न्यू इंडिया पर मंडराते ‘टोपी शुक्ला’ और ‘टोबा टेक सिंह’ के साये

मंटो की 'टोबा टेक सिंह' और राही मासूम 'रज़ा' का 'टोपी शुक्ला' आज भी प्रासंगिक हैं क्योंकि विभाजन 1947 में खत्म हो चुका कोई अध्याय नहीं है. दक्षिण एशिया की राजनीति में यह हमेशा मौजूद रहा है. जब भी नागरिकों से 'वो यहीं के हैं' ये साबित करने के लिए कहा जाता है, जब ध्रुवीकरण का नतीजा किसी चुनावी जीत के तौर पर निकलता है, बंटवारे को दोहराया जाता है.

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(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रवर्ती/द वायर)

पढ़ने के शौकीन ज़्यादातर लोग जानते हैं कि कुछ किताबें या कहानियां पढ़ने वालों के ज़ेहन में एक ख़ास जगह बना लेती हैं. मैंने राही मासूम रज़ा का उपन्यास ‘टोपी शुक्ला’ और सआदत हसन मंटो की कहानी ‘टोबा टेक सिंह‘ कई बार पढ़े हैं और मैं उनके भावपूर्ण कहन से कभी नहीं थकता.

इन्हें पढ़ने से मुझे कुछ संवेदनाओं के मेरे भीतर बसे होने का पता चलता रहता है. अफ़सोस की बात है कि राही मासूम रज़ा और मंटो ने हमें बहुत पहले ही उन ख़तरों से आगाह कर दिया था जिनका हम आज सामना कर रहे हैं. उनकी कृतियां आज के दौर को बहुत ही महत्त्वपूर्ण तरीके से बयां करती हैं.

दोनों ही एक विभाजित समाज की दरारों की झलक पेश करते हैं- ऐसी दरारें जो आज कहीं ज़्यादा प्रासंगिक और गहरी हैं. बंटवारे के ज़ख्म 78 साल से भी ज़्यादा पुराने हैं, पर फिर भी वे कभी नहीं भरे. वे हमारी सामूहिक स्मृति में बसे हुए हैं, वे हमारे पूर्वाग्रहों में ज़ाहिर होते हैं, जिनसे हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी और राजनीति तय होती हैं. अब जब मैं बढ़ते सांप्रदायिक ध्रुवीकरण और अपने ही देशवासियों की नागरिकता पर सवाल उठते देखता हूं, तो इन रचनाओं को पढ़ना कोई साहित्यिक गतिविधि कम और हमारे समय के नैतिकताओं का विश्लेषण करने जैसा ज्यादा लगता है.

मेरी राय में 1955 में लिखी गई ‘टोबा टेक सिंह’, विभाजन की सबसे पीड़ादायक कहानी है. एक पागलखाने की पृष्ठभूमि पर आधारित यह कहानी उन कैदियों की आपबीती दिखाती है जिन्हें भारत और पाकिस्तान के बीच अदला-बदली के लिए भेजा जाना था, जो 1947 के जबरन पलायन का प्रतीक है.

इस कहानी में एक सिख बिशन सिंह हैं, जिनका अपने गृहनगर ‘टोबा टेक सिंह’ के बारे में बुदबुदाना कहानी का मुख्य आकर्षण है. जब उन्हें बताया जाता है कि उनका गांव अब पाकिस्तान में है, तो वह ग़ैर-मुस्लिम होने के नाते भारत भेजे जाने की बेतुकी बात को समझ नहीं पाते. अंत में, दो नए देशों के बीच नो-मैंस लैंड में उनका गुज़रना सरहदों के प्रति पागलपन का एक भयावह प्रतीक बन जाता है.

यह मंटो की प्रतिभा थी, जिसने विभाजन को देशभक्ति के खोल से उघाड़कर निरी मूर्खता के तौर पर पेश किया. कहानी पढ़ते हुए हमें एहसास होता है कि पागलखाने में ‘पागल’ ही सबसे ज़्यादा समझदारी से बात करते हैं, और उनके नामों की लिस्ट लिए फिरते नौकरशाह असली पागलपन का प्रतीक बन जाते हैं. बिशन सिंह की मौत सिर्फ़ बंटवारे का रूपक नहीं है, बल्कि हर उस कोशिश का रूपक है जो लोगों को उनकी ज़मीं, उनके अपनों से दूर कर देती है. आज की तारीख़ में किसी किसी समझदार और संवेदनशील इंसान को बिशन सिंह की छवि उन अल्पसंख्यकों, प्रवासियों और शरणार्थियों की याद दिलाएगी, जिन्हें हर जगह पराया कर दिया गया है, जिनकी न कोई ज़मीन है न कोई अपना.

राही और मंटो ने हमें बहुत पहले ही उन ख़तरों से आगाह कर दिया था जिनका हम आज सामना कर रहे हैं. (फोटो साभार: सोशल मीडिया)

दरारें, जो बची रहीं

जहां मंटो ने अपनी लेखनी से बंटवारे की पीड़ा को आवाज़ दी, तो रज़ा ने यह दिखाया कि कैसे बरसों बाद भी इस विभाजन के निशान रोज़मर्रा की ज़िंदगी में बाक़ी रह गए हैं. उनका 1969 का उपन्यास ‘टोपी शुक्ला’ एक हिंदू लड़के टोपी और उसके मुस्लिम सहपाठी इफ़्फ़न की दोस्ती पर आधारित है. उनके रिश्ते और अंत में अलगाव के ज़रिये रज़ा मध्यमवर्गीय भारत में बसे पूर्वाग्रहों को खोलकर रख देते हैं.

मंटो के पागलखाने के रूपक के उलट, टोपी शुक्ला की कहानी में कक्षाएं हैं, राजनीतिक बहसें और परिवारों की आपसी बातचीत है. ऐसी जगहें हैं, जहां नैतिकता की आड़ में सांप्रदायिक घाव सड़ते रहते हैं. टोपी को जिस अलगाव का अनुभव होता है, वह एक ऐसी राजनीति का नतीजा है, जो विविधता को बचा पाने में असमर्थ है. टोपी की यातना यही है कि वह समाज द्वारा तय कर दी गई पहचानों को नहीं मानता, वैसे ही जैसे आज भी अनगिनत हिंदुस्तानी सोचते हैं.

मंटो और राही को साथ पढ़ना गहरी अंतर्दृष्टि देता है. जहां मंटो ने बंटवारे के तात्कालिक पागलपन को दर्ज किया है, वहीं रज़ा दिखाते हैं कि कैसे वही पागलपन ‘सम्मानित’ पूर्वाग्रह में तब्दील हो गया है. बिशन सिंह किसी भी सरहद के परे, नो मैंस लैंड में अपनी जान गंवा देता है वहीं टोपी शुक्ला के हिस्से में आती है धीरे-धीरे होने वाली सामाजिक मौत. भले ही वो ज़मीन पर खींची गई सरहद हो, या लोगों के दिलों में गहरी खिंची दरार, दोनों ही ऐसी जगहें हैं जहां इंसानियत के लिए कोई जगह नहीं बचती.

बंटवारे की आंच में पड़ता घी

ये कहानियां इतनी विचारोत्तेजक हैं क्योंकि विभाजन 1947 में बंद हो चुका कोई अध्याय नहीं है. दक्षिण एशिया की राजनीति में यह हमेशा से मौजूद रहा है. जब-जब नागरिकों से ‘वो यहीं के हैं’ ये साबित करने के लिए कहा जाता है, हर बार जब ध्रुवीकरण का नतीजा किसी चुनावी जीत के तौर पर निकलता है, जब अंतरधार्मिक दोस्तियों और रिश्तों को शक की नज़र से देखा जाता है, तब-तब बंटवारे को दोहराया जाता है.

भारत में आज सांप्रदायिक बयानबाज़ी में ख़तरनाक़ तरीके से बढ़ रही है. एक विशेष वर्ग को निशाना बनाने के लिए ‘घुसपैठिया’ जैसे शब्द राजनीतिक भाषणों में पूरी घुसपैठ कर चुके हैं और वाहवाही पा रहे हैं. नागरिकता अब पहचान का इम्तिहान है, जिसमें मुसलमानों को संदेह का खामियाजा भुगतना पड़ रहा है. साझा इतिहास और परंपराओं को मिटाने के लिए पाठ्यक्रमों को फिर से लिखा जा रहा है. बहुसंख्यक भावनाओं की रक्षा के नाम पर हेट क्राइम यानी घृणा आधारित अपराधों को सही ठहराया जा रहा है.

ऐसे माहौल में यह हैरानी की बात नहीं है कि साहित्य के ये टुकड़े आज भी इतने समकालीन लगते हैं. आज भी बिशन सिंह सरकारों और पहचानों के बीच फंसे हुए हैं, शिविरों या बस्तियों में ज़िंदगी बसर करने को मजबूर हैं, वे न यहां के हैं, न वहां के. टोपी शुक्ला सीधे हमारे विश्वविद्यालयों और नागरिक समाज से बात करता है, जहां दोस्ती, एकजुटता और असहमति को शक की निगाह से देखा जाता है, और राष्ट्रवाद के नाम पर सबके एक रंग में रंग जाने की चाह दिखती है.

ये रचनाएं आज तक इसलिए प्रासंगिक बनी हुई हैं क्योंकि इनमें वो सच्चाई दर्ज है, जिसे भारी-भरकम आधिकारिक इतिहास में दबा दिया गया, और यह सच ये है कि सांप्रदायिक विभाजन सबसे पहले और सबसे महत्वपूर्ण रूप से व्यक्तिगत जीवन को नष्ट करता है. टोबा टेक सिंह और टोपी शुक्ला को पढ़ा जाना चाहिए क्योंकि कला हमारे विवेक का काम करती है. यह हमें याद दिलाती है कि पूर्वाग्रह आज भी क़ायम हैं और हमें बांटने के पागलपन को सामने लाने की ज़रूरत है.

विभाजन की त्रासदी आज भी देश के भीतर रिस रही है. (फोटो साभार: विकीमीडिया कॉमन्स)

इसके साथ ही एक सबक और भी है- सरकारें अक्सर हमें विभाजन को गुज़रा हुआ कल मानकर इससे ‘आगे बढ़ जाने’ को कहती हैं, लेकिन हाल ही में इन कहानियों को दोबारा पढ़ते हुए मुझे इस बात का एहसास हुआ कि भूलना क्यों ख़तरनाक़ है.

भुला देना इसलिए सही नहीं है क्योंकि ग़लतियों को भूल जाना एक तरह से यह चाहना है कि उन भूलों को दोहराया जाए. मगर उन्हें याद रखने का अर्थ यह भी कतई नहीं है कि किसी तरह का बदला लेने की चाहत है. इन कहानीकारों की कला हिंसा के साथ एक ईमानदार संघर्ष की वकालत करती है ताकि हम अपनी इंसानियत को वापस पा सकें.

त्रासदी से सीख

भारत को असल में आज स्मृति की इसी राजनीति की ज़रूरत है. हमें बंटवारे को न तो राष्ट्र-निर्माण की जीत के तौर पर महिमामंडित करना चाहिए और न ही इसे भूलने की कोशिश करनी चाहिए. हमें इस त्रासदी, जिससे आज तक कोई सबक नहीं सीखा गया है- के मूल में छिपे सच को स्वीकार करना चाहिए जो यह है कि सांप्रदायिक राजनीति के असली शिकार ‘समुदाय’ भर नहीं होते, बल्कि इसका निशाना बनती हैं लोगों की दोस्तियां, निष्ठाएं और पहचान.

मैं चाहता हूं कि और लोग इन किताबों को दोबारा पढ़ें और समझें कि फिर पूर्वाग्रहों को देशभक्ति के चोले में पेश किया जा रहा है, पुरानी गलतियों को नए नारों की शक्ल दी जा रही है, और राजनीति में समझदारी और पागलपन के बीच की हद बेहद महीन है.

दोनों ही रचनाएं हमें यह पूछने पर मजबूर करती हैं कि जब समाज के लोग धर्म, राजनीति और पूर्वाग्रहों से बंटे हों, तो क्या है जो उन्हें साथ बांधे रखता है. इसका जवाब है बंधुत्व, भाईचारा- हमारे गणतंत्र का वो बिसरा दिया गया स्तंभ, जिसके बगैर आज़ादी और समानता टिक ही नहीं सकतीं.

ऐसे समय में जब हिंदुस्तान के सामने यह जोखिम है कि वो अपनी विविधता और सह-अस्तित्व की संस्कृति को खो सकता है, हमें एक बार फिर बिशन सिंह की ‘ओपड़ दी गुड़ गुड़ दी अनैक्स दी बे ध्याना दी मंग दी दाल…’ की बुदबुदाहट और टोपी शुक्ला की ख़ामोशी को सुनने की ज़रूरत है. क्या हम यह करने को तैयार हैं?

(लेखक राष्ट्रीय जनता दल के राज्यसभा सदस्य हैं.)