नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (27 अक्टूबर) को पश्चिम बंगाल में 100 दिन की रोज़गार योजना को फिर से शुरू करने का रास्ता साफ़ कर दिया और कलकत्ता हाईकोर्ट के 18 जून के फैसले के खिलाफ केंद्र की अपील खारिज कर दी, जिसमें पूर्वी राज्य में 1 अगस्त से इस कार्यक्रम को फिर से शुरू करने का निर्देश दिया गया था.
ज्ञात हो कि केंद्र ने दिसंबर 2021 में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम के तहत बंगाल को धन भेजना बंद कर दिया था, जिसमें बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार और अनियमितताओं, जिनमें फर्जी दावेदार भी शामिल थे, का आरोप लगाया गया था. इस योजना के तहत परियोजनाएं 2022 में राज्य में बंद हो गईं. 2023 तक केंद्र सरकार पर राज्य का 7,500 करोड़ रुपये बकाया था, जिसमें से अकेले श्रम मजदूरी 2,744 करोड़ रुपये थे.
द टेलीग्राफ की रिपोर्ट के मुताबिक, हाईकोर्ट ने कहा था कि बंगाल में योजना के कार्यान्वयन में कुछ अनियमितताएं हो सकती हैं, लेकिन यह पूरे कार्यक्रम को रोकने और हज़ारों गरीब ग्रामीण परिवारों की आजीविका को नुकसान पहुंचाने का कारण नहीं हो सकता.
उसने यह भी कहा था कि केंद्र कथित अनियमितताओं की जांच करने और कानून के तहत आगे बढ़ने के लिए स्वतंत्र है.
सोमवार को जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की सर्वोच्च न्यायालय की पीठ ने कहा कि उसे उच्च न्यायालय के फैसले में हस्तक्षेप करने का कोई कारण नहीं मिला है.
बंगाल सरकार का दावा है कि अप्रैल 2022 से शुरू होने वाली इस योजना के तहत केंद्र पर उसका लगभग 1.16 लाख करोड़ रुपये बकाया है.
वित्त वर्ष 2021-22 के अंत में इस योजना में भाग लेने वाले राज्य के हज़ारों परिवार अभी भी अपनी मज़दूरी का इंतज़ार कर रहे हैं.
तत्कालीन यूपीए सरकार द्वारा शुरू की गई इस योजना के तहत भारत का प्रत्येक ग्रामीण परिवार प्रति वर्ष 100 दिनों तक के सवेतन, अकुशल कार्य का हकदार है. परियोजनाओं का निर्णय पंचायत स्तर पर किया जाता है.
केंद्र ने बंगाल को मिलने वाली धनराशि रोकने के लिए मनरेगा अधिनियम की धारा 27 के तहत अपनी शक्तियों का प्रयोग किया था.
धारा 27 कहती है: (1) केंद्र सरकार इस अधिनियम के प्रावधानों के प्रभावी कार्यान्वयन के लिए राज्य सरकार को ऐसे निर्देश दे सकती है जो वह आवश्यक समझे.
धारा 27 की उपधारा (2) में प्रावधान है: उपधारा (1) के प्रावधानों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, केंद्र सरकार, किसी योजना के संबंध में इस अधिनियम के तहत दी गई निधियों के मुद्दे या अनुचित उपयोग के संबंध में कोई शिकायत प्राप्त होने पर, यदि प्रथम दृष्टया संतुष्ट हो कि ऐसा कोई मामला है, तो अपने द्वारा नामित किसी एजेंसी द्वारा की गई शिकायत की जांच करा सकती है और यदि आवश्यक हो, तो योजना के लिए फंड जारी करने से रोकने का आदेश दे सकती है और उचित समय के भीतर इसके उचित कार्यान्वयन के लिए उचित उपचारात्मक उपाय कर सकती है.
