लद्दाख: 24 सितंबर की हिंसा की न्यायिक जांच का आदेश, लेह में फिर लगी सार्वजनिक समारोहों पर रोक

केंद्रीय गृह मंत्रालय ने शुक्रवार को 24 सितंबर को लेह में सुरक्षा बलों की गोलीबारी में चार प्रदर्शनकारियों की मौत की घटना के न्यायिक जांच का आदेश दिया है. इसी दिन सूबे के प्रशासन ने लेह ज़िले में सार्वजनिक गतिविधियों पर प्रतिबंध लगा दिया है. कहा जा रहा है कि यह रोक नागरिक समाज द्वारा शनिवार को प्रस्तावित 'शांति मार्च' को विफल करने के लिए लगाई गई है.

26 सितंबर कोई हुई हिंसा के बाद लगे कर्फ्यू के दौरान लेह का एक बाजार. (फोटो: पीटीआई)

श्रीनगर: लद्दाख में मौजूदा संकट को उजागर करने के लिए नागरिक समाज द्वारा आयोजित ‘शांति मार्च’ से एक दिन पहले, शुक्रवार (17 अक्टूबर) को, केंद्र शासित प्रदेश प्रशासन ने लेह ज़िले में सार्वजनिक समारोहों पर प्रतिबंध लगाने का एकपक्षीय आदेश जारी किया.

यह प्रतिबंध उसी दिन लगाया गया जब केंद्रीय गृह मंत्रालय ने 24 सितंबर को लेह में सुरक्षा बलों की गोलीबारी में चार प्रदर्शनकारियों की मौत की घटना की न्यायिक जांच का आदेश दिया. यह जांच सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश बीएस चौहान की अगुवाई में होगी.

ज्ञात हो कि हिंसा की न्यायिक जांच लेह एपेक्स बॉडी (एलएबी) और करगिल डेमोक्रेटिक अलायंस (केडीए), जो लद्दाख में संवैधानिक सुरक्षा उपायों और लोकतंत्र की बहाली के लिए आंदोलन का नेतृत्व कर रहे हैं, की प्रमुख मांगों में से एक थी.

लेह ज़िला मजिस्ट्रेट रोमिल सिंह डोंक द्वारा शुक्रवार को जारी आदेश में लेह पुलिस के एसएसपी की एक अनिर्दिष्ट रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा गया है कि लेह तहसील में ‘सार्वजनिक शांति और सौहार्द भंग होने, इंसानी जिंदगी को ख़तरा होने और क़ानून-व्यवस्था की समस्या पैदा होने की आशंका’ है. एसएसपी की रिपोर्ट (पीए/कॉन्फ़/2025-6649 दिनांक 17/10/2025) के मद्देनज़र ‘सार्वजनिक व्यवस्था और सौहार्द बनाए रखने’ के लिए ‘तत्काल रोकथाम और निवारक उपाय’ आवश्यक हैं.

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) 2023 की धारा 163 लागू करते हुए ज़िला प्रशासन ने ‘सक्षम प्राधिकारी की पूर्व लिखित स्वीकृति’ के बिना लेह में जुलूस, रैली और मार्च पर प्रतिबंध लगा दिया.

मालूम हो कि धारा 163 मजिस्ट्रेटों को सार्वजनिक समारोहों पर रोक लगाने या उन्हें प्रतिबंधित करने के व्यापक अधिकार देती है, हालांकि सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला दिया है कि पुराने कानून की धारा 144 के तहत अपराध को कवर करने वाले इस कानून का इस्तेमाल ‘असाधारण’ परिस्थितियों में बहुत कम किया जाना चाहिए.

बताया जा रहा है कि सार्वजनिक समारोहों पर प्रतिबंध लगाने के आदेश का असर लद्दाख के शैक्षणिक संस्थानों पर भी पड़ने की संभावना है, जिन्हें पिछले महीने भड़की हिंसा के बाद से बार-बार बंद किया गया है.

इसके साथ ही ज़िला प्रशासन ने लाउडस्पीकर के इस्तेमाल पर भी रोक लगाई है. लेह तहसील में पांच या उससे अधिक लोगों के इकट्ठा होने पर प्रतिबंध लगाने वाले आदेश में कहा गया है कि ‘कोई भी ऐसा बयान नहीं देगा जिससे सार्वजनिक शांति भंग हो और कानून-व्यवस्था की समस्या पैदा हो.’

प्रशासन ने चेतावनी दी है कि आदेश का उल्लंघन करने पर ‘बीएनएस 2023 की धारा 223 के तहत दंडात्मक कार्रवाई की जाएगी’.

धारा 223, बीएनएसएस की धारा 163 के उल्लंघन के लिए दंड का प्रावधान करती है और मजिस्ट्रेट को उल्लंघन की लिखित शिकायतों की जांच करने और यदि शिकायत किसी सरकारी अधिकारी द्वारा की जाती है, तो आरोपी को सुने बिना एफआईआर दर्ज करने का आदेश देने का अधिकार देती है.

‘शांति मार्च’ रोकने के लिए आया आदेश?

ऐसा लगता है कि लेह प्रशासन का यह आदेश उस ‘शांति मार्च’ को रोकने के उद्देश्य से लाया गया, जिसकी घोषणा इस सप्ताह की शुरुआत हुई थी. लद्दाख के नागरिक समाज के संयुक्त नेतृत्व, जिसमें एलएबी और केडीए शामिल भी हैं, ने क्षेत्र में मौजूदा राजनीतिक संकट को सामने रखने के लिए इस मार्च को आयोजित करने का सोचा था.

यह मार्च शनिवार को सुबह 10 बजे से दोपहर 12 बजे तक पूरे लद्दाख में आयोजित होनी थी, जिसके बाद शाम 6 बजे से रात 9 बजे तक ‘पावर ब्लैकआउट’ (बिजली बंद करना) किया जाता.

मंगलवार को लेह में मीडिया से बात करते हुए केडीए नेता असगर अली करबलाई ने कहा था कि इस मार्च का उद्देश्य भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार को एक संदेश देना है.

करबलाई ने कहा, ‘जब तक लद्दाखियों को न्याय और उनके संवैधानिक अधिकार, खासकर राज्य का दर्जा और छठी अनुसूची में शामिल नहीं किया जाता, वे चुप नहीं बैठेंगे.’ तब करबलाई के साथ एलएबी के सह-अध्यक्ष चेरिंग दोरजय लकरूक और अन्य नेता भी मौजूद थे.

हिंसा की न्यायिक जांच

इससे पहले शुक्रवार को ही गृह मंत्रालय ने बताया था कि जस्टिस चौहान के नेतृत्व में एक न्यायिक आयोग 24 सितंबर को लेह में ‘कानून-व्यवस्था की गंभीर  समस्या पैदा करने वाली  परिस्थितियों’ और ‘पुलिस कार्रवाई’ में ‘चार नागरिकों की दुर्भाग्यपूर्ण मौत’ की जांच करेगा.

लेह पुलिस ने हिंसा के सिलसिले में बीएनएस की धारा 189, 191(2), 191(3), 190, 115(2), 118(1), 118(2), 326, 324, 326(सी), 326(एफ), 326(जी), 309, 109, 117(2), 125, 121(1) और 61(2) के तहत एफआईआर (144/2025) दर्ज की है.

गृह मंत्रालय के आदेश में कहा गया है कि सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश को न्यायिक सचिव के रूप में सेवानिवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश मोहन सिंह परिहार और प्रशासनिक सचिव के रूप में आईएएस अधिकारी तुषार आनंद द्वारा ‘न्यायिक जांच’ में सहायता दी जाएगी.

न्यायिक जांच की घोषणा करने वाले आदेश को व्यापक रूप से केंद्र सरकार द्वारा एलएबी-केडीए गठबंधन के साथ अनौपचारिक वार्ता फिर से शुरू करने की दिशा में एक शांति प्रस्ताव के रूप में देखा जा रहा है, जो पिछले महीने हुई हिंसा के बाद पटरी से उतर गई थी.

गृह मंत्रालय ने शुक्रवार को कहा, ‘सरकार हमेशा किसी भी समय बातचीत के लिए तैयार रही है. हम लद्दाख पर उच्चाधिकार प्राप्त समिति या ऐसे किसी भी मंच के माध्यम से एलएबी-केबीए के साथ चर्चा का स्वागत करते रहेंगे.’

आगे कहा गया, ‘हमें यक़ीन है कि निरंतर बातचीत से निकट भविष्य में वांछित परिणाम प्राप्त होंगे. सरकार लद्दाख के लोगों की आकांक्षाओं के प्रति प्रतिबद्ध है.’