तेलंगाना: स्थानीय निकायों में पिछड़े वर्गों को 42% आरक्षण देने वाले सरकारी आदेश पर हाईकोर्ट की रोक

तेलंगाना हाईकोर्ट ने आगामी स्थानीय निकाय चुनावों में पिछड़े वर्गों को 42% आरक्षण देने वाले सरकारी आदेश पर रोक लगा दी. याचिकार्ताओं ने तर्क दिया है कि बढ़ा हुआ कोटा कुल आरक्षण पर संवैधानिक रूप से अनिवार्य 50% की सीमा का उल्लंघन करता है.

तेलंगाना हाईकोर्ट. (फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: तेलंगाना हाईकोर्ट ने गुरुवार (9 अक्टूबर) को आगामी स्थानीय निकाय चुनावों में पिछड़े वर्गों (बीसी) को 42% आरक्षण देने वाले सरकारी आदेश पर रोक लगा दी, जिससे चुनाव प्रक्रिया तत्काल अनिश्चितता में पड़ गई और राज्य भर में एक तीखी राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया.

मुख्य न्यायाधीश एपी सिंह और जस्टिस जीएम मोहिउद्दीन की पीठ ने अंतरिम रोक लगाते हुए चुनाव अधिसूचना पर प्रभावी रूप से रोक लगा दी और ग्रामीण चुनावों की तैयारियों को ठप कर दिया.

परिणामस्वरूप अदालत ने राज्य चुनाव आयोग द्वारा दिन में जारी अधिसूचना पर भी रोक लगा दी, जिसके तहत 23 अक्टूबर को 292 जिला परिषद प्रादेशिक निर्वाचन क्षेत्रों (जेडपीटीसी) और 2,964 मंडल परिषद प्रादेशिक निर्वाचन क्षेत्रों (एमपीटीसी) के लिए पहले चरण के चुनाव होने थे.

जेडपीटीसी एक जिले में मंडलों का प्रतिनिधित्व करते हैं, जबकि एमपीटीसी एक मंडल के भीतर गांवों का प्रतिनिधित्व करते हैं. तेलंगाना में ग्रामीण स्थानीय निकायों के चुनाव पिछले निकायों के कार्यकाल समाप्त होने के 21 महीने बाद हो रहे हैं.

अदालत ने राज्य सरकार को चार सप्ताह के भीतर जवाबी हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है, तथा इसके बाद याचिकाकर्ताओं को जवाब देने के लिए दो सप्ताह का समय दिया है, तथा अगली सुनवाई छह सप्ताह में निर्धारित की गई है.

इसका फैसला सरकारी आदेश (जीओ) संख्या 9 को चुनौती देने वाली रिट याचिकाओं के एक समूह पर दो दिनों की गहन बहस के बाद आया. याचिकाकर्ताओं का मुख्य तर्क यह है कि आदेश, जिसने बीसी कोटा को 42% तक बढ़ा दिया, कुल आरक्षण पर संवैधानिक रूप से अनिवार्य 50% की सीमा का उल्लंघन करता है.

कानूनी चुनौती

याचिकाकर्ताओं में से एक का प्रतिनिधित्व करते हुए वरिष्ठ वकील बी. मयूर रेड्डी ने तर्क दिया कि सरकार का निर्णय सर्वोच्च न्यायालय की स्थापित मिसाल और मौजूदा राज्य कानून का सीधा उल्लंघन है.

उन्होंने तर्क दिया कि अनुसूचित जातियों (15%) और अनुसूचित जनजातियों (10%) के लिए मौजूदा आरक्षणों के साथ बढ़ा हुआ कोटा कुल आरक्षण को 67% तक बढ़ा देगा, जो ऐतिहासिक इंदिरा साहनी और के. कृष्णमूर्ति मामलों में निर्धारित 50% की सीमा का उल्लंघन करता है.

इस अधिनियम में संशोधन के लिए मार्च 2025 में विधानमंडल द्वारा पारित एक विधेयक को अभी तक राज्यपाल की स्वीकृति नहीं मिली है.

सुनवाई के दौरान पीठ ने सरकार के दृष्टिकोण पर भी सवाल उठाया और कहा कि सरकारी आदेश 9 ने पूरे राज्य में एक समान 42% आरक्षण लागू किया है, जबकि स्थानीय निकायों के बीच पिछड़ी जातियों की आबादी में काफी अंतर हो सकता है.

राज्य के पक्ष का बचाव करते हुए महाधिवक्ता सुदर्शन रेड्डी ने अदालत को बताया कि यह निर्णय एक व्यापक जाति सर्वेक्षण पर आधारित है, जिसमें पाया गया कि तेलंगाना की जनसंख्या में पिछड़े वर्ग की हिस्सेदारी 57.6% है. उन्होंने तर्क दिया कि आरक्षण में वृद्धि समुदाय के राजनीतिक पिछड़ेपन को दूर करने के लिए की गई थी, जिसे राज्य विधानसभा ने सर्वसम्मति से मंजूरी दी थी.

यह कानूनी तब लड़ाई हाईकोर्ट पहुंची जब 6 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट ने हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया और याचिकाकर्ता को पहले राज्य उच्च न्यायालय जाने का निर्देश दिया.

राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू

अदालत के फैसले के बाद सभी प्रमुख दलों में आरोप-प्रत्यारोप और बचाव का दौर शुरू हो गया.

सत्तारूढ़ कांग्रेस ने गहरी निराशा व्यक्त की और तुरंत विपक्ष पर उंगली उठाई. पिछड़ा वर्ग कल्याण मंत्री पूनम प्रभाकर ने इस रोक को ‘अप्रत्याशित’ बताया और कहा कि सरकार आदेश की समीक्षा के बाद आगे की कार्रवाई तय करेगी.

हाईकोर्ट के बाहर बोलते हुए मंत्री जुपल्ली कृष्ण राव ने और भी स्पष्ट रूप से कहा, ‘यह बीआरएस (भारत राष्ट्र समिति) पार्टी थी जिसने अदालत में मामले दायर किए थे. भाजपा और बीआरएस ने पिछड़ा वर्ग आरक्षण को रोकने के लिए एकजुट होकर काम किया. राज्यपाल द्वारा विधेयक को मंज़ूरी न देने का कारण केंद्र में भाजपा सरकार है.’

मंत्री वक्ति श्रीहरि ने भावुक टिप्पणी करते हुए कहा, ‘ऐसा लग रहा है जैसे पिछड़े वर्गों के मुंह से निवाला छीन लिया गया हो. बीआरएस ने भाजपा के साथ मिलकर पिछड़ा वर्ग आरक्षण में बाधा डाली है. हमने स्थगन रोकने की पूरी कोशिश की.’

हालांकि, विपक्ष ने सरकार पर अक्षमता, कपट और राजनीतिक नाटक का आरोप लगाते हुए चौतरफा हमला किया.

बीआरएस नेता टी. हरीश राव ने ट्वीट किया कि 42% आरक्षण एक ‘नाटक’ है, और मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी को राष्ट्रीय स्तर के कानून के लिए ‘दिल्ली के मंच पर लड़ने’ की चुनौती दी.

बीआरएस के एक अन्य नेता गंगुला कमलाकर ने मुख्यमंत्री पर पाखंड का आरोप लगाया. कमलाकर ने कहा, ‘दिल्ली में आपने कहा था कि यह मुद्दा राहुल गांधी के प्रधानमंत्री बनने के बाद ही सुलझ सकता है, फिर आप हैदराबाद आए और एक सरकारी आदेश जारी कर दिया. आपको पता था कि यह सरकारी आदेश टिक नहीं पाएगा.’

भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष एन. रामचंदर राव ने सरकार पर जल्दबाजी और बिना सोचे-समझे कदम उठाने का आरोप लगाया. उन्होंने तर्क दिया कि सरकार अब अपनी प्रक्रियागत कमियों के लिए ‘हमें दोष’ देने की कोशिश कर रही है.

उन्होंने कहा, ‘इस नतीजे की पूरी ज़िम्मेदारी राज्य सरकार की है.’ साथ ही, उन्होंने कानूनी तौर पर लागू होने पर 42% आरक्षण के प्रति अपनी पार्टी की प्रतिबद्धता दोहराई.

एक और निजी हमला करते हुए भाजपा सांसद धर्मपुरी अरविंद ने मुख्यमंत्री पर ध्यान भटकाने का आरोप लगाया. अरविंद ने ज़ोर देकर कहा, ‘यह रेवंत द्वारा अपने अक्षम प्रशासन और असफल वादों को छिपाने के लिए रचा गया नाटक है. वह पिछड़े वर्गों के स्वाभिमान से खिलवाड़ कर रहे हैं.’

भाजपा सांसद और प्रमुख पिछड़ा वर्ग नेता आर. कृष्णैया ने इस मुद्दे को सम्मान की लड़ाई बताया. उन्होंने आंदोलन के लिए तैयार समुदाय के सदस्यों की सैकड़ों कॉलों का ज़िक्र करते हुए कहा, ‘यह भूख के ख़िलाफ़ लड़ाई नहीं है; यह अपमान के ख़िलाफ़ लड़ाई है.’

उन्होंने समर्थकों से शांत रहने का आग्रह किया और विश्वास जताया कि अंततः न्याय की जीत होगी.

चुनाव प्रक्रिया स्थगित होने के साथ स्थानीय निकाय चुनावों और बढ़े हुए पिछड़ा वर्ग आरक्षण का भविष्य अब अधर में लटक गया है.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)