भोरे (गोपालगंज): बिहार विधानसभा चुनाव में गोपालगंज जिले का भोरे (सुरक्षित) एक ऐसा क्षेत्र हैं जहां सबकी निगाहें लगी है. यहां जेएनयू छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष भाकपा (माले) प्रत्याशी धनंजय का मुकाबला मुख्यमंत्री नीतीश के बेहद करीबी और राज्य के शिक्षा मंत्री सुनील कुमार से है.
सुनील कुमार 2020 का चुनाव 462 वोट के मामूली अंतर से जीत सके थे. पिछले चुनाव में उनका मुकबला भाकपा (माले) के युवा नेता जितेंद्र पासवान से हुआ था. जितेंद्र पासवान इस चुनाव में भी भाकपा माले से प्रत्याशी घोषित हुए थे लेकिन उन्हें नामांकन के दिन 2017 के एक केस में गिरफ्तार कर लिया गया. जितेंद्र पासवान की गिरफ्तारी से बनी विशेष परिस्थति में भाकपा माले ने जेएनयू छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष 29 वर्षीय धनजंय को चुनाव मैदान में उतार दिया.
36 वर्षीय जितेंद्र पासवान जुझारू युवा नेता हैं जिन्होंने इस क्षेत्र में सामंती दबदबे के खिलाफ संघर्ष करते हुए अपनी पहचान बनाई. उनकी गिरफ्तारी को लोग उन्हें चुनाव न लड़ने देने की साजिश बता रहे हैं.
बगहवा तिवारी गांव के दलित बस्ती में एक बुजुर्ग ने कहा, ‘जितेंद्र के साथे ढेर अन्याय भईल बा. पहिले उनके बेईमानी कई के हरावल गईल अउर ऐ बेरी चुनावे नाहीं लड़े देहल गईल. इ सबके ठीक से जवाब दियाई.’
पिछले चुनाव में कम अंतर से जितेंद्र पासवान की हार को माले समर्थक मतदाता मतगणना में धांधली करार देते हैं. कई गांवों में मिले जदयू के समर्थक भी स्वीकारते हैं कि पिछले चुनाव में जितेंद्र को ‘हरवा’ दिया गया था.
भोरे विधानसभा क्षेत्र यूपी के देवरिया और कुशीनगर जिले से सटा हुआ है. पढ़ाई, दवाई के अलावा रिश्तेदारी के लिए भोरे के लोगों का इन दोनों जिलों में आना-जाना होता है. दलित, पिछड़ी और अतिपिछड़ी जाति बाहुल्य भोरे ने सामंती दबदबे के खिलाफ लंबा संघर्ष किया है.
भाकपा (माले) ने गरीबों के सम्मान और अधिकार के लिए तीन दशक पहले यहां आंदोलन शुरू किया. गरीबों की गोलबंदी तेज हुई. उसी दौरान 24 नवंबर 1997 को माले नेता उमेश पासवान और उनके साथी मन्नु कुशवाहा की गोली मारकर हत्या कर दी गई.
भाकपा माले की पकड़
भाकपा (माले) आज इस क्षेत्र में साधारण जन में बेहद लोकप्रिय है. भोरे विधानसभा के तीनों प्रखंडों-भोरे, विजयीपुर और कटेया में निचले स्तर तक मजबूत संगठन है. पिछले पांच वर्ष में पंचायत चुनाव में माले को अच्छी सफलता मिली.
भोरे प्रखंड के खरपकवा गांव के युवा अभय बताते हैं कि पंचायत चुनाव में माले से जुड़े कई लोग मुखिया, बीडीसी चुने गए. पिछले विधानसभा चुनाव के बाद माले का जनाधार बहुत बढ़ा है. इसलिए हम इस बार बढ़त पर हैं.
जदयू प्रत्याशी 65 वर्षीय सुनील कुमार 1987 बैच के आईपीएस अधिकारी रहे हैं और 2020 में महानिदेशक पद से रिटायर होने के बाद राजनीति में आए. पिछले चुनाव में वह पहली बार लड़े और जीत गए. उन्हें मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का नजदीकी माना जाता है. उन्हें पहले मद्य निषेध मंत्री और 2024 में शिक्षा मंत्री बनाया गया.
सुनील कुमार के पिता चंद्रिका राम और भाई अनिल कुमार भी भोरे से विधायक रहे हैं. सुनील कुमार मूल रूप से विजयीपुर प्रखंड के महुअवा के रहने वाले हैं.
सुनील कुमार चुनावी प्रचार में भोरे-मीरगांव, भोरे-पगरा सड़क के चौड़ीकरण, कटेया बाइपास, भोरे-कटाया में कम्युनिटी हेल्थ सेंटर का निर्माण, अग्निशमन केंद्र की स्थापना, ग्रामीण सड़कों का निर्माण कार्य को गिनाते हुए वोट मांग रहे हैं. उनके लिए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार सभा कर चुके हैं. उन्होंने भी भोरे के विकास कार्य गिनाते हुए कहा कि ‘चारों तरफ काम कर दिया है. जानते हैं कितना काम हुआ है. सब अच्छा हो गया है.’
जदयू के कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा ने सभा में कहा, ‘सुनील बाबू ने बहुत कार्य कराया है. उनको सबसे बड़ा विभाग दिया गया.’

सुनील कुमार को बड़ा विभाग मिलने से बड़ा काम की उम्मीद कर रहे लोग निराश हुए हैं. दिघवा की रहने वाली दलित रिंकू देवी ने कहा कि हमारे बच्चे पढ़ने के लिए यूपी के देवरिया जिले में जाते हैं क्योंकि अच्छे स्कूल कॉलेज नहीं है. अब नीतीश कह रहे हैं जो यूपी में पढ़ा होगा उसे बिहार में नौकरी नहीं मिलेगी. यह कौन बात हुई ? यहां बढ़िया स्कूल कॉलेज होता तो हमारे बच्चे यूपी पढ़ने क्यों जाते?
भाकपा माले प्रत्याशी धनंजय अपनी सभाओं में डोमेसाइल नीति का सवाल उठा रहे हैं. वह कह रहे हैं कि बिहार का नौजवान यूपी या कहीं पढ़ा है, उसे नौकरी मिलनी चाहिए. वे माइक्रोफाइनेंस के कर्ज के सवाल, शिक्षा-स्वास्थ्य, बेरोजगारी, महंगाई के साथ-साथ भोरे में न्याय, सम्मान और अधिकार का सवाल उठा रहे हैं.
माले नेता महागठबंधन के चुनावी घोषणापत्र में हर घर में पक्की नौकरी, संविदा कर्मियों को नियमित करने, सभी महिलाओं को 2500 रुपये, जीविका सीएम को 30 हजार रुपये वेतन , पलायन रोकने आदि के मुद्दे को जोरशोर से उठा रहे हैं.

भाजपा-जदयू समर्थक भी शिक्षा मंत्री सुनील कुमार का क्षेत्र में कम रहना और लोगों से घुले मिले न रहने एक बड़ी कमी मानते हैं. भोपतपुरा में से उनके समर्थकों का भी कहना था कि वे कुछ लोगों के साथ ही घिरे रहते हैं. कमियां गिनाने के बावजूद भोपतपुर, कर्मासी गांव में कुछ लोग ऐसे मिले जिन्होंने साफ कहा कि वे आईपीएफ भाकपा माले को वोट नहीं देंगे.
माले के एक समर्थक ने कहा कि यह कहने वाले लोग सामंतवादी हैं और इसके खिलाफ पार्टी के संघर्ष से नफरत करते हैं.
छठ त्योहार और उसके बाद लगातार हो रही बारिश के बीच भोरे में चुनाव प्रचार तेज हो गया है. जदयू प्रत्याशी के समर्थन में केंद्रीय मंत्री ललन सिंह, भोजपुरी अभिनेता-सांसद मनोज तिवारी सभा-बैठक कर चुके हैं तो माले प्रत्याशी के प्रचार में महासचिव दीपंकर भट्टाचार्य के अलावा महात्मा गांधी के प्रपौत्र तुषार गांधी, किसान नेता डाॅ. सुनीलम, लेखक-सामाजिक कार्यकर्ता योगेन्द्र यादव, डाॅ. लक्ष्मण यादव सभा-बैठक कर चुके हैं. महागठबंधन से मुख्यमंत्री उम्मीदवार तेजस्वी यादव की एक नवंबर को मुसहरी में सभा हुई है.
भोरे में पिछले चुनाव में 11 प्रत्याशी चुनाव लड़े थे. जदयू के सुनील कुमार और माले के जितेंद्र कुमार के बीच सीधा मुकाबला हुआ था जिसमें 462 वोट के मामूली अंतर से सुनील कुमार विजयी हुए थे. जितेंद्र कुमार पासवान को 73,605 और सुनील कुमार को 74,067 वोट मिले थे. बाकी सभी प्रत्याशी चार हजार से कम मत पाए थे. आश्चर्यजनक रूप से 8,010 वोट नोटा पर पड़े थे. लोक जन शक्ति पार्टी की प्रत्याशी पुष्पा देवी 4,520 मत प्राप्त कर चौथे स्थान पर रहीं थीं.
इस बार पांच प्रत्याशी चुनाव मैदान में हैं. बसपा से सुरेंद्र कुमार राम, जन सुराज पार्टी से प्रीति किन्नर, आम आदमी पार्टी से धर्मेन्द्र कुमार राम भी चुनाव लड़ रहे हैं. जदयू और माले प्रत्याशी के अलावा जन सुराज पार्टी की प्रीति किन्नर का ही चुनाव प्रचार दिख रहा है.
शुरुआती चमक दिखाने वाली जनसुराज पार्टी धीरे-धीरे शिथिल पड़ने लगी है. पिछले चुनाव की तुलना में प्रत्याशियों की संख्या आधी से कम है. बसपा और जनसुराज पार्टी के प्रत्याशी इस बार मैदान में हैं तो लोजपा एनडीए गठबंधन के साथ है. मुकेश सहनी की वीआईपी पार्टी और आईपी गुप्ता की आईआईपी के साथ आने से महागठबंधन में अब सात दल शामिल हैं.
नई राजनीतिक परिस्थितियों के हिसाब से प्रत्याशियों के समर्थक अपने मतों का आकलन कर रहे हैं. युवाओं का झुकाव माले प्रत्याशी धनंजय की तरफ दिख रहा है. अतिपिछड़ी और पिछड़ी जातियों में भी उनकी अच्छी पहुंच के साथ भाजपा-जदयू के परंपरागत मतों में सेंध उनका पलड़ा भारी बना रही है.
इस बार लड़ाई सिमटी हुई है और मुकाबला पिछली बार की तरह सीधा है. एक तरफ जेएनयू में पढ़ा और छात्र संघ का पूर्व अध्यक्ष है तो दूसरी तरफ दिल्ली के सेंट स्टीफेंस कॉलेज से पढ़ाई कर आईपीएस अफसर रहा नेता. एक तरफ धुआंधार भाषण देने वाला युवा नेता तो दूसरी तरफ अफसर की तरह बोलने वाला शिक्षा मंत्री. एक तरफ बहुत कम संसाधन वाला प्रत्याशी है तो दूसरी तरफ सत्ता बल के साथ चलता उम्मीदवार.
भोरे में भूजा खा रहे युवा प्रिंस चौधरी ने चुनावी फिजां का बयान करते हुए कहा कि इस बार लहर और ललकार दोनों है.
(लेखक गोरखपुर न्यूज़लाइन वेबसाइट के संपादक हैं.)
