वकीलों के फोरम ने जस्टिस अतुल श्रीधरन के इलाहाबाद हाईकोर्ट में ट्रांसफर पर सवाल उठाए

वकीलों और कार्यकर्ताओं के एक फोरम ने मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के न्यायाधीश जस्टिस अतुल श्रीधरन के इलाहाबाद हाईकोर्ट में तबादले में सरकार की भूमिका की निंदा की है. संगठन का कहना है कि सरकार के अनुरोध पर उनके स्थानांतरण में बदलाव की परिस्थितियां न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर चिंताजनक प्रश्न उठाती हैं.

जस्टिस अतुल श्रीधरन की पहले छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में स्थानांतरण की सिफारिश की गई थी. अब उन्हें इलाहाबाद हाईकोर्ट भेजा जा रहा है. (फोटो साभार: सोशल मीडिया)

नई दिल्ली: वकीलों और न्यायिक कार्यकर्ताओं के एक फोरम ने मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के न्यायाधीश जस्टिस अतुल श्रीधरन के इलाहाबाद हाईकोर्ट में तबादले की निंदा की है.

मालूम हो कि भारत के मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई की अध्यक्षता वाले सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने 15 अक्टूबर को एक बेहद असामान्य स्वीकारोक्ति में कहा था कि सरकार द्वारा अपने पहले के फैसले पर ‘पुनर्विचार’ की मांग के बाद कॉलेजियम ने एक न्यायाधीश के स्थानांतरण संबंधी अपनी सिफारिश बदल दी है.

द टेलीग्राफ की खबर के मुताबिक, फोरम ने इस निर्णय को जस्टिस श्रीधरन द्वारा राज्य मंत्री विजय शाह के खिलाफ दिए गए उनके प्रतिकूल फैसले से जोड़ा है.

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में जस्टिस श्रीधरन उस खंडपीठ का हिस्सा थे, जिसने मीडिया में आई उन खबरों के बाद मामले का स्वतः संज्ञान लिया था, जिनमें कहा गया था कि राज्य के मंत्री विजय शाह ने भारतीय सेना की अधिकारी कर्नल सोफिया कुरैशी के खिलाफ कथित तौर पर विवादास्पद टिप्पणी की थी.

इस मामले में अदालत ने सुनिश्चित किया था कि राज्य पुलिस द्वारा मंत्री के खिलाफ एफआईआर दर्ज की जाए.

कैंपेन फॉर ज्यूडिशियल एकाउंटेबिलिटी एंड रिफॉर्म्स (सीजेएआर) ने कहा कि जस्टिस श्रीधरन का तबादला मूल रूप से छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय में होना था, लेकिन केंद्र के कहने पर उन्हें इलाहाबाद उच्च न्यायालय स्थानांतरित कर दिया गया, जिससे ‘न्यायपालिका की स्वतंत्रता’ को लेकर चिंता पैदा होती है.

सीजेएआर ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने अगस्त में जस्टिस श्रीधरन सहित 14 न्यायाधीशों को मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय से छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय स्थानांतरित करने की सिफारिश की थी. इसके बाद शीर्ष अदालत ने एक बयान जारी कर कहा कि ‘सरकार द्वारा पुनर्विचार के अनुरोध पर’ कॉलेजियम ने अपना निर्णय बदल दिया है और जस्टिस श्रीधरन का इलाहाबाद हाईकोर्ट में स्थानांतरण करने का फैसला किया गया है.

सीजेएआर ने कहा, ‘सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम के बयान में इस बात का कोई कारण नहीं बताया गया है कि सरकार ने पुनर्विचार का अनुरोध क्यों किया और कॉलेजियम को सरकार की मांगों पर सहमत होने और अपने निर्णय बदलने के लिए किस बात ने प्रेरित किया.’

‘स्थानांतरण की परिस्थितियां न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर चिंताजनक सवाल उठाती हैं’

सीजेएआर ने आरोप लगाया कि मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय में जस्टिस श्रीधरन उस खंडपीठ का हिस्सा थे जिसने कर्नल कुरैशी के खिलाफ टिप्पणी करने पर भाजपा नेता शाह के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का आदेश दिया था.

सीजेएआर ने कहा, ‘हालांकि स्थानांतरण उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में सेवा का एक हिस्सा है, लेकिन उनके स्थानांतरण की परिस्थितियां न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर चिंताजनक प्रश्न उठाती हैं.’

सीजेएआर ने कहा कि जस्टिस श्रीधरन की स्वतंत्र और मुखर छवि थी, जो सरकारों को उनके कार्यों के लिए जवाबदेह ठहराने के लिए तत्पर रहते थे.

संगठन ने आगे कहा, ‘ऐसे न्यायाधीश को अस्पष्ट कारणों से इधर-उधर स्थानांतरित होते देखना जनता को कॉलेजियम की मंशा पर सवाल उठाने पर मजबूर करता है.’

संगठन ने दावा किया कि जस्टिस श्रीधरन का इलाहाबाद स्थानांतरण एक ‘दंडात्मक’ पदस्थापना है, जिसने उन्हें छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के पद पर पदोन्नत होने के अवसर से वंचित कर दिया.

उन्होंने कहा कि इस सिफारिश में बदलाव का आधार संविधान के उलट है.

‘पारदर्शिता का पूर्ण अभाव’

सीजेएआर के अनुसार, ‘दो संविधान पीठों ने पहले फैसला सुनाया था कि स्थानांतरण जनहित और न्यायपालिका की संस्था की रक्षा के लिए होने चाहिए, न कि केंद्र सरकार की सुविधा या हितों के लिए.’

इसमें आगे कहा गया है कि इस मामले में पारदर्शिता का पूर्ण अभाव चिंताजनक है.

गौरतलब है कि 25 अगस्त को कॉलेजियम ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस अतुल श्रीधरन का छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय में स्थानांतरण करने की सिफारिश की थी. इसके बाद सरकार के अनुरोध पर जस्टिस श्रीधरन की इलाहाबाद हाईकोर्ट में स्थानांतरण करने की सिफारिश की गई.

कॉलेजियम की ओर से जारी एक बयान में कहा गया, ‘सरकार द्वारा पुनर्विचार के लिए मांगे गए अनुरोध पर सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने 14 अक्टूबर, 2025 को आयोजित अपनी बैठक में यह सिफारिश करने का फैसला लिया कि मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के न्यायाधीश जस्टिस अतुल श्रीधरन को छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के बजाय इलाहाबाद हाईकोर्ट में स्थानांतरित किया जाए.’

हालांंकि, कॉलेजियम ने अतीत में भी न्यायाधीशों के स्थानांतरण के अपने निर्णय पर पुनर्विचार किया है, लेकिन बयान में यह स्पष्ट करना असामान्य है कि सरकार ने पुनर्विचार की मांग की थी.

यदि जस्टिस श्रीधरन का छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय में स्थानांतरण होता, तो वे उस उच्च न्यायालय में दूसरे सबसे वरिष्ठ न्यायाधीश होते. लेकिन इलाहाबाद उच्च न्यायालय में वरिष्ठता में उनके सातवें स्थान पर होने की संभावना है.