लखनऊ का फिरंगीमहल: इतिहास ऐसा कि ताज को ईर्ष्या हो… 

लखनऊ में फिरंगीमहल नाम की एक ऐतिहासिक इमारत भी है और मुहल्ला भी. लेकिन जानें क्यों, इस महल या मुहल्ले की दूसरे ऐतिहासिक महलों व मुहल्लों जैसी चर्चा नहीं होती, जबकि आज़ादी की लड़ाई में इनके योगदान का इतिहास इतना गौरवशाली है कि उसकी बाबत जानकर दुनिया के सात आश्चर्यों में शामिल आगरा के ताजमहल को भी ईर्ष्या होने लग जाए!

खिलाफ़त आंदोलन के दौरान महात्मा गांधी लखनऊ आए तो वे फिरंगीमहल में ही एक कमरे में ठहरे थे. (फोटो साभार: सोशल मीडिया)

लखनऊ में फिरंगीमहल नाम की एक ऐतिहासिक इमारत भी है और मुहल्ला भी. लेकिन जानें क्यों, इस महल या मुहल्ले की दूसरे ऐतिहासिक महलों व मुहल्लों जैसी चर्चा नहीं होती, जबकि आज़ादी की लड़ाई में इनके योगदान का इतिहास इतना गौरवशाली है कि उसकी बाबत जानकर दुनिया के सात आश्चर्यों में शामिल आगरा के ताजमहल को भी ईर्ष्या होने लग जाए!

अपने समय के प्रतिष्ठित लखनऊविद डाॅ. योगेश प्रवीन, जो अब इस संसार में नहीं हैं, लखनऊ आने वालों को इनके बारे में विस्तार से बताया करते थे. उनके अनुसार पहली बार लखनऊ आने वाले पर्यटक इनकी बाबत जानने में खास दिलचस्पी लेते थे.

दरअसल, लखनऊ में चौक और विक्टोरिया रोड के बीच स्थित फिरंगीमहल (इमारत) के इर्द-गिर्द की बसाहट (मुहल्ले) को भी फिरंगीमहल नाम से ही जाना जाता है, जबकि फिरंगीमहल के निर्माण से कई रोचक किस्से और वाकये जुड़े हुए हैं. यह भी कहा जाता है कि फिरंगीमहल का नाम भले ही फिरंगीमहल है, यह कभी पूरी तरह फिरंगियों का हुआ नहीं.

एक किस्से के अनुसार सत्रहवीं शताब्दी में (जब लखनऊ का देश की प्रमुख मंडियों में शुमार किया जाता था) कुछ फ्रांसीसी व्यापारी दिल्ली दरबार की सनद लेकर नील और घोड़ों का व्यापार करने लखनऊ आए. इन व्यापारियों में एक का खुद का नाम भी नील था.

कुछ ही दिनों में ये व्यापारी लखनऊ और उसकी तहजीब पर पर ऐसे फिदा हुए कि उन्होंने यहां ऐसी आलीशान इमारत बनवानी शुरू कर दी, जो न सिर्फ अपने खास आकर्षण बल्कि उनके विदेशी मूल के कारण भी, कालांतर में फिरंगी महल के रूप में जानी जाने लगी.

बस नाम का फिरंगी 

लेकिन इन व्यापारियों के अच्छे दिनों की उम्र बहुत लंबी नहीं हो पाई. बुरा दौर आया तो वे फिरंगीमहल से जुड़ा अपना एक भी अरमान नहीं निकाल पाए. उनके लिए सनद जारी करने वाले दिल्ली दरबार की नजरें मुगल बादशाह औरंगजेब की हुकूमत के वक्त उन पर ऐसी टेढ़ी हुईं कि शाही फरमान जारी कर फिरंगी महल को जब्त कर लिया गया और जब तक वे इसके खिलाफ फरियाद करते, मुल्ला असद-बन-कुतुब शहीद और उनके भाई मुल्ला असद-बन-कुतबुद्दीन शहीद को सौंप दिया गया. तब कई लोग चुटकी लेकर कहने लगे कि यह फिरंगीमहल तो फिरंगियों को रास ही नहीं आया.

यहां  जान लेना चाहिए कि मुल्ला असद-बन-कुतुबुद्दीन शहीद बादशाह औरंगजेब के इस्लामी मामलों के सलाहकार थे और उन्होंने फिरंगीमहल पर कब्जा पाते ही अपने भाई के साथ मिलकर वहां एक बेहतरीन इस्लामी संस्थान बनाने की दिशा में काम आरंभ कर दिया.

जल्दी ही उनकी मेहनत रंग लाई और उनके संस्थान की इंग्लैंड के कैम्ब्रिज और ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालयों से तुलना की जाने लगी. न सिर्फ इस्लामी संस्कृति और परंपराओं के संरक्षण में बल्कि स्वतंत्रता आंदोलन, खिलाफ़त आंदोलन और राष्ट्रीय एकता बढ़ाने में भी इस संस्थान की भूमिका उल्लेखनीय मानी जाती है.

जानकार बताते हैं कि इसके उलेमा खिलाफ़त आंदोलन के कट्टर समर्थक तो थे ही, उन्होंने अंग्रेज़ी राज के खिलाफ जेहाद का फतवा भी जारी किया था, जिसके चलते उनमें से कई को मृत्युदंड भी भुगतना पड़ा था.

खिलाफ़त आंदोलन के दौरान महात्मा गांधी लखनऊ आए तो वे फिरंगीमहल में ही एक कमरे में ठहरे थे. उस कमरे को अब उनकी यादों को समर्पित कर दिया गया है. वहां जाइए तो लोग बताते हैं कि ‘तब महात्मा जी अपनी बकरी भी साथ लाए थे और जब तक वे यहां रहे, महल और आसपास के मुसलमानों ने उनके सम्मान में मांस खाने से परहेज रखा था.’

1920 में महात्मा गांधी को पहली बार हिंदुओं और मुसलमानों दोनों का नेता घोषित करने वाले मौलवी अब्दुल बारी भी फिरंगीमहल की ही पैदायश थे. पंडित जवाहरलाल नेहरू और सरोजिनी नायडू भी गाहे-ब-गाहे फिरंगीमहल के आलिमों से सलाह-मशवरा करने आया करते थे.

दिलचस्प यह कि फिरंगी महल के प्रमुख कब्रिस्तान का नाम एक बाग के नाम पर अनवार बाग रखा गया है, जिसमें सुप्रसिद्ध शायर और पत्रकार मौलाना हसरत मोहानी का मजार भी है. हसरत मोहानी के बारे में बताते हैं कि वे कृष्ण के भक्त थे और बिना नागा प्रायः हर साल ब्रजभूमि की तीर्थयात्रा किया करते थे.

पाकिस्तान को ठेंगा 

कई जानकार कुर्रतुल ऐन हैदर के हवाले से ही भी बताते हैं कि स्वतंत्रता संघर्ष में फिरंगीमहल के उलेमाओं की चार पीढ़ियों ने योगदान दिया था और एक ने बंटवारे के बाद तमाम इसरार के बावजूद पाकिस्तान जाने से इंकार कर दिया था. इतना ही नहीं, इसके  उलेमाओं ने महात्मा गांधी की अगुवाई वाले 1920 के असहयोग आदोलन से बहुत पहले 1858 में ही गोरी सत्ता से असहयोग की नींव रख दी थी.

1857 में आज़ादी की पहली लड़ाई में बागी सेनाओं की शिकस्त के बाद 21 मार्च, 1858 को अंग्रेज जनरल सर काल्विन कैंपवेल के नेतृत्व में गोरी फौज लखनऊ में दाखिल हुई तो उसने अकबरी दरवाजे से दिलकुशा तक पूरे शहर को खुदवाकर रख दिया और शहरियों पर तरह-तरह के अत्याचार करने आरंभ कर दिए थे.

तब मौलाना अब्दुर्रज्जाक फिरंगीमहली ने फिरंगीमहल स्थित अपने घर से गोरों से असहयोग का आह्वान किया था. इसमें न सिर्फ अंग्रेज़ी बूट समेत कई ब्रिटिश उत्पादों बल्कि रेल यात्रा तक के बहिष्कार का आह्वान शामिल था.

मौलाना अब्दुर्रज्जाक फिरंगीमहली सूफी संत भी थे. इसलिए उनके आह्वान पर देश भर में बड़ी संख्या में फैले उनके मुरीदों और शार्गिदों द्वारा ब्रिटिश उत्पादों का इस्तेमाल रोक देने से ईस्ट इंडिया कंपनी खासे दबाव में आ गई थी.

मौलाना अब्दुर्रज्जाक फिरंगीमहली की जगाई अलख को अपने-अपने वक्त में उनके बेटे मौलाना अब्दुल वहाब फिरंगीमहली और पौत्र मौलाना अब्दुल बारी फिरंगीमहली ने भी परवान चढ़ाया था. 1926 में मौलाना अब्दुल बारी फिरंगीमहली के इस संसार को अलविदा कह देने के बाद उनके भतीजे व दामाद मौलाना कुतबुद्दीन  फिरंगीमहली ने उनकी विरासत संभाली थी.

1947 में बंटवारा हुआ तो चौधरी खलीकुज्जमां के छोटे भाई चौधरी मुशरिकउज्जमा ने फिरंगीमहल आकर उनको पाकिस्तान जाने की दावत और वहां तमाम सहूलियतें दिलाने का वादा किया था.  लेकिन मौलाना ने सख्ती से उन्हें मना कर दिया और कहा कि वे अपने हिंदुस्तान में बहुत खुश हैं.

बहरहाल, कम ही लोग जानते हैं कि लखनऊ को इस ऐतिहासिक फिरंगीमहल ही नहीं, आगरा के ताजमहल जैसी एक ‘मुहब्बत की निशानी’ के लिए भी जाना जाता रहा है. इस निशानी को लखनऊ का ताजमहल भी कहा जाता रहा है.

लखनऊ का ताज 

आगरा का ताजमहल, बकौल शकील बदायूंनी, एक शहंशाह द्वारा सारी दुनिया को दी गई मुहब्बत की निशानी हो या जैसा कि साहिर लुधियानवी फरमा गए हैं, गरीबों की मुहब्बत का मजाक, ‘लखनऊ का ताजमहल’ पूरी तरह से मुहब्बत की निशानी ही है.

इरादत नगर कर्बला में डालीगंज रेलवे स्टेशन के सामने और शिया डिग्री कालेज के पीछे अद्भुत इराकी स्थापत्य शैली में बनी यह इमारत भले ही आगरा के ताज जितनी हसीं नहीं, उल्टे बदहाल भी है और शोहरत में भी उसके सामने नहीं ठहरती, सादगी में अपना सानी नहीं रखती.

डाॅ. योगेश प्रवीन बताया करते थे कि इससे जुड़ी अवध के दूसरे बादशाह नसीरुद्दीन हैदर ( 20 अक्टूबर, 1827-07 जुलाई, 1837) और उनकी सबसे प्यारी बेगम कुदसियामहल की विफल प्रेमगाथा में इतिहास ने आगरा के ताज से जुड़ी शाहजहां व मुमताजमहल की प्रेमगाथा को बेहद खूबसूरत ढंग से दोहराया है.

ज्ञातव्य है कि बेगम कुदसियामहल का मां-बाप का दिया नाम बिस्मिल्लाखानम था. वे मीर हैदर नामक सितारबाज की बीवी थीं और कमसिनी में ही दो बेटों की मां बन गई थीं. आगे चलकर गर्दिश आयी और गुजर-बसर मुश्किल होने लगी तो उन्होंने बादशाह नसीरुद्दीन की खास बेगम की, जो बादशाहमहल कहलाती थीं, ड्यौढ़ी में नौकरी कर ली और थोड़े ही दिनों बाद बेगम ताजमहल के महल में कनीज बन गईं.

लेकिन उनकी किस्मत तब बुलंद हुई, जब उन्हें बेगम मलिका-ए-जमानी की बांदीगिरी मिली. रूप-यौवन सम्पन्न तो वे थीं ही, अपनी दिलकश अदाओं से बादशाह की नजरों में ऐसी जा चढ़ीं कि वे उन्हें पाने को बेकरार हो उठे.

दीवानगी हद पार कर गई तो बादशाह ने उनके पति को शाही मुजरिम घोषित कर दिया.  ‘समझदार’ पति ने उनकी नीयत भांपने में देर नहीं की और बिस्मिल्ला खानम को तलाक देकर अवध की सरहद के पार भाग गया.

फिर तो बादशाह इद्दत की मुद्दत तक भी सब्र नहीं कर सके और 17 दिसंबर, 1831 को निकाह के बाद लखनऊ में छतरमंजिल के सामने स्थित कोठी दर्शनविलास बिस्मिल्लाखानम की नजर कर दी. और कुछ मांगने को कहा तो बिस्मिल्लाखानम बोलीं, ‘बस इतना करार कीजिए कि कभी किसी बात को लेकर मुझ पर शक न करेंगे. किया तो मैं जिंदा नहीं रह सकूंगी.’

इससे और खुश हुए बादशाह ने उनका नया नाम कुदसियामहल रखा और उनके बेटे व बाप को भी ‘अपना’ लिया.

अभी कुछ ही दिन बीते थे कि बादशाह ने उनसे अपने उत्तराधिकारी की चाहत बयां कर दी. लेकिन कुदसिया बेगम गर्भवती हुईं तो उनसे खार खाए बैठी मलिका-ए-जमानी का सौतियाडाह जाग उठा. उन्होंने प्यारी नाम की महलदारनी से मिलकर षडयंत्रपूर्वक कुदसियामहल का गर्भ गिरवा दिया.

शक का कहर

भेद खुला तो आपे से बाहर हुए बादशाह ने जमादारनी को तलवार भोंक दी और कुदसियामहल को दिलकुशा कोठी ले आए. वहां वे फिर उम्मीद से हुईं तो मलिका-ए-जमानी फिर घात से बाज नहीं आईं. बादशाह को विश्वास दिला दिया कि कुदसियामहल उनके प्रति बेवफा हो गई हैं और यह गर्भ उन्हें बादशाह से नहीं उनके पूर्व पति से ठहरा है, जो हुजूर की गैरहाजिरी में उनसे मिलने आता रहता है.

उनका यह दांव ऐसा चला कि बादशाह ने एक बार अकेले मिल लेने की कुदसियामहल की दरख्वास्त भी मंजूर नहीं की. इससे कुदसियामहल उनको कभी उनपर शक न करने का करार याद दिलाने से भी वंचित हो गईं.

आहत होकर वे बादशाहबाग गईं, नींबू की शिकंजी में संखिया (जहर) मिलाया और गटागट पी गईं. इसके बाद खून की उल्टियों से जल्दी ही उनकी हालत बेहद खराब हो गई तो बादशाह को खबर दी गई. घबराए हुए-से वे आए तो वे रुंधे गले से बोलीं, ‘आपने अपना करार तोड़ दिया, लेकिन मैं अपना करार कैसे तोड़ती!’

उनकी सांसें रुकीं तो बादशाह पागलों की तरह सिर धुनने लगे. 21 अगस्त, 1834 को समूचे लखनऊ ने बादशाह के साथ बेगम कुदसियामहल का मातम मनाया.

बाद में बादशाह ने अपनी वसीयत में लिखा, ‘कुदसियामहल मेरी सबसे वफादार बेगम थीं और इंतकाल के बाद मुझे उनके बगल में ही दफनाया जाए.’

वसीयत के मुताबिक सात जुलाई, 1837 को वे इरादत नगर की कर्बला में बेगम कुदसियामहल की कब्र के एकदम बगल में दफनाए गए, जहां बाद में मुहब्बत की उक्त निशानी तामीर की गई.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)