श्रीनगर: लद्दाख में संवैधानिक सुरक्षा उपायों और लोकतंत्र की बहाली के लिए आंदोलन का नेतृत्व कर रहे लेह एपेक्स बॉडी (एलएबी) ने सोमवार (6 अक्टूबर) को कहा कि प्रशासन कथित तौर पर उनके कार्यकर्ताओं और नेताओं को धमका रहा है.
संगठन ने इस दौरान सार्वजनिक सभाओं और मोबाइल इंटरनेट पर प्रतिबंध हटाने का आह्वान किया.
करगिल डेमोक्रेटिक अलायंस (केडीए) के साथ आंदोलन का नेतृत्व कर रहे एलएबी के नेताओं की यह टिप्पणी लद्दाख के उपराज्यपाल और भाजपा नेता कविंदर गुप्ता के उस दावे के एक दिन बाद आई है जिसमें उन्होंने कहा था कि क्षेत्र में सामान्य स्थिति लौट आई है, जबकि लेह में मोबाइल इंटरनेट और सार्वजनिक सभाओं पर प्रतिबंध अभी भी लागू हैं.
मालूम हो कि रविवार को एक बैठक में कविंदर गुप्ता, जो जम्मू-कश्मीर विधानसभा के अध्यक्ष भी रह चुके हैं, ने लद्दाख के लोगों की ‘प्रशासन और सुरक्षा बलों के साथ अनुकरणीय सहयोग’ के लिए सराहना की… जिसने क्षेत्र में सामान्य स्थिति बहाल करने और बनाए रखने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है.
‘लद्दाख सामान्य नहीं है. सतह पर सामान्य स्थिति का भ्रम है’
इस संबंध में एलएबी के सह-अध्यक्ष चेरिंग दोरजय लकरूक ने सोमवार को लेह में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान कहा, ‘लद्दाख सामान्य नहीं है. सतह पर सामान्य स्थिति का भ्रम है, लेकिन यह सब झूठ है. मोबाइल इंटरनेट बंद है और सार्वजनिक सभाओं पर प्रतिबंध हैं, जबकि लोगों का उत्पीड़न बेरोकटोक जारी है.’
लद्दाख बौद्ध संघ के प्रमुख लकरूक ने कहा कि अगर स्थानीय प्रशासन स्थिति को शांत करने के लिए गंभीर है, तो सार्वजनिक समारोहों और मोबाइल इंटरनेट पर सभी प्रतिबंध हटा दिए जाने चाहिए, जिससे जनता का विश्वास बहाल होगा.
उन्होंने कहा, ‘लद्दाख में सामान्य स्थिति बहाल करने के लिए ये सभी उपाय महत्वपूर्ण हैं.’
उल्लेखनीय है कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 163 के तहत लद्दाख के लेह और करगिल जिलों में 25 सितंबर को सार्वजनिक समारोहों पर प्रतिबंध लगाए गए थे.
इससे एक दिन पहले राजधानी में हिंसक विरोध प्रदर्शनों के दौरान सुरक्षा बलों की गोलीबारी में करगिल युद्ध के एक पूर्व सैनिक सहित चार नागरिक प्रदर्शनकारियों की मौत हो गई थी.
करगिल में मोबाइल इंटरनेट सेवाएं बहाल लेकिन लेह में पाबंदियां अभी भी जारी
करगिल ज़िले में धारा 163 हटा दी गई है और मोबाइल इंटरनेट सेवाएं बहाल कर दी गई हैं, लेकिन लेह में पाबंदियां अभी भी जारी हैं.
संबंधित गांवों का नाम लिए बिना, लकरूक ने आरोप लगाया कि प्रशासन 24 सितंबर के विरोध प्रदर्शनों के सिलसिले में उनके नंबरदारों (गांव के मुखिया) से ‘बिना किसी औचित्य के’ पूछताछ कर रहा है.
उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि नंबरदार ‘हमारे समुदाय और संस्कृति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा’ हैं.
लकरूक ने कहा, ‘गांवों में उनकी सहमति के बिना कुछ नहीं होता. जब (लेह के शहीद स्मारक पार्क में) अनशन हो रहा था, तो सर्वोच्च संस्था ने लोगों से इसमें शामिल होने का अनुरोध किया था और यह उनका (नंबरदारों का) कर्तव्य था कि वे हर गांव में इस बात का प्रचार करें, जिसके कारण उन्हें बिना किसी औचित्य के यहां (लेह) बुलाया जा रहा है और पुलिस द्वारा पूछताछ की जा रही है.’
मालूम हो कि 23 सितंबर को पर्यावरणविद् सोनम वांगचुक, जो अब जेल में बंद हैं, के नेतृत्व में एक दर्जन से ज़्यादा लद्दाखी कार्यकर्ताओं की भूख हड़ताल अपने 14वें दिन में प्रवेश कर गई थी. इस दौरान एक महिला सहित दो बुज़ुर्ग कार्यकर्ताओं की तबीयत बिगड़ने और अनशन समाप्त करने से इनकार करने के बाद उन्हें लेह के सोनम नरबू मेमोरियल अस्पताल में भर्ती कराया गया था.
माना जा रहा है कि इन दोनों कार्यकर्ताओं के अस्पताल में भर्ती होने की घटना ने 24 सितंबर को लेह में व्यापक हिंसा के बीज बोए, जिससे पूरे लद्दाख में तनाव बढ़ गया.
एलएबी ने अनशन कर रहे कार्यकर्ताओं की बिगड़ती हालत के विरोध में 24 सितंबर को लेह में आम हड़ताल का भी आह्वान किया था.
ग्राम प्रधानों के खिलाफ प्रशासन की कार्रवाई की निंदा करते हुए, लकरूक ने कहा, ‘हमारा मानना है कि यह हमारी संस्कृति पर सीधा हमला है.’
24 सितंबर की हिंसा में कथित संलिप्तता के लिए हिरासत में लिए गए सभी संदिग्धों को रिहा करने का प्रशासन से आग्रह करते हुए लकरूक ने कहा कि पुलिस की लगातार पूछताछ और हिरासत से लद्दाख में शांति बहाल नहीं होने वाली है.
एलएबी के एक बयान में कहा गया है, ‘धमकी से सामान्य स्थिति नहीं लौटेगी. गोबाओं (नंबरदारों) से पूछताछ अन्यायपूर्ण है. उन्होंने विरोध प्रदर्शन नहीं भड़काया, बल्कि ग्रामीणों से संवाद करने का अपना कर्तव्य निभाया.’
राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत राजस्थान के जोधपुर की केंद्रीय जेल में बंद वांगचुक का जिक्र करते हुए लकरूक ने कहा कि उनके भाई और उनके कानूनी सलाहकार ने हाल ही में उनसे मुलाकात की और पुष्टि की कि उनका स्वास्थ्य ठीक है.
एलएबी के बयान के अनुसार, ‘वांगचुक ने बताया है कि जब तक इन हत्याओं की स्वतंत्र न्यायिक जांच शुरू नहीं हो जाती, तब तक वह जेल में ही रहेंगे. सर्वोच्च निकाय ने लद्दाख को छठी अनुसूची का दर्जा और राज्य का दर्जा दिलाने के लिए चल रहे शांतिपूर्ण संघर्ष के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई और सरकार से क्षेत्र में स्थिरता और विश्वास बहाल करने के लिए ईमानदारी से कदम उठाने का आह्वान किया.’
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