जोहरान ममदानी के विजय समारोह की तस्वीरों और ध्वनियों ने सबको मोह लिया है. एक तरफ़ भारतीय परिधान साड़ी में पंजाबी हिंदू मां, दूसरी तरफ़ कोट पैंट में गुजराती, युगांडवी,अमेरिकी मुसलमान पिता, बग़ल में एक सीरियाई, अरब पत्नी और साथ में हिंदी में बंबइया फ़िल्मी गाना ‘धूम मचा दे’! यह सब कुछ सपने जैसा है. इस दृश्य की विविधता ने सबका ध्यान अपनी तरफ़ खींचा है. लेकिन यह दृश्य उन शब्दों के बिना पूरा नहीं होता जो मंच पर आने के पहले ममदानी ने कहे.
विविधता अपने आप में काफी नहीं अगर वह बराबरी के उसूल की ज़मीन पर न हो. कहने को रिपब्लिकन पार्टी में भी विविधता है: उपराष्ट्रपति की पत्नी हिंदू, भारतीय मूल की हैं. कई अधिकारी और मंत्री ग़ैर अमेरिकी और ग़ैर ईसाई हैं. लेकिन उनमें से कोई भी अपने नेता डोनाल्ड ट्रंप की तरह ही, बराबरी के सिद्धांत में विश्वास नहीं करता.
न्यूयार्क के मेयर पद के चुनाव में जोहरान क्वामे ममदानी की जीत एक नामुमकिन लगने वाले ख़याल में लाखों लोगों के यक़ीन करने का नतीजा है. जीत के बाद के अपने भाषण में भी ममदानी ने यही कहा.
अभी-अभी 34 के हुए ममदानी ने ख़ुद कहा कि कई बातें उनके ख़िलाफ़ थीं: कि उनके बहुत चाहने के बावजूद कि वे बुजुर्ग हो जाएं, वे जवान ही बने रहे, कि वे मुसलमान हैं और वे जनतांत्रिक समाजवादी हैं. और सबसे बुरी बात यह कि इनमें से किसी भी बात के लिए माफ़ी मांगने को वे तैयार नहीं.
एक और बात थी जो ममदानी के ख़िलाफ़ थी. उन्होंने साफ़ कहा था कि बेंजामिन नेतन्याहू को न्यूयार्क आने पर गिरफ़्तार कर लिया जाएगा. नेतन्याहू को युद्ध-अपराधी कहने में ममदानी की ज़ुबान कभी लड़खड़ाई नहीं. वे इस्राइल को मात्र यहूदियों के देश के रूप में स्वीकार करने को तैयार न थे. बार-बार उकसाने पर भी वे इस बात पर अडिग रहे कि इस्राइल को एक संप्रभु देश के रूप में बने रहने का अधिकार है लेकिन उसे ऐसा देश होना चाहिए जहां हर किसी को समान अधिकार हों.
इस्राइल के बाहर सबसे अधिक यहूदियों की आबादी वाले शहर न्यूयार्क में यह कह पाने के लिए बराबरी के उसूल पर पक्के यक़ीन की ज़रूरत थी. और मसला सिर्फ़ इस बात पर अपनी आस्था का नहीं था. ममदानी को अमेरिका और न्यूयार्क के यहूदियों पर भरोसा था कि वे बुनियादी तौर पर भले हैं और इंसानियत में विश्वास रखते हैं. और आखिरकार इंसानियत क्या है अगर उसमें बराबरी और इंसाफ़ के उसूल न घुले-मिले हों?

यहूदियों ने ममदानी को निराश नहीं किया. उन्होंने यहूदी श्रेष्ठता के विचार को ठुकरा दिया और कहा कि वे बाक़ी सभी न्यूयॉर्कवासियों की तरह ही हैं: उनकी ज़रूरतें, इज़्ज़त, इंसाफ़ और बराबरी की उनकी उम्मीदों और बाक़ी शहरवासियों की उम्मीदों में कोई दर्ज़ाबंदी नहीं की जा सकती. यहूदियों को सबसे ख़ास लोगों की तरह देखने की ज़रूरत नहीं.
यह ठीक है कि इन बातों में लाखों मतदाताओं ने भरोसा किया. लेकिन उसकी एक वजह यह भी थी कि ख़ुद ममदानी को इन सब पर यक़ीन था. इसलिए जब भी उनसे उनकी पहचान के बारे में पूछा गया, उन्होंने यह कर कि वे पहले अमेरिकी हैं, बाद में कुछ और, बचने की कोशिश नहीं की. यह उनके साहस का भी प्रमाण है. जहां जो बात सबसे अधिक नुक़सान कर सकती है, उस पर टिके रहने में ही चरित्र की परीक्षा होती है.
अमेरिका में जिस एक पहचान का अपराधीकरण कर दिया गया है, वह मुसलमान पहचान है. उसे पूरी तरह क़बूल करना किसी भी राजनेता के लिए आसान नहीं. लेकिन ममदानी ने यह मुश्किल काम किया.
अमेरिका में ख़ुद को जनतांत्रिक समाजवादी कहना भी ख़तरे से ख़ाली नहीं हालांकि अमेरिका में इस विचार की लंबी परंपरा है. जैसे भारत में राहुल गांधी को माओवादी या अर्बन नक्सल कहा गया, वैसे ही ममदानी को कम्युनिस्ट कहकर मतदाताओं को डराने की कोशिश की गई. लेकिन ममदानी ने जनतांत्रिक समाजवाद को लेकर भी हिचकिचाहट नहीं दिखलाई. बहुत ही सरल तरीक़े से उसे समझाते हुए उन्होंने मार्टिन लूथर किंग को उद्धृत किया: ‘इसे जनतंत्र कहें या समाजवादी जनतंत्र, इस देश में ईश्वर के सभी बच्चों के लिए धन का बेहतर बंटवारा होना चाहिए. ‘
ममदानी का चुनाव अभियान एक नारे पर टिका हुआ था कि न्यूयार्क में रहना सबके लिए सहल होना चाहिए. इसके लिए ममदानी ने मकान किराए की बढ़ोत्तरी पर रोक, मुफ़्त बस सेवा और कामगारों की तनख़्वाह में बढ़ोत्तरी का वादा किया. पैसा कहां से आएगा? ममदानी ने पूंजीपतियों पर अधिक टैक्स लगाने की बात कही. इससे बड़ा आतंक अमेरिका में और क्या हो सकता है?
अरबपतियों में ममदानी को रोकने के लिए लाखों डॉलर झोंक दिए. लेकिन जनता की ताक़त इस दौलत की ताक़त का मुक़ाबला जनता की ताक़त से था. और दौलत हार गई.
यह ठीक है कि ममदानी को अपने उसूलों पर और अवाम की भीतरी अच्छाई पर भरोसा था लेकिन वह पर्याप्त नहीं. इस अच्छाई को संगठित करने किए बिना वह कारगर नहीं हो सकती. ममदानी ने अपने चुनाव अभियान को बहुत कुशलता से संगठित किया. कोई 30 कार्यकर्ताओं की टीम में धीरे-धीरे लोग शामिल होते गए और यह संख्या 1 लाख तक पहुंच गई. घर-घर दरवाज़ा खटखटाने से लेकर सामुदायिक केंद्रों, पब, मस्जिद, मंदिर और यहूदी उपासना गृहों तक लोगों से बातचीत से यह अभियान संगठित हुआ. और इस तरह 1% के समर्थन को मदमानी की इस टीम ने 50% से अधिक तक पहुंचा दिया.
यह अभियान शुष्क राजनीतिक कर्तव्य की भावना से विवश नहीं था. इसमें एक तरह का उल्लास था. चुनाव अभियान आपस में मिलने जुलने, दोस्तियां करने का मौक़ा बन गया. ममदानी ने सोशल मीडिया का भरपूर इस्तेमाल किया और बहुत ही सर्जनात्मक तरीक़े से, लेकिन वे हमेशा लोगों के बीच नज़र आए. टैक्सी ड्राइवरों, कामगारों, राह चलते लोगों से हाथ मिलाते और उनके साथ गपशप करते ममदानी ने चुनाव अभियान को तनावरहित मैत्री अभियान में बदल दिया.
शहर में रहना सिर्फ़ कामकाजी अनुभव नहीं होना चाहिए. वहां रहने में ख़ुशी महसूस होनी चाहिए. यही ममदानी के चुनाव अभियान का भी मंत्र था. उन्होंने एक औरत से अपनी मुलाकात का ज़िक्र किया जिसने कहा कि पहले मैं इस शहर से मोहब्बत करती थी,अब मैं यहां रहती हूं. ममदानी का जीतना जैसे शहर को इस इंसानी तजुर्बे के तौर पर वापस हासिल करने के लिए ज़रूरी था.
ट्रंप की धमकी, ममदानी की मुसलमान और समाजवादी पहचान के चलते उनके ख़िलाफ़ घृणा अभियान की कर्कशता के बीच मुस्कुराते, हंसते, हंसी-मज़ाक़ करते ममदानी की तस्वीर एक एक ऐसे आदमी का पता देती थी जो पूरी तरह आत्म-आश्वस्त है. ऐसे आदमी की सतह हर कोई चलना चाहेगा.
विरोधियों की कटुता का उत्तर ममदानी ने अपने हास्य से दिया. मदमानी की ख़ुशमिज़ाजी संक्रामक थी. और इसने उनके विरोधियों को भी निःशस्त्र कर दिया.
मैं एक वीडियो देख रहा था. यह जुलाई का वीडियो है. हर उम्मीदवार से पूछा गया कि क्या वे जीतने के बाद इस्राइल जाएंगे. सबने कहा कि वे जाना चाहेंगे लेकिन ममदानी ने यहां भी कोई हिचकिचाहट नहीं दिखलाई. उन्होंने कहा, ‘मैंने यह पहले भी कहा है कि यहूदी न्यूयॉर्कवासियों के साथ खड़े होने के लिए इस्राइल जाना आवश्यक नहीं है. मेरा विश्वास है कि यहूदी न्यूयॉर्कवासियों के साथ खड़े होने का अर्थ है कि आप उनसे वहीं मिलें जहां वे हों — चाहे वह उनके सिनगॉग और मंदिर हों, उनके घर हों, मेट्रो प्लेटफ़ॉर्म पर हों या किसी पार्क में — जहां भी वे हों. ‘
इस तरह वे पिछले 75 साल की परंपरा तोड़ रहे थे. न्यूयार्क के यहूदियों का विश्वास जीतने के लिए प्रत्येक मेयर इस्राइल जाता रहा है. ममदानी ने यहां भी दृढ़ता दिखलाई. ऐसा करके वे यहूदियों का भी सम्मान कर रहे थे. यहूदी का घर इस्राइल नहीं, वह जहां है, वहीं है. हर यहूदी इस्राइल की क्रूरता का समर्थन नहीं करता.
ममदानी की जीत ने जनतंत्र में मैत्री की संभावना को वापस बहाल किया है. दृढ़ता और मृदुता में विरोध नहीं है. ममदानी को सुनते हुए यह भी लगा कि यह जनतंत्र में भाषा की वापसी भी है. ममदानी का भाषण अपनी भाषा की काव्यात्मकता और ताक़त के कारण भी याद रखा जाएगा. ममदानी ने 32 साल पहले न्यूयार्क के गवर्नर मारियो कुमो को उद्धृत किया, ‘आप चुनाव अभियान तो कविता में करते हैं लेकिन शासन गद्य में.’ ममदानी ने जोड़ा कि हम कोशिश करेंगे कि गद्य में कविता बची रहे. आमीन!
(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाते हैं.)
