धुंध भरे आसमान में 1.2 करोड़ रुपये की क्लाउड सीडिंग के बावजूद दिल्ली में नहीं हो सकी कृत्रिम बारिश

मंगलवार को धुंध से घिरे दिल्ली में बेहद ख़राब वायु गुणवत्ता के बीच 1.28 करोड़ रुपये की लागत से क्लाउड सीडिंग परीक्षण के ज़रिए कृत्रिम वर्षा कराने का प्रयास विफल रहा. आम आदमी पार्टी ने इस पर सवाल उठाते हुए कहा है कि जब एजेंसियों ने पहले कह दिया था कि दिल्ली में क्लाउड सीडिंग नहीं की जा सकती, तो रेखा गुप्ता सरकार ने कृत्रिम बारिश के सर्कस पर दिल्लीवालों का पैसा क्यों बर्बाद किया?

दिल्ली के आसमान पर छाई धुंध. (फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेतृत्व वाली दिल्ली सरकार ने मंगलवार को कहा कि शहर में बढ़ते प्रदूषण के बीच कृत्रिम वर्षा कराने का महंगा प्रयास असफल रहा. सरकार का कहना हैं कि अभी और भी प्रयोग किए जाने बाकी हैं.

यह बात उन्होंने धुंध से घिरे शहर में ‘बेहद खराब’ वायु गुणवत्ता के बीच क्लाउड सीडिंग परीक्षण के बाद कही.

हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, ऐसा बताया गया है कि दिल्ली में कृत्रिम वर्षा कराने के इस प्रयास पर 1 करोड़ रुपये से ज़्यादा खर्च हुए हैं.

आईआईटी कानपुर द्वारा संचालित एक छोटा, सिंगल-प्रोपेलर विमान मंगलवार को उत्तर-पश्चिम दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के कुछ हिस्सों के ऊपर मंडरा रहा था, जिससे दो क्लाउड सीडिंग परीक्षणों में सिल्वर आयोडाइड की लपटें निकलीं, लेकिन बारिश नहीं हो पाई – एक ऐसा प्रयास जिसे दिल्ली के पर्यावरण मंत्री ने अब भी ‘सफल’ बताया है.

नई दिल्ली में क्लाउड-सीडिंग परीक्षण के दौरान एक विमान फ्लेयर्स छोड़ता हुआ. (फोटो: पीटीआई)

मालूम हो कि दिल्ली कैबिनेट ने 7 मई को क्लाउड सीडिंग परियोजना को मंज़ूरी दी, जिसमें पांच परीक्षणों के लिए 3.21 करोड़ रुपये आवंटित किए गए- लगभग 64 लाख रुपये प्रति प्रयास.

आईआईटी कानपुर के साथ साझेदारी में किए गए इन परीक्षणों को शुरू में मई के अंत और जून की शुरुआत में आयोजित किया जाना था, लेकिन दो बार इन्हें स्थगित किया गया: पहली बार दक्षिण-पश्चिम मानसून के आगमन के कारण अगस्त के अंत और सितंबर की शुरुआत में तथा दूसरी बार क्षेत्र में लगातार बारिश के कारण.

अखबार के अनुसार, मंगलवार को किए गए दोनों परीक्षणों की कुल लागत लगभग 1.28 करोड़ रुपये थी.

क्लाउड सीडिंग क्या है?

क्लाउड सीडिंग एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके द्वारा बादलों में कृत्रिम रूप से वर्षा कराने के लिए सामान्य रसायनों का मिश्रण डाला जाता है. इन रसायनों (जैसे सिल्वर आयोडाइड, शुष्क बर्फ या लवण) से युक्त विस्फोटक फ्लेयर्स को मौजूदा बादलों में छोड़ने के लिए विमानों का उपयोग किया जाता है. इससे बादलों में मौजूद पानी की बूंदें अधिक नमी को आकर्षित करती हैं, भारी हो जाती हैं और बारिश के रूप में नीचे गिरती हैं.

क्लाउड सीडिंग का उपयोग मुख्य रूप से कृषि में सहायता के लिए, जल संकटग्रस्त क्षेत्रों में वर्षा कराने के लिए किया जाता रहा है.

भारतीय वैज्ञानिकों द्वारा हाल ही में किए गए एक अध्ययन में पाया गया है कि क्लाउड सीडिंग एजेंट फसल की पैदावार को बढ़ाते हैं, लेकिन अत्यधिक वर्षा पैदावार के लिए गंभीर जोखिम पैदा कर सकती है. 1970 के दशक से 50 से अधिक देशों ने ओलों को रोकने के लिए क्लाउड सीडिंग का उपयोग किया है, क्योंकि क्लाउड सीडिंग ओलों के कणों के आकार को भी कम करती है.

क्लाउड सीडिंग को खराब वायु गुणवत्ता से निपटने के एक अस्थायी समाधान के रूप में भी चिह्नित किया गया है. यह इसलिए कारगर है क्योंकि वर्षा वायुमंडल में महीन कण पदार्थ (पार्टीकुलेट मैटर-पीएम) – एक प्रमुख वायु प्रदूषक – के स्तर को कम करने के लिए जानी जाती है.

हालांकि, कोलकाता स्थित राज्य फॉरेंसिक विज्ञान प्रयोगशाला के भौतिकी विभाग से जुड़े शमीम हक मंडल के डाउन टू अर्थ में प्रकाशित लेख के अनुसार, ‘कृत्रिम वर्षा लंबे समय में तब तक मददगार नहीं होती जब तक समस्या का कारण पूरी तरह से दूर न हो जाए.’

हालांकि क्लाउड सीडिंग के कुछ लाभ हैं, लेकिन इस प्रक्रिया से वातावरण में सिल्वर आयोडाइड जैसे विषैले रसायन भी निकलते हैं. कुछ अध्ययनों से पता चलता है कि इन रसायनों के लगातार संपर्क में रहना मानव स्वास्थ्य और पर्यावरण के लिए खतरनाक हो सकता है.

उदाहरण के लिए, 2016 में हुए एक अध्ययन में पाया गया कि क्लाउड सीडिंग से निकलने वाला सिल्वर आयोडाइड वास्तव में ज़मीन और पानी दोनों में रहने वाले जीवों को प्रभावित कर सकता है – अगर यह प्रयोग किसी विशिष्ट क्षेत्र में बार-बार किया जाए और पर्यावरण में ऐसी सीडिंग सामग्री बड़ी मात्रा में जमा हो जाए.

वायु प्रदूषण से निपटने में पहली बार हुई सीडिंग

हालांकि, देश के कुछ हिस्सों में जल संकटग्रस्त क्षेत्रों – जैसे कि महाराष्ट्र के मराठवाड़ा में बारिश को बढ़ावा देने के लिए क्लाउड सीडिंग का इस्तेमाल किया गया है, यह संभवतः पहली बार है जब भारत में वायु प्रदूषण से निपटने के लिए क्लाउड सीडिंग प्रयोग किया जा रहा है.

ज्ञात हो कि 20 अक्टूबर को दिवाली के बाद से दिल्ली में वायु गुणवत्ता बेहद खराब बनी हुई है; वर्तमान में राष्ट्रीय राजधानी में वायु प्रदूषण बढ़ाने वाली गतिविधियों को सीमित करने के लिए ग्रेडेड रिस्पांस एक्शन प्लान का दूसरा चरण लागू है.

पिछला परीक्षण असफल रहा

पीटीआई की रिपोर्ट के अनुसार, इससे पहले किया गया एक परीक्षण भी असफल रहा था.

रिपोर्ट के अनुसार, सरकार ने पिछले हफ़्ते बुराड़ी के ऊपर एक परीक्षण उड़ान भरी थी, जिसमें कृत्रिम वर्षा कराने के लिए सिल्वर आयोडाइड और सोडियम क्लोराइड की थोड़ी मात्रा छोड़ी गई थी.

हालांकि, क्लाउड सीडिंग के लिए सामान्यतः आवश्यक 50% नमी के मुकाबले, 20% से भी कम वायुमंडलीय नमी के कारण वर्षा नहीं हो सकी.

विपक्षी आप ने क्लाउड सीडिंग अभियान पर सवाल उठाए

इस बीच, सूबे में विपक्षी दल आम आदमी पार्टी (आप) ने बुधवार (29 अक्टूबर) को दिल्ली सरकार के हालिया क्लाउड सीडिंग अभियान पर सवाल उठाते हुए कहा कि कृत्रिम बारिश के दावों के बावजूद कोई बारिश दर्ज नहीं की गई और राष्ट्रीय राजधानी में इस तरह के प्रयोगों की व्यवहार्यता पर संदेह जताया.

एक प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए आप के दिल्ली प्रमुख सौरभ भारद्वाज ने कहा, ‘पिछले कुछ दिनों से कहा जा रहा था कि दिल्ली के विभिन्न इलाकों में क्लाउड सीडिंग की गई है, लेकिन कहीं भी बारिश नहीं हुई.’

 

उन्होंने संसद में दिए गए पिछले बयानों का भी हवाला दिया, जहां तीन केंद्रीय सरकारी संस्थानों ने कथित तौर पर कहा था कि मौसम संबंधी और रासायनिक कारकों के कारण क्लाउड सीडिंग दिल्ली के लिए उपयुक्त नहीं है.

भारद्वाज ने पूछा, ‘जब इन एजेंसियों ने पहले ही कह दिया था कि दिल्ली में क्लाउड सीडिंग नहीं की जा सकती, तो अब इस तरह की कवायद की क्या ज़रूरत थी? फिर रेखा गुप्ता सरकार ने कृत्रिम बारिश के सर्कस पर दिल्लीवालों का पैसा क्यों बर्बाद किया?’