मां की परछाइयां: लकीरें जो साथ चलती हैं, प्रश्न पूछती हैं

पुस्तक समीक्षा: अरुंधति रॉय की 'मदर मैरी कम्स टू मी' में उनकी मां उनके जीवन रूपी उपन्यास में ऐसे पात्र के रूप में उपस्थित हैं, जो उनकी कथा का केंद्र तो हैं पर उनके इर्द-गिर्द जीवन बिताना उन्हें मंज़ूर नहीं. वह उनके जीवन की सबसे बड़ी आंधी हैं और उस अंधड़ से बचने का आश्रय भी.

/
यह आत्मकथा व्यक्तित्व के निर्माण में खपने वाली शक्तियों को भी दिखला पाने का एक स्पेस देती है. अरुंधति जो कभी लेखिका बनने की चाह रखती थीं, अपनी इस वास्तविक धुन को बहुत बाद में जाकर अपना पाती हैं. (फोटो साभार: आवरण पृष्ठ/Penguin Hamish Hamilton)

‘When I find myself in times of trouble 
Mother Mary comes to me
Speaking words of wisdom, let it be 
And in my hour of darkness 
She is standing right in front of me 
Speaking words of wisdom, let it be’ 

कम लोगों को पता होगा कि अरुंधति रॉय की हालिया बहुप्रतीक्षित आत्मकथा ‘मदर मैरी कम्स टू मी’ का शीर्षक साठ के दशक में विश्वप्रख्यात रहे रॉक बैंड ‘बीटल्स’ के एक मशहूर गीत की पंक्तियों से लिया गया है. इस गीत को पॉल मैकार्टनी ने अपनी मां की स्मृति में लिखा था. पचपन साल बाद अरुंधति रॉय को अपनी मां के व्यक्तित्व को शब्दों में ढालने के लिए यही सबसे उपयुक्त नज़र आया. फ़र्क यह है कि जिस प्रकार बीटल्स के गीत में मदर मैरी, let it be (जाने दो) के रूप में जीवन का एक फ़लसफ़ा देती हैं, अरुंधति की मां जिन्हें वह मिसेज़ रॉय कहकर बुलाती हैं, जीवन में किसी भी बात को भुलाए नहीं जाने की सबसे बड़ी पक्षधर थीं.

अंग्रेजी में एक कहावत है कि सत्य गल्प से कहीं विचित्र हो सकता है. आत्मकथा कई बार जीवन की विचित्रताओं और अनुभव की असीमता के कारण इतनी रोचक और कल्पनातीत लगने लगती है कि पाठकों को किसी उपन्यास की-सी अनुभूति हो सकती है.

‘मदर मैरी कम्स टू मी’ में लेखिका पाठकों को विकल्प देती हैं कि इसे वे चाहें तो उपन्यास की तरह भी पढ़ सकते हैं क्योंकि कभी भी अपने विषय में भी सब कुछ नहीं कहा जा सकता. इसीलिए यह आत्मकथा लेखिका के जीवन को आद्योपांत जानने का माध्यम नहीं बन पाती पर उनके जीवन के उन निर्णायक क्षणों को समझने की एक दृष्टि अवश्य देती है, जिससे आप अरुंधति को, उनकी प्रतिबद्धताओं को समझ सकते हैं.

मैरी रॉय, जो केरल की प्रसिद्ध शिक्षाविद और सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में जानी जाती हैं, एक मुकम्मल शख़्सियत थीं, जिनके विषय में ‘लार्जर दैन लाइफ’ उक्ति संभवतः सबसे सटीक होगी. मैरी रॉय अपने बच्चों के लिए पारंपरिक मां की सीमित, समाज-निर्धारित भूमिका से कहीं आगे बढ़कर उस दमकती बिजली की तरह दैदीप्यमान बन जाती हैं जिसकी रोशनी सब पर पड़ती है, वह कल्याण भी कर सकती है और किसी पर गिरकर विनाश भी ला सकती है.

मां-बेटी के संबंधों पर प्रायः कई प्रख्यात लेखिकाओं ने अपनी कलम चलाई है. चाहे वह नोबेल विजेता एनी एरनौ हों (A women’s story) या दक्षिण अफ्रीकी लेखिका, देबोरा लेवी (The cost of living) या इटालियन लेखिका, एलेना फर्रान्टे (The lost daughter), सबने मां-बेटी के संबंधों के कई संश्लिष्ट और बारीक आयाम दिखलाए हैं. इन लेखिकाओं ने अपने मां के ऐसे सहज चित्र गढ़े हैं जो उनकी समाज-सम्मत पारंपरिक छवियों पर प्रश्न करते हैं.

इन किताबों की मां ममत्त्व और प्रेम से भरी दैवीय स्त्रियां नहीं हैं. बल्कि अवसादग्रस्त, अपूर्ण, समस्याग्रस्त इंसान हैं. मां होने से पहले वह एक स्त्री है, अपने गुण-अवगुणों के साथ और अपने अस्तित्व के प्रति सचेत है. अरुंधति भी मैरी रॉय के इस सचेतन अस्तित्व को, उसकी शक्तियों और दुर्बलताओं को तटस्थ दृष्टि से देखती हैं.

उनकी मां उनके जीवन रूपी उपन्यास में ऐसे पात्र के रूप में उपस्थित हैं, जो उनकी कथा का केंद्र है पर उस केंद्र के इर्द-गिर्द एक संतान के रूप में अपने जीवन को बिताना जिन्हें मंज़ूर नहीं है. इसीलिए वह उनके जीवन की सबसे बड़ी आंधी भी हैं और उस अंधड़ से बचने का आश्रय भी.

मां और बेटी के संबंधों को उसकी मनोवैज्ञानिकता में ग्रहण करता हुआ यह आत्मकथ्य इसीलिए नितांत निजी होते हुए भी एक चिकित्सक की-सी तटस्थता रखता है और मानवीय स्वभाव की विचित्रताओं का संसार हमारे सामने खोलता है.

‘मदर मैरी’ की केंद्रीय पात्र अरुंधति और उनकी मां हैं. बाकी सभी व्यक्ति चाहे भाई (एल.के.सी.) हों, या पिता (मिकी रॉय), या मैरी रॉय के अपने भाई ( जी. इसाक) या अरुंधति के पति (प्रणय कृष्ण)- इस कथा के सहायक पात्र हैं, उसे उसके उद्देश्य तक पहुंचाने में मदद करते हैं.

चूंकि यह एक व्यक्ति की आत्मकथा है और व्यक्ति किसी निर्वात में तो नहीं रहता, इसीलिए यह अरुंधति के समय और समाज की भी कहानी है.यह आत्मकथा ‘व्यक्ति’ अरुंधति  की वैचारिक-सामाजिक प्रतिबद्धताओं की भी झलकियां देती है.

चाहे वह अपने आस-पास फैलता दक्षिणपंथी रुझान और उससे गहराती हुई सांप्रदायिकता हो (1984, बाबरी मस्जिद, गोधरा नरसंहार) या हिंदू राष्ट्रवाद की रक्षा के लिए अल्पसंख्यकों को दरकिनार करते जाने की क़वायद (बुखारी और अफजल गुरु इत्यादि के मृत्यु दंड), तथाकथित ‘कल्याणकारी’ राज्य  की विकास के नाम पर पूंजीवादी शक्तियों से सांठगांठ की रणनीति (नर्मदा बचाओ आंदोलन) या आंतरिक सुरक्षा का मुद्दा बना कर आदिवासियों के अधिकारों का हनन ( दंडकारण्य में दमन), या लोकतांत्रिक आश्वासनों और मानवाधिकारों का हनन (अर्बन नक्सल के नाम पर होने वाली अवैध गिरफ्तारियां), यह सब लेखिका अरुंधति के नहीं, बल्कि एक संवेदनशील और जागरूक व्यक्ति के सरोकार हैं. यह आत्मकथा इन सभी पड़ावों पर उनके अनुभवों का पक्ष दिखलाती है. इस रूप में यह राज्य सत्ता के विरुद्ध भुक्तभोगियों का पक्ष दिखलाने वाला दस्तावेज बन जाती है.

अपने पहले उपन्यास ‘द गॉड ऑफ स्मॉल थिंग्स’ (1997) के बाद जिस सफलता को अरुंधति ने जिया, वह उनके योजनाविहीन, यायावरी जीवन के एक बड़ी घटना थी. यह उनके संघर्षों की सुखद परिणति के रूप में समझा जा सकता है या एक अधिक ज़िम्मेदार नागरिक बनकर जीने की दैनंदिन चुनौती के रूप में भी. इस किताब से मिलने वाले आर्थिक लाभ ने कभी पैसों के लिए मोहताज़ रहे जीवन में सभी असुरक्षाएं ख़त्म कर दी हों, पर अरुंधति इंगित करती हैं कि सिर्फ एक किताब उनके जीवन के पारिभाषिक शब्द नहीं हैं.

यह आत्मकथा व्यक्तित्व के निर्माण में खपने वाली शक्तियों को भी दिखलाती है. अरुंधति जो कभी लेखिका बनने की चाह रखती थीं, अपनी इस वास्तविक धुन को बहुत बाद में जाकर अपना पाती हैं. उससे पहले वो हर वो काम करती हैं जो उन्हें शायद उनके लेखकीय भविष्य के लिए ही समृद्ध कर रहा था. शराबी पिता से मां के अलगाव के बाद अरुंधति और उनके भाई का जीवन पारंपरिक परिवार के घेरे से हमेशा बाहर रहा. पर इन वजहों से अरुंधति अपनी अकुंठ और बेखौफ़ ज़हनीयत पा सकीं.

आत्मकथा उनके बचपन से शुरू होती है, जब मैरी रॉय आसाम के चाय बागानों में कार्यरत शराबी पति को तलाक देकर अपने दो छोटे बच्चों के साथ तमिलनाडु आ जाती हैं. सीरियन क्रिश्चियन समुदाय के लिए अपनी बिरादरी से बाहर शादी करना और फिर उस शादी से निकलकर स्वयं के बलबूते पर जीवन जीना बड़ी बात थी.

आत्मकथा के पहले खंड में हम मैरी रॉय के विविधवर्णी स्वभाव, सबको अतिशय नियंत्रण में वाले व्यक्तित्व के रूप में देखने के साथ-साथ, एक महिला की अदम्य जिजीविषा की कहानी सुनते हैं. मैरी रॉय न केवल अपने दम पर एक विद्यालय खोलती हैं, बल्कि विद्यालय की गैर-रिवायती शिक्षा और छात्रों के विकास के लिए दिखलाई गई तत्परता से, वह और उनका आवासीय विद्यालय हर किसी के सम्मान का पात्र बनते हैं. अनुशासन और नियमों की पाबंद मैरी रॉय, अपने बच्चों के लिए भी श्रीमती रॉय थीं और अपनी न्यायप्रियता को सिद्ध करने के लिए अपने बच्चों के साथ और भी अधिक कठोर थीं.

इन भावनात्मक अभावों के बचपन ने अरुंधति में बगावत के बीज डाले जिसने उन्हें परंपरा की अंधभक्ति न करने वाला नॉन-कन्फॉर्मिस्ट बनाया. स्वयं मैरी रॉय अपने सीरियन क्रिश्चियन समुदाय के पितृसत्तात्मक और भेदभावपूर्ण नियमों को जीवनपर्यंत धता बताते रहीं. अपने रोड्स स्कालर रह चुके भाई जी. इसाक के विरुद्ध पुश्तैनी संपत्ति में पुत्री के समान अधिकारों की लड़ाई लड़ने वाली मैरी रॉय की पुत्री आगे चलकर अगर अन्याय और लोकतंत्र विरोधी निर्णयों के खिलाफ खड़ी रहें, तो इसमें ताज्जुब नहीं होना चाहिए. आत्मकथा का लंबा हिस्सा रॉय के मां मैरी के आश्रय से एक दिन चले जाने, दिल्ली में आर्किटेक्चर की पढ़ाई करने, रोज़गार के लिए संघर्ष की कहानी को समेटता है.

फ़िल्म ‘मेसी साहब’ में नायिका बनने और भावी पति प्रणय कृष्ण के साथ कई फिल्मों में पटकथा लिखने की अरुंधति की यात्रा एक व्यक्ति रूप में विकसित होने की कहानी है. अरुंधति के लेखन की एक विशेषता है कि उनकी दृष्टि अपने इर्द-गिर्द फैले भीषण भेदभाव को नज़रअंदाज़ नहीं करती.

स्वयं उनके अपने शुरुआती संघर्ष के दिन निज़ामुद्दीन दरगाह में रैन बसेरा लेने वाले साथियों के साथ सुबह की चाय पीते हुए बीते थे. वह वंचित और साथ ही ‘स्त्री’ होने के अनुभव से वाबस्ता थीं. साथ ही अपने वर्ग और पृष्ठभूमि से मिलने वाले विशिष्ट अधिकार (मसलन, अंग्रेजी बोल पाने) को भी पहचान पाने की क्षमता रखती थीं. कई बार वह उन अनुभवों से भी वाबस्ता हुई जो अमूमन एक स्त्री के लिए किसी भी प्रकार से सुरक्षित अनुभव नहीं समझे जाएंगे.

कई ऐसे स्थल भी हैं आत्मकथा में, जहां पाठक उनके निर्णयों पर एक आलोचनात्मक नज़र डाल सकते हैं. मसलन भीमा कोरेगांव मुद्दे में जब आंदोलन के साथ सहानुभूति रखने वाले बौद्धिक समर्थकों की धर-पकड़ चल रही थी, अरुंधति अपनी दूसरी किताब ‘मिनिस्ट्री ऑफ अट्मोस्ट हैप्पीनेस’ पूरी कर चुकी थीं और उसके प्रकाशन के अंतिम चरण में थीं. उन्हें भी हिरासत में लिया जा सकता था. बकौल अरुंधति

उस वक़्त जेल जाने का ख़याल ही दिल दहलाने वाला था… मुझ पर अंजुम और किताब के बाकी सभी किरदारों की ज़िम्मेदारी थी. अगर मैं जेल जाती, तब मेरे साथ वो भी क़ैद हो जाते. मुझे लगा कि उन्हें दुनिया में लाना, उनकी बात दुनिया तक पहुंचाना मेरा फ़र्ज़ है. उन्हें बचाने के मैंने वह सब किया जो सोचा भी नहीं था . मैं भाग गई. मैंने लंदन का टिकट कटा लिया.

(फोटो साभार: पेंगुइन इंडिया/फेसबुक)

वह आगे लिखती हैं कि इस तरह घटनास्थल से भाग जाने ने उन्हें अशांत किया और वह वापस भारत आ गईं. इस तरह के कई क्षण उन्होंने उद्धृत किए हैं जब वह अपने निर्णयों को दूर से देख पाती हैं. इसके बावजूद अरुंधति अपने संघर्ष के दिनों पर एक रोमांटिक भाव-बोध ले आती हैं. विशेषकर शुरुआती दिनों में जब वह केरल से दिल्ली आ कर बसती हैं.

लेकिन अपने अनुभवों से तटस्थ रहकर खुद को परख पाना ईमानदार आत्मकथा की निशानी है, जहां ड्रग्स लेने के अनुभव से लेकर गर्भपात करवाने की पीड़ा को तटस्थता से कह पाने का माद्दा वह रखती हैं. हम यह भी समझ पाते हैं कि कैसे अपनी मां के साथ एक तनावपूर्ण और संश्लिष्ट संबंध ने स्वयं अरुंधति को मातृत्व की भूमिका के लिए कभी आश्वस्त नहीं किया. पर इसका दूसरा पक्ष यह भी हो सकता है कि कैसे शायद वह अपने अनुभवों का ही उत्पाद थीं और इसीलिए ताउम्र उनकी यह कोशिश रही कि वह अपनी मां की परछाईं के रूप में सीमित न हो जाएं.

रॉय की यह आत्मकथा स्त्री के जीवट की कहानी है. कभी पुरुषवादी वर्चस्व से, कभी परिस्थितियों से लड़ने के लिए मर्दों जैसा ही सख़्त रवैया अपनाती हुई मैरी रॉय होना पड़ता है या अपने वाजिब हक़ के लिए लड़ते हुए अरुंधति बनना पड़ता है. चाहे वह फिल्म की पटकथा लेखक के रूप में अपना नाम दर्ज़ करवाने की लड़ाई हो या फिर अपनी सफलता -एक स्त्री की सफलता- के लिए शर्मिंदा न महसूस करने का जज़्बा.

लेखिका के संदर्भों से काटकर इस रचना को नहीं देखा जा सकता. उनके अनुभव उनके निर्णयों और विशिष्ट परिस्थितियों से निर्मित हुए हैं, इसीलिए यहां साधारण कुछ भी नहीं है, पर चूंकि यह एक स्त्री के जीवन पर एक स्त्री की दृष्टि है तो इसका सहज जुड़ाव उस सामूहिकता से हो जाता है जिससे हम अपने-अपने स्तर पर जुड़ सकते हैं.

(अदिति भारद्वाज गद्यकार हैं, जो साहित्य और सिनेमा में रुचि रखती हैं.)