लद्दाख की लगभग 99% आबादी अनुसूचित जनजाति श्रेणी में आती है, लोगों का कहना है कि छठी अनुसूची इस जनजातीय पहचान को कानूनी सुरक्षा दैगा.
पर्यावरण जनजातीय समूहों के जीवन के दर्शन में शामिल है, वे अपने ‘विकास’ का रास्ता खुद तय कर सकेंगे. दुनियाभर में जहां भी जनजातीय समूहों को कानूनी सुरक्षा मिली है, वहां के नदी-नाले, पहाड़, जंगल और जमीन सुरक्षित रहे हैं. भारत के अंदर ही कई राज्यों और कई क्षेत्रों को छठी अनुसूची की सुरक्षा प्रदान की गई है. लद्दाख कोई नई चीज नहीं मांग रहा है.
दूसरी मांग है लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा देने की. इससे लद्दाख में विधानसभा का गठन हो सकेगा और स्थानीय लोगों का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित हो सकेगा. इससे ही जुड़ा है नौकरशाही का सवाल.
लोगों का कहना है कि वर्तमान व्यवस्था में अफसर केंद्र से नियुक्त होकर आते हैं. ये अफसर लद्दाख की संस्कृति और जीवन के बारे में नहीं जानते, लिहाजा वे संवेदनशील नहीं हैं. पिछले छह वर्षों में (जबसे लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश बनाया गया है) लद्दाख में गजेटेड पोस्ट पर कोई नई नियुक्ति नहीं हुई है.
प्रशासन में ऊपरी स्तर के अधिकारी बाहर के हैं, जो अक्सर लद्दाख की पोस्टिंग को ‘पनिशमेंट पोस्टिंग’ समझते हैं. इसलिए लद्दाख का अपना पब्लिक सर्विस कमीशन स्थापित किया जाए, जिससे स्थानीय युवाओं को उनके योग्यतानुसार सम्मानजनक रोजगार मिल सके और प्रशासन में बाहरी अफसरों की दखलअंदाजी खत्म हो सके.

लद्दाख में पनप रही बेरोजगारी
वर्तमान शीर्ष प्रशासनिक तिकड़ी – उपराज्यपाल, पुलिस महानिदेशक और मुख्य सचिव – सभी जम्मू के हैं. लोग कहते हैं कि अगर बाहरी लोग शीर्ष पदों पर रहेंगे तो पक्षपात होने की संभावनाएं हमेशा बनी रहेगी.
नेशनल एलायंस फॉर पीपल्स मूवमेंट की ताजा फैक्ट फाइंडिंग रिपोर्ट कहती है:
लद्दाख विश्वविद्यालय में 80 संविदा (कॉन्ट्रैक्चुअल) लेक्चरर पदों में से 78 पद बाहरी लोगों को दिए गए. स्थानीय पीएचडी योग्य उम्मीदवारों को दरकिनार किया गया. सरकारी आरक्षण नीति के अनुसार यह अवैध है. आर्थिक क्षेत्र में भी श्रीनगर, जम्मू और चंडीगढ़ के ठेकेदार बहतर राजनीतिक संबंधों का फायदा उठा रहे हैं. स्थानीय व्यापारियों की बाजार पर पकड़ कमजोर होती जा रही है.
लेह एपेक्स बॉडी के सह-अध्यक्ष चेर्रिंग दोर्जे लाकारुक बताते हैं, ‘सरकार ने बैठकों में हुई बातचीत को लागू नहीं किया है जैसे सरकारी नौकरियों में आरक्षण. केंद्र सरकार ने सरकारी नौकरियों में 80% अनुसूचित जनजाति, 4% लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल के निवासियों को, 1% अनुसूचित जाति, 10% इकोनॉमिकली वीकर सेक्शन (ईडब्ल्यूएस) और 5% लद्दाख के डोमिसाइल कोटा लागू करने को कहा था.’
उनका कहना है, ‘यह अब तक अमल में नहीं आ सका है. लद्दाख में गैर-स्थानीयों के लिए डोमिसाइल के लिए 1989 को कटऑफ वर्ष मानने की मांग थी. मतलब जो गैर-स्थानीय 1989 से लद्दाख में रह रहे हैं, उन्हें डोमिसाइल दिया जाए. यही वह वर्ष भी था जब आठ अनुसूचित समुदायों को मान्यता मिली थी. लेकिन सरकार ने कहा कि जो गैर-स्थानीय 31 अक्टूबर 2019 से लगातार 15 साल लद्दाख में रहेगा, वह लद्दाख का डोमिसाइल पा सकेगा.’
खनिज, जलवायु और कॉरपोरेट
जम्मू और कश्मीर की तरह, अगस्त 2019 के बाद से लद्दाख के प्राकृतिक संसाधन, जैसे ग्लेशियर, जल स्रोत, ग्रेनाइट, लाइमस्टोन (चूना पत्थर) और यूरेनियम जैसे खनिज भंडार, को व्यावसायिक हितों के लिए खोल दिया गया है. इसमें स्थानीय समुदायों की न के बराबर भागीदारी है.
लद्दाख एक संवेदनशील हिमालयी पारिस्थितिक तंत्र का हिस्सा है जो पहले ही वैश्विक जलवायु संकट झेल रहा है. सोनम और उनके साथी इसलिए छठी अनुसूची के तहत पर्यावरण संरक्षण की तत्काल मांग करते रहे हैं. दरअसल, छठी अनुसूची की मांग का समर्थन भारतीय जनता पार्टी भी करती रही है. 2019 के लोकसभा चुनाव और 2020 के ऑटोनोमस हिल डेवलपमेंट काउंसिल के चुनावों में भाजपा ने यह वादा किया था.
लेकिन अब भाजपा इस वादे को तोड़ते हुए दिख रही है. लद्दाख के लोग इसे धोखे की तरह देख रहे हैं. यहां तक की लेह की भाजपा इकाई भी केंद्रीय नेतृत्व से खुश नहीं हैं. ‘लद्दाख के साथ गलत सुलूक हो रहा है. हमने (भाजपा ने) वादा किया था, हमें लोगों को बताना चाहिए कि हम उनकी मांगों के साथ हैं. जिस तरीके से प्रशासन पूरे मसले को हैंडल कर रहा है, वह लंबे समय में न तो लद्दाख के हित में है और न ही पार्टी के हित में,’ लेह ऑटोनोमस हिल डेवलपमेंट काउंसिल के काउंसिलर और भाजपा नेता ने बताया.
हाल ही में लद्दाख में पांच नए जिलों की घोषणा की गई है – साम, नुब्रा, चांगथांग, जांस्कर और द्रास. प्रशासन का कहना है कि इसे बेहतर प्रशासन के लिए बनाया गया है. लेकिन लोगों को सरकार की नीयत पर शक है. उनका कहना है कि सरकार इन जिलों के गठन का इस्तेमाल राजनीतिक फेरबदल और जनसांख्यिकी बदलाव के लिए करेगी जिसका फायदा कॉरपोरेट घरानों को दिया जाएगा. इस तर्क को बल देने के लिए चांगथांग का उदाहरण दिया जा रहा है.

प्रस्तावित सोलर पार्क और खनन परियोजनाएं
‘चांगथांग में विंड एंड सोलर पार्क और खनन परियोजनाएं प्रस्तावित हैं. यहां हजारों बाहरी मजदूर आएंगे, जो धीरे-धीरे डोमिसाइल प्राप्त कर क्षेत्र की जनसंख्या और राजनीतिक प्रतिनिधित्व को स्थायी रूप से बदल देंगे. इससे क्षेत्र और अनुसूचित जनजातियों की मूल पहचान और परंपराएं प्रभावित होंगी,’ लेह ऑटोनोमस हिल काउंसिल के स्तांजिन चोसपेल कहते हैं. ‘चांगथांग पिछले छह वर्षों से हमारे ऊपर मंडरा रहे संकट का एक प्रतीक है.’
चांगथांग लेह के पूर्वी हिस्से में चीन सीमा के पास का एक पठारी इलाका है. यहां की घास के बड़े-बड़े मैदानों का एक हिस्सा पिछले तीन वर्षों से चीनी सेना के कब्जे में है. पारंपरिक तौर पर इस क्षेत्र में चांगपा समुदाय के खानाबदोश लोग अपनी पश्मीना बकरियों को चराते हैं.
इन बकरियों के ऊन से बना ‘पश्मीना’ दुनियाभर में मशहूर है. घास के मैदान कम होने से हजारों चांगपा लोगों का जीवन संकट में है. अब केंद्र सरकार यहां खनन और सोलर पार्क लगाना चाहती है. इससे प्रकृति और समुदायों दोनों को बड़ा नुकसान होगा.’
सोनम वांगचुक के साथी जिगमत पल्जोर ने कुछ महीने पहले चांगथांग की कहानी से हवाले से मुझसे कहा था, ‘चांगथांग की चारागाहें और पठार बड़े पूंजीपतियों को दी जानी है. यह सुगबुगाहट तेज है. शायद यही कारण है कि वादे के बावजूद सरकार छठी अनुसूची देने में देरी कर रही है. आज अगर बाहरी अफसरों की जगह लद्दाख के लोग नीति बनाने में शामिल होते तो वे हमारी समस्याएं समझते.’
उसी तरह लेह के न्योमा तहसील के कोयुल गांव के लोग पिछले कुछ वर्षों से हर साल बाढ़ का सामना कर रहे हैं. हिमालयी पर्वत क्षेत्रों में क्लाउडबर्स्ट (बादल फटना) के हादसे बढ़ते जा रहे हैं. लोग बताते हैं कि लेह में यूं तो पानी की दिक्कत होती है पर अब अचानक बाढ़ आ जाती थी. साथ ही पर्यटन को भी नियंत्रित करने की मांग हो रही है लद्दाख में.
पहले, बर्फ की पिघलन सिंचाई के काम आया करती थी. लेकिन जलवायु परिवर्तन के बढ़ते असर से स्नोफॉल अब अनियमित हो गई है और ‘फ्लैश फ्लड’ का खतरा बढ़ गया है.
सामाजिक कार्यकर्ता सज्जाद कारगिली के अनुसार, केंद्र सरकार ने अनुच्छेद 370 हटाने के बाद लद्दाख के पर्यावरण को संकट में डाल दिया है. भारी संख्या में पर्यटक लद्दाख पहुंचते हैं. उनकी जरुरतों को पूरा करने के लिए हमें अपना मॉडल डेवलप करना होगा न कि पहाड़ों को काटकर होटल और बॉरवेल खोदने वाले मॉडल चाहिए.
अगर स्थानीय लोगों की सलाह के बिना विकास हुआ तो पर्यावरण की स्थिति और बिगड़ेगी. लद्दाख को शिमला, जोशीमठ या सिक्किम जैसी स्थिति में पहुंचने से बचाना होगा.’
एक्शन एड इंटरनेशनल की रिपोर्ट कहती है कि कश्मीर-लद्दाख में बड़े प्रोजेक्ट्स के लिए इंवॉयरमेंट एंड सोशल इंपैक्ट एसेसमेंट फ्रेमवर्क को पूरी तरह बदलने की जरूरत है. मौजूदा सरकारी रिपोर्ट लोगों की चिंताओं को दर्ज नहीं करती.
पर्यावरण विशेषज्ञ राजा मुजफ्फर भट भी सज्जाद कारगिली की बात को आगे बढाते हैं, ‘जम्मू और कश्मीर और लद्दाख का विकास दिल्ली-गुरुग्राम-नोएडा, अहमदाबाद और नागपुर की तरह नहीं होना चाहिए. दुखद है कि यहां भी रेल, सड़क परियोजनाएं मैदानी क्षेत्रों के तर्ज पर ही बन रही हैं. इससे स्थानीयता का खतरा तो पैदा हो ही रहा है, छोटे और मंझौले किसानों को भी अपनी जमीनें कुर्बान करनी पड़ रही है.’
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं.)
