एक डॉक्टर की कई सालों की मेहनत के बाद सरकार ने भ्रामक ओआरएस पेय पर रोक लगाई

हैदराबाद की बालरोग विशेषज्ञ सिवरंजनी संतोष की लंबी क़ानूनी लड़ाई के बाद एफएसएसएआई ने आदेश दिया है कि कोई भी फूड ब्रांड ‘ओआरएस’ शब्द का इस्तेमाल नहीं कर सकता, जब तक उत्पाद डब्लूएचओ के मानकों के अनुरूप न हों. भ्रामक लेबलिंग को रोकने और उपभोक्ताओं को सही जानकारी देने की दिशा में यह बड़ा क़दम है.

एफएसएसएआई का कहना है कि किसी भी खाद्य उत्पाद के नाम में ‘ओआरएस’ का उपयोग, चाहे वह फल आधारित हो, गैर-कार्बोनेटेड हो या रेडी-टू-ड्रिंक - खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम, 2006 और संबंधित नियमों का उल्लंघन है. (प्रतीकात्मक फोटो साभार: ब्लिंकिट)

नई दिल्ली: हैदराबाद की एक बालरोग विशेषज्ञ ने लंबे समय से शुगर युक्त पेयों के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी, जिन्हें गलत तरीके से ओरल रिहाइड्रेशन सॉल्यूशन्स (ओआरएस) के रूप में बेचा जा रहा था.

इसके परिणामस्वरूप एक बड़ा नियामक बदलाव हुआ. भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) ने आदेश जारी किया है कि कोई भी फूड ब्रांड अपने उत्पादों पर ‘ओरल रिहाइड्रेशन सॉल्ट्स’ या ‘ओआरएस’ शब्द का इस्तेमाल नहीं कर सकता, जब तक कि उसका फॉर्मूलेशन विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ) द्वारा सुझाए गए मानकों के पूरी तरह से अनुरूप न हो.

द हिंदू के मुताबिक, 14 अक्टूबर को जारी इस आदेश में सभी पहले दी गई अनुमतियों को तुरंत वापस लेने का निर्देश दिया गया है, जो फूड बिजनेस ऑपरेटर्स (FBOs) को अपने ब्रांड नाम के साथ ‘ओआरएस’ शब्द का इस्तेमाल करने की अनुमति देती थीं.

विशेष रूप से, यह दो पुराने आदेशों (14 जुलाई 2022 और 2 फरवरी 2024) को रद्द करता है, जिनमें कहा गया था कि ‘ओआरएस’ को ट्रेडमार्क (ब्रांड का नाम) में आगे या पीछे जोड़ा जा सकता है, बशर्ते लेबल पर यह स्पष्ट लिखा हो कि ‘यह उत्पाद डब्लूएचओ द्वारा सुझाए गए ओआरएस फॉर्मूले के अनुसार नहीं है.’

भ्रामक लेबलिंग

14 अक्टूबर के आदेश के अगले दिन यानी 15 अक्टूबर को एफएसएसएआई ने एक विस्तृत स्पष्टीकरण जारी किया, जिसमें दोहराया गया कि किसी भी खाद्य उत्पाद के नाम में ‘ओआरएस’ का उपयोग, चाहे वह फल आधारित हो, गैर-कार्बोनेटेड हो या रेडी-टू-ड्रिंक – खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम, 2006 और संबंधित नियमों का उल्लंघन है.

नियामक ने कहा कि इस तरह की लेबलिंग ‘गलत, भ्रामक, अस्पष्ट और त्रुटिपूर्ण नाम या लेबल विवरण के माध्यम से उपभोक्ताओं को भ्रमित करती है,’ और इसलिए अधिनियम की कई धाराओं का उल्लंघन करती है.

एक बाल रोग विशेषज्ञ की लड़ाई

यह नियामक हस्तक्षेप बाल रोग विशेषज्ञ सिवरंजनी संतोष द्वारा चलाए गए लगातार कानूनी अभियान का परिणाम है, जिन्होंने लगभग दस साल पहले ही भ्रामक मार्केटिंग पर सवाल उठाना शुरू कर दिया था.

2022 में उन्होंने तेलंगाना हाईकोर्ट में एक पीआईएल (पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन) दायर की, जिसमें उन पेय पदार्थों की बिक्री को चुनौती दी गई, जिन्हें गलत तरीके से ओआरएस (ओरल रिहाइड्रेशन साल्ट्स) के रूप में प्रचारित किया जा रहा था, जबकि वे डब्लूएचओ द्वारा सुझाए गए इलेक्ट्रोलाइट और ग्लूकोज मानकों के अनुरूप नहीं थे.